भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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२२२ईशादि नौ उपनिषद्[ प्रश्न ६

अन्यत्र नहीं जाना है। भाव यह है कि जब मनुष्यके हृदयमें परमात्माको पानेके लिये उत्कट अभिलाषा जाग्रत् हो जाती है, तब वे उसे वहीं उसके हृदयमें ही मिल जाते हैं॥ २ ॥

**सम्बन्ध—**उस परब्रह्म पुरुषोत्तमका तत्त्व समझनेके लिये संक्षेपसे सृष्टिक्रमका वर्णन करते हैं—

स ईक्षांचक्रे। कस्मिन्नहमुत्क्रान्त उत्क्रान्तो भविष्यामि कस्मिन्वा प्रतिष्ठिते प्रतिष्ठास्यामीति ॥ ३ ॥

सः=उसने; ईक्षांचक्रे=विचार किया (कि); कस्मिन्=(शरीरसे) किसके; उत्क्रान्ते=निकल जानेपर; अहम् उत्क्रान्तः=मैं (भी) निकला हुआ (सा); भविष्यामि=हो जाऊँगा; वा=तथा; कस्मिन् प्रतिष्ठिते=किसके स्थित रहनेपर; प्रतिष्ठास्यामि इति=मैं स्थित रहूँगा॥ ३॥

**व्याख्या—**महासर्गके आदिमें जगत्की रचना करनेवाले परम पुरुष परमेश्वरने विचार किया कि ‘मैं जिस ब्रह्माण्डकी रचना करना चाहता हूँ, उसमें एक ऐसा कौन-सा तत्त्व डाला जाय कि जिसके न रहनेपर मैं स्वयं भी उसमें न रह सकूँ अर्थात् मेरी सत्ता स्पष्टरूपसे व्यक्त न रहे और जिसके रहनेपर मेरी सत्ता स्पष्ट प्रतीत होती रहे’॥ ३॥

स प्राणमसृजत प्राणाच्छ्रद्धां खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवीन्द्रियं मनोऽन्नमन्नाद्वीर्यं तपो मन्त्राः कर्म लोका लोकेषु च नाम च॥ ४॥

(यह सोचकर सबसे पहले) सः=उसने; प्राणम् असृजत=प्राणकी रचना की; प्राणात् श्रद्धाम्=प्राणके बाद श्रद्धाको (उत्पन्न किया); खम् वायुः ज्योतिः आपः पृथिवी=(उसके बाद क्रमशः) आकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वी (ये पाँच महाभूत प्रकट हुए; फिर); मनः इन्द्रियम्=मन (अन्तःकरण) और इन्द्रियसमुदाय (की उत्पत्ति हुई); अन्नम्=(उसके बाद) अन्न हुआ; अन्नात्=अन्नसे; वीर्यम्=वीर्य (की रचना हुई, फिर); तपः=तप; मन्त्राः=नाना प्रकारके