भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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प्रश्न ६ ] प्रश्नोपनिषद् २२१


गया; तम्=उसी बातको; त्वा पृच्छामि=मैं आपसे पूछ रहा हूँ; असौ=वह (सोलह कलाओंवाला); पुरुषः=पुरुष; क्व इति=कहाँ है? ॥ १॥

**व्याख्या—**इस मन्त्रमें सुकेशा ऋषिने अपनी अल्पज्ञता और सत्य-भाषणका महत्त्व प्रकट करते हुए सोलह कलाओंवाले पुरुषके विषयमें प्रश्न किया है। वे बोले—'‘भगवन्! एक बार कोसलदेशका राजकुमार हिरण्यनाभ मेरे पास आया था। उसने मुझसे पूछा—'भारद्वाज! क्या तुम सोलह कलाओंवाले पुरुषके विषयमें जानते हो?' मैंने उससे स्पष्ट कह दिया—'भाई! मैं उसे नहीं जानता; जानता होता तो तुम्हें अवश्य बता देता। न बतानेका कोई कारण नहीं है। तुम अपने मनमें यह न समझना कि मैंने बहाना करके तुम्हारे प्रश्नको टाल दिया है; क्योंकि मैं झूठ नहीं बोलता। झूठ बोलनेवालेका मूलोच्छेद हो जाता है, वह इस लोकमें या परलोकमें—कहीं भी प्रतिष्ठा नहीं पा सकता' मेरी इस बातको सुनकर राजकुमार चुपचाप रथपर सवार होकर जैसे आया था, वैसे ही लौट गया। अब मैं आपके द्वारा उसी सोलह कलाओंवाले पुरुषका तत्त्व जानना चाहता हूँ; कृपया आप मुझे बतलायें कि वह कहाँ है और उसका स्वरूप क्या है'’॥ १॥

तस्मै स होवाच। इहैवान्तःशरीरे सोम्य स पुरुषो यस्मिन्नेताः षोडशकलाः प्रभवन्तीति ॥ २॥

तस्मै=उससे; सः ह=वे सुप्रसिद्ध महर्षि; उवाच=बोले; सोम्य=हे प्रिय!; इह=यहाँ; अन्तःशरीरे=इस शरीरके भीतर; एव=ही; सः=वह; पुरुषः=पुरुष है; यस्मिन्=जिसमें; एताः=ये; षोडश=सोलह; कलाः=कलाएँ; प्रभवन्ति इति=प्रकट होती हैं॥ २॥

**व्याख्या—**इस मन्त्रमें उस सोलह कलाओंवाले पुरुषका संकेतमात्र किया गया है। महर्षि पिप्पलाद कहते हैं—'प्रिय सुकेशा! जिन परमेश्वरसे सोलह कलाओंका समुदाय सम्पूर्ण जगद्रूप उनका विराट् शरीर उत्पन्न हुआ है, वे परम पुरुष हमारे इस शरीरके भीतर ही विराजमान हैं; उनको खोजनेके लिये कहीं