भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ प्रश्न ६ ]

परिद्वग्धुरिमाः षोडश कलाः पुरुषायणाः पुरुषं प्राप्यास्तं गच्छन्ति भिद्येते चासां नामरूपे पुरुष इत्येवं प्रोच्यते स एषोऽकलोऽमृतो भवति तदेष श्लोकः ॥ ५ ॥

सः=वह (प्रलयका दृष्टान्त) इस प्रकार है; यथा=जिस प्रकार; इमाः=ये; नद्यः=नदियाँ; समुद्रायणाः स्यन्दमानाः=समुद्रकी ओर लक्ष्य करके जाती (और) बहती हुई; समुद्रम्=समुद्रको; प्राप्य=पाकर; अस्तम् गच्छन्ति=(उसीमें) विलीन हो जाती हैं; तासाम् नामरूपे=उनके नाम और रूप; भिद्येते=नष्ट हो जाते हैं; समुद्रः इति एवम्=(फिर उनको) समुद्र इस एक नामसे ही; प्रोच्यते=पुकारा जाता है; एवम् एव=इसी प्रकार; अस्य परिद्वग्धः=सब ओरसे पूर्णतया देखनेवाले इन परमेश्वरकी; इमाः=ये (ऊपर बतायी हुई); षोडश कलाः=सोलह कलाएँ; पुरुषायणाः=जिनका परमाधार और परमगति पुरुष है; पुरुषम् प्राप्य=(प्रलयकालमें) परम पुरुष परमात्माको पाकर; अस्तम् गच्छन्ति=(उन्हींमें) विलीन हो जाती हैं; च=तथा; आसाम्=इन सबके; नामरूपे=(पृथक्-पृथक्) नाम और रूप; भिद्येते=नष्ट हो जाते हैं; पुरुषः इति एवम्=(फिर उनको) 'पुरुष' इस एक नामसे ही; प्रोच्यते=पुकारा जाता है; सः=वही; एषः=यह; अकलः=कलारहित (और); अमृतः=अमर परमात्मा; भवति=है; तत्=उसके विषयमें; एषः=यह (अगला); श्लोकः=श्लोक है ॥ ५ ॥

व्याख्या—जिस प्रकार भिन्न-भिन्न नाम और रूपोंवाली ये बहुत-सी नदियाँ अपने उद्गमस्थान समुद्रकी ओर दौड़ती हुई समुद्रमें पहुँचकर उसीमें विलीन हो जाती हैं, उनका समुद्रसे पृथक् कोई नाम-रूप नहीं रहता—वे समुद्र ही बन जाती हैं, उसी प्रकार सर्वसाक्षी सबके आत्मरूप परमात्मासे उत्पन्न हुई ये सोलह कलाएँ (अर्थात् यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड) प्रलयकालमें अपने परमाधार परम पुरुष परमेश्वरमें जाकर उसीमें विलीन हो जाती हैं। फिर इन सबके अलग-अलग नाम-रूप नहीं रहते। एकमात्र परम पुरुष परमेश्वरके स्वरूपमें ये तदाकार हो जाती हैं। अतः उन्हींके नामसे, उन्हींके वर्णनसे इनका वर्णन होता