ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ प्रश्न ६ ]
परिद्वग्धुरिमाः षोडश कलाः पुरुषायणाः पुरुषं प्राप्यास्तं गच्छन्ति भिद्येते चासां नामरूपे पुरुष इत्येवं प्रोच्यते स एषोऽकलोऽमृतो भवति तदेष श्लोकः ॥ ५ ॥
सः=वह (प्रलयका दृष्टान्त) इस प्रकार है; यथा=जिस प्रकार; इमाः=ये; नद्यः=नदियाँ; समुद्रायणाः स्यन्दमानाः=समुद्रकी ओर लक्ष्य करके जाती (और) बहती हुई; समुद्रम्=समुद्रको; प्राप्य=पाकर; अस्तम् गच्छन्ति=(उसीमें) विलीन हो जाती हैं; तासाम् नामरूपे=उनके नाम और रूप; भिद्येते=नष्ट हो जाते हैं; समुद्रः इति एवम्=(फिर उनको) समुद्र इस एक नामसे ही; प्रोच्यते=पुकारा जाता है; एवम् एव=इसी प्रकार; अस्य परिद्वग्धः=सब ओरसे पूर्णतया देखनेवाले इन परमेश्वरकी; इमाः=ये (ऊपर बतायी हुई); षोडश कलाः=सोलह कलाएँ; पुरुषायणाः=जिनका परमाधार और परमगति पुरुष है; पुरुषम् प्राप्य=(प्रलयकालमें) परम पुरुष परमात्माको पाकर; अस्तम् गच्छन्ति=(उन्हींमें) विलीन हो जाती हैं; च=तथा; आसाम्=इन सबके; नामरूपे=(पृथक्-पृथक्) नाम और रूप; भिद्येते=नष्ट हो जाते हैं; पुरुषः इति एवम्=(फिर उनको) 'पुरुष' इस एक नामसे ही; प्रोच्यते=पुकारा जाता है; सः=वही; एषः=यह; अकलः=कलारहित (और); अमृतः=अमर परमात्मा; भवति=है; तत्=उसके विषयमें; एषः=यह (अगला); श्लोकः=श्लोक है ॥ ५ ॥
व्याख्या—जिस प्रकार भिन्न-भिन्न नाम और रूपोंवाली ये बहुत-सी नदियाँ अपने उद्गमस्थान समुद्रकी ओर दौड़ती हुई समुद्रमें पहुँचकर उसीमें विलीन हो जाती हैं, उनका समुद्रसे पृथक् कोई नाम-रूप नहीं रहता—वे समुद्र ही बन जाती हैं, उसी प्रकार सर्वसाक्षी सबके आत्मरूप परमात्मासे उत्पन्न हुई ये सोलह कलाएँ (अर्थात् यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड) प्रलयकालमें अपने परमाधार परम पुरुष परमेश्वरमें जाकर उसीमें विलीन हो जाती हैं। फिर इन सबके अलग-अलग नाम-रूप नहीं रहते। एकमात्र परम पुरुष परमेश्वरके स्वरूपमें ये तदाकार हो जाती हैं। अतः उन्हींके नामसे, उन्हींके वर्णनसे इनका वर्णन होता
प्रश्न ६ ]
प्रश्नोपनिषद्
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है, अलग नहीं। उस समय परमात्मामें किसी प्रकारका संकल्प नहीं रहता। अतः वे समस्त कलाओंसे रहित, अमृतस्वरूप कहे जाते हैं। इस तत्त्वको समझनेवाला मनुष्य भी उन परब्रह्मको प्राप्त होकर अकल और अमर हो जाता है। इस विषयपर आगे कहा जानेवाला मन्त्र है—॥५॥
अरा इव रथनाभौ कला यस्मिन् प्रतिष्ठिताः।
तं वेदं पुरुषं वेद यथा मा वो मृत्युः परिव्यथा इति॥६॥
रथनाभौ =रथ-चक्रकी नाभिके आधारपर; अराः इव=जिस प्रकार अरे स्थित होते हैं (वैसे ही); यस्मिन् =जिसमें; कलाः =ऊपर बतायी हुई सब कलाएँ; प्रतिष्ठिताः =सर्वथा स्थित हैं; तम् वेद्यम् पुरुषम् =उस जाननेयोग्य (सबके आधारभूत) परम पुरुष परमेश्वरको; वेद =जानना चाहिये; यथा =जिससे (हे मनुष्यों!); वः =तुमलोगोंको; मृत्युः =मृत्यु; मा परिव्यथा इति =दुःख न दे सके॥६॥
व्याख्या —इस मन्त्रमें सर्वाधार परमेश्वरको जाननेके लिये प्रेरणा करके उसका फल जन्म-मृत्युसे रहित हो जाना बताया गया है। वेदभगवान् मनुष्योंसे कहते हैं—‘जिस प्रकार रथके पहियेमें लगे रहनेवाले सब अरे उस पहियेके मध्यस्थ नाभमें प्रविष्ट रहते हैं, उन सबका आधार नाभ है— नाभिके बिना वे टिक ही नहीं सकते, उसी प्रकार ऊपर बतायी हुई प्राण आदि सोलह कलाओंके जो आधार हैं, ये सब कलाएँ जिनके आश्रित हैं, जिनसे उत्पन्न होती हैं और जिनमें विलीन हो जाती हैं, वे ही जाननेयोग्य परब्रह्म परमेश्वर हैं। उन सर्वाधार परमात्माको जानना चाहिये। उन्हें जान लेनेके बाद तुम्हें मौतका डर नहीं रहेगा, फिर मृत्यु तुमको इस जन्म-मृत्युयुक्त संसारमें डालकर दुःखी नहीं कर सकेगी। तुमलोग सदाके लिये अमर हो जाओगे॥६॥
तान्होवाचैतावदेवाहेतत्परं ब्रह्म वेद। नातः परमस्तीति॥७॥
ह =(तत्पश्चात्) उन प्रसिद्ध महर्षि पिप्पलादने; तान् उवाच =उन सबसे कहा; एतत् =इस; परम् ब्रह्म =परम ब्रह्मको; अहम् =मैं; एतावत् =इतना; एव =ही; वेद =जानता हूँ; अतः परम् =इससे पर (उत्कृष्ट तत्त्व); न =नहीं; अस्ति इति =है॥७॥
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ प्रश्न ६ ]
व्याख्या —इतना उपदेश करनेके बाद महर्षि पिप्पलादने परम भाग्यवान् सुकेशा आदि छहों ऋषियोंको सम्बोधन करके कहा—‘ऋषियो! इन परब्रह्म परमेश्वरके विषयमें मैं इतना ही जानता हूँ। इनसे पर अर्थात् श्रेष्ठ अन्य कुछ भी नहीं है। मैंने तुमलोगोंसे उनके विषयमें जो कुछ कहना था, सब कह दिया’ ॥७॥
सम्बन्ध —अन्तमें कृतज्ञता प्रकट करते हुए वे सुकेशा आदि मुनिगण महर्षियों बार-बार प्रणाम करते हुए कहते हैं—
ते तमर्चयन्तस्त्वं हि नः पिता योऽस्माकमविद्यायाः परं पारं तारयसीति नमः परमऋषिभ्यो नमः परमऋषिभ्यः ॥८॥
ते=उन छहों ऋषियोंने; तम् अर्चयन्तः=पिप्पलादकी पूजा की (और कहा); त्वम्=आप; हि=ही; नः=हमारे; पिता=पिता (हैं); यः=जिन्होंने; अस्माकम्=हमलोगोंको; अविद्यायाः परम् पारम्=अविद्याके दूसरे पार; तारयसि इति=पहुँचा दिया है; नमः परमऋषिभ्यः=आप परम ऋषिको नमस्कार है; नमः परमऋषिभ्यः=परम ऋषिको नमस्कार है ॥८॥
व्याख्या —इस प्रकार आचार्य पिप्पलादसे ब्रह्मका उपदेश पाकर उन छहों ऋषियोंने पिप्पलादकी पूजा की और कहा—‘भगवन्! आप ही हमारे वास्तविक पिता हैं, जिन्होंने हमें इस संसार-समुद्रके पार पहुँचा दिया। ऐसे गुरुसे बढ़कर दूसरा कोई हो ही कैसे सकता है। आप परम ऋषि हैं, ज्ञानस्वरूप हैं। आपको नमस्कार है, नमस्कार है, बार-बार नमस्कार है। अन्तिम वाक्यकी पुनरावृत्ति ग्रन्थकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है ॥८॥
॥ षष्ठ प्रश्न समाप्त ॥६॥
॥ अथर्ववेदीय प्रश्नोपनिषद् समाप्त ॥
—◆◆◆—
प्रश्न ६ ]
प्रश्नोपनिषद्
२२७
शान्तिपाठ
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्जत्राः। स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाः सस्तनूभिव्यशेम देवहितं यदायुः॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्ताक्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु*॥
ॐ शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!!
इसका अर्थ इस उपनिषद्के आरम्भमें दिया जा चुका है।
- यजुर्वेद २५।१९—२१ तथा ऋग्वेद १०।८९।६,८।
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
मुण्डकोपनिषद्
यह उपनिषद् अथर्ववेदकी शौनकी शाखामें है।
शान्तिपाठ
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्वर्जत्राः। स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाः सस्तनूभिव्यशेम देवहितं यदायुः॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्ताक्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥
ॐ शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!!
देवाः=हे देवगण!; [वयम्] यजत्राः [सन्तः]=हम भगवान्का यजन (आराधन) करते हुए; कर्णेभिः=कानोंसे; भद्रम्=कल्याणमय वचन; शृणुयाम=सुनें; अक्षभिः=नेत्रोंसे; भद्रम्=कल्याण (ही); पश्येम=देखें; स्थिरैः=सुदृढ़; अङ्गैः=अङ्गों; तनूभिः=एवं शरीरोंसे; तुष्टुवांसः [वयम्]=भगवान्की स्तुति करते हुए हमलोग; यत्=जो; आयुः=आयु; देवहितम्=आराध्यदेव परमात्माके काम आ सके; [तत्]=उसका; व्यशेम=उपभोग करें; वृद्धश्रवाः=सब ओर फैले हुए सुयशवाले; इन्द्रः=इन्द्र; नः=हमारे लिये; स्वस्ति दधातु=कल्याणका पोषण करें; विश्ववेदाः=सम्पूर्ण विश्वका ज्ञान रखनेवाले; पूषा=पूषा; नः=हमारे लिये; स्वस्ति [दधातु]=कल्याणका पोषण करें; अरिष्टनेमिः=अरिष्टोंको मितानेके लिये चक्रसदृश शक्तिशाली; ताक्ष्यः=गरुडदेव; नः=हमारे लिये; स्वस्ति [दधातु]=कल्याणका पोषण करें; [तथा]=तथा; बृहस्पतिः=(बुद्धिके स्वामी) बृहस्पति भी; नः=हमारे लिये; स्वस्ति [दधातु]=कल्याण करें; ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः=परमात्मन्! हमारे त्रिविध तापकी शान्ति हो।
खण्ड १ ]
मुण्डकोपनिषद्
२२९
व्याख्या —गुरुके यहाँ अध्ययन करनेवाले शिष्य अपने गुरु, सहपाठी तथा मानवमात्रका कल्याण-चिन्तन करते हुए देवताओंसे प्रार्थना करते हैं कि 'हे देवगण! हम अपने कानोंसे शुभ—कल्याणकारी वचन ही सुनें। निन्दा, चुगली, गाली या दूसरी-दूसरी पापकी बातें हमारे कानोंमें न पड़ें और हमारा अपना जीवन यजनपरायण हो—हम सदा भगवान्की आराधनामें ही लगे रहें। न केवल कानोंसे सुनें, नेत्रोंसे भी हम सदा कल्याणका ही दर्शन करें। किसी अमङ्गलकारी अथवा पतनकी ओर ले जानेवाले दूष्यकी ओर हमारी दृष्टिका आकर्षण कभी न हो। हमारे शरीर, हमारा एक-एक अवयव सुदृढ़ एवं सुपुष्ट हों—वह भी इसलिये कि हम उनके द्वारा भगवान्का स्तवन करते रहें। हमारी आयु भोग-विलास या प्रमादमें न बीते। हमें ऐसी आयु मिले, जो भगवान्के कार्यमें आ सके। [देवता हमारी प्रत्येक इन्द्रियमें व्याप्त रहकर उसका संरक्षण और संचालन करते हैं। उनके अनुकूल रहनेसे हमारी इन्द्रियाँ सुगमतापूर्वक सन्मार्गमें लगी रह सकती हैं; अतः उनसे प्रार्थना करनी उचित ही है।] जिनका सुयश सब ओर फैला है, वे देवराज इन्द्र, सर्वज्ञ पूषा, अग्निनिवारक ताक्ष्य (गरुड़) और बुद्धिके स्वामी बृहस्पति—ये सभी देवता भगवान्की दिव्य विभूतियाँ हैं। ये सदा हमारे कल्याणका पोषण करें। इनकी कृपासे हमारे सहित प्राणिमात्रका कल्याण होता रहे। आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक—सभी प्रकारके तापोंकी शान्ति हो।
प्रथम मुण्डक
प्रथम खण्ड
ॐ | ब्रह्मा | देवानां | प्रथमः | सम्बभूव | ---|---|---|---|---|--- | | विश्वस्य | कर्ता | भुवनस्य | गोसा। स | ब्रह्मविद्यां | सर्वविद्याप्रतिष्ठा- | | | | मथर्वाय | ज्येष्ठपुत्राय | | प्राह॥ १ ॥ |
'ॐ' इस परमेश्वरके नामका स्मरण करके उपनिषद्का आरम्भ किया
२३०
ईशादि नौ उपनिषद्
[ मुण्डक १ ]
जाता है। इसके द्वारा यहाँ यह सूचित किया गया है कि मनुष्यको प्रत्येक कार्यके आरम्भमें ईश्वरका स्मरण तथा उनके नामका उच्चारण अवश्य करना चाहिये।
विश्वस्य कर्ता=सम्पूर्ण जगत्के रचयिता (और); भुवनस्य गोसा=सब लोकोंकी रक्षा करनेवाले; ब्रह्मा=(चतुर्मुख) ब्रह्माजी; देवानाम्=सब देवताओंमें; प्रथमः=पहले; सम्बभूव=प्रकट हुए; सः=उन्होंने; ज्येष्ठपुत्राय अथर्वाय=सबसे बड़े पुत्र अथर्वाको; सर्वविद्याप्रतिष्ठाम्=समस्त विद्याओंकी आधारभूता; ब्रह्मविद्याम् प्राह=ब्रह्मविद्याका भलीभाँति उपदेश किया ॥ १ ॥
व्याख्या—सर्वशक्तिमान् परब्रह्म परमेश्वरसे देवताओंमें सर्वप्रथम ब्रह्मा प्रकट हुए। फिर इन्होंने ही सब देवताओं, महर्षियों और मरीचि आदि प्रजापतियोंको उत्पन्न किया। साथ ही, समस्त लोकोंकी रचना भी की तथा उन सबकी रक्षाके सुदृढ़ नियम आदि बनाये। उनके सबसे बड़े पुत्र महर्षि अथर्वा थे; उन्हींको सबसे पहले ब्रह्माजीने ब्रह्मविद्याका उपदेश दिया था। जिस विद्यासे ब्रह्मके पर और अपर—दोनों स्वरूपोंका पूर्णतया ज्ञान हो, उसे ब्रह्मविद्या कहते हैं; यह सम्पूर्ण विद्याओंकी आश्रय है ॥ १ ॥
अथर्वणे यां प्रवदेत ब्रह्मा- शर्वा तां पुरोवाच्छङ्गिरे ब्रह्मविद्याम्। स भारद्वाजाय सत्यवहाय प्राह भारद्वाजोऽङ्गिरे परावराम् ॥ २ ॥
ब्रह्मा=ब्रह्माने; याम्=जिस विद्याका; अथर्वणे=अथर्वाको; प्रवदेत=उपदेश दिया था; ताम् ब्रह्मविद्याम्=उसी ब्रह्मविद्याको; अथर्वा=अथर्वाने; पुरा=पहले; अङ्गिरे=अङ्गी ऋषिसे; उवाच=कहा था; सः=उन अङ्गी ऋषिने; भारद्वाजाय=भरद्वाजगोत्री; सत्यवहाय=सत्यवह नामक ऋषिको; प्राह=बतलायी; भारद्वाजः=भारद्वाजने; परावराम्=पहलेवालोंसे पीछेवालोंको प्राप्त हुई उस परम्परागत विद्याको; अङ्गिरेसे=अङ्गिा नामक ऋषिसे; [ प्राह ]=कहा ॥ २ ॥
व्याख्या—अथर्वा ऋषिको जो ब्रह्मविद्या ब्रह्मासे मिली थी, वही ब्रह्मविद्या उन्होंने अङ्गी ऋषिको बतलायी और अङ्गीने भरद्वाजगोत्रमें उत्पन्न सत्यवह
खण्ड १ ]
मुण्डकोपनिषद्
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नामक ऋषिको कही। भारद्वाज ऋषिने परम्परासे चली आती हुई ब्रह्मके पर और अपर—दोनों स्वरूपोंका ज्ञान करानेवाली इस ब्रह्मविद्याका उपदेश अङ्गिरा नामक ऋषिको दिया॥ २ ॥
शौनको ह वै महाशालोऽङ्गिरसं विधिवदुपसन्नः पप्रच्छ। कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवतीति॥ ३ ॥
ह=विख्यात है (कि); शौनकः=वै=शौनक नामसे प्रसिद्ध मुनि; महाशालः=जो अति बृहत् विद्यालय (ऋषिकुल) के अधिष्ठाता थे; विधिवत्=शास्त्रविधिके अनुसार; अङ्गिरसम् उपसन्नः=महर्षि अङ्गिराके पास आये (और उनसे); पप्रच्छ= (विनयपूर्वक) पूछा; भगवः=भगवन्!; नु=निश्चयपूर्वक; कस्मिन् विज्ञाते=किसके जान लिये जानेपर; इदम्=यह; सर्वम्=सब कुछ; विज्ञातम्=जाना हुआ; भवति=हो जाता है; इति=यह (मेरा प्रश्न है)॥ ३ ॥
व्याख्या —शौनक नामसे प्रसिद्ध एक महर्षि थे, जो बड़े भारी विश्वविद्यालयके अधिष्ठाता थे; पुराणोंके अनुसार उनके ऋषिकुलमें अट्ठासी हजार ऋषि रहते थे। वे उपर्युक्त ब्रह्मविद्याको जाननेके लिये शास्त्रविधिके अनुसार हाथमें समिधा लेकर श्रद्धापूर्वक महर्षि अङ्गिराके पास आये। उन्होंने अत्यन्त विनयपूर्वक महर्षिसे पूछा—‘भगवन्! जिसको भलीभाँति जान लेनेपर यह जो कुछ देखने, सुनने और अनुमान करनेमें आता है, सब-का-सब जान लिया जाता है, वह परम तत्त्व क्या है? कृपया बतलाइये कि उसे कैसे जाना जाय?॥ ३ ॥
तस्मै स होवाच। द्वे विद्ये वेदितव्ये इति ह स्म यद्ब्रह्मविदो वदन्ति परा चैवापरा च॥ ४ ॥
तस्मै=उन शौनक मुनिसे; सः ह=वे विख्यात महर्षि अङ्गिरा; उवाच=बोले; ब्रह्मविदः=ब्रह्मको जाननेवाले; इति=इस प्रकार; ह=निश्चयपूर्वक; वदन्ति स्म यत्=कहते आये हैं कि; द्वे विद्ये=दो विद्याएँ; एव=ही; वेदितव्ये=जाननेयोग्य हैं; परा=एक परा; च=और; अपरा=दूसरी अपरा; च=भी॥ ४ ॥
व्याख्या —इस प्रकार शौनकके पूछनेपर महर्षि अङ्गिरा बोले—‘शौनक!
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ मुण्डक १ ]
ब्रह्मको जाननेवाले महर्षियोंका कहना है कि मनुष्यके लिये जाननेयोग्य दो विद्याएँ हैं—एक तो परा और दूसरी अपरा ॥ ४ ॥
तत्रापरा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिषमिति। अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते ॥ ५ ॥
तत्र=उन दोनोंमेंसे; ऋग्वेदः=ऋग्वेद; यजुर्वेदः=यजुर्वेद; सामवेदः=सामवेद (तथा); अथर्ववेदः=अथर्ववेद; शिक्षा=शिक्षा; कल्पः=कल्प; व्याकरणम्=व्याकरण; निरुक्तम्=निरुक्त; छन्दः=छन्द; ज्योतिषम्=ज्योतिष; इति अपरा=ये (सब तो) अपरा विद्या (के अन्तर्गत हैं); अथ=तथा; यया=जिससे; तत्=वह; अक्षरम्=अविनाशी परब्रह्म; अधिगम्यते=तत्त्वसे जाना जाता है; [ सा ]=वह; परा=परा विद्या (है) ॥ ५ ॥
व्याख्या —उन दोनोंमेंसे जिसके द्वारा इस लोक और परलोकसम्बन्धी भोगों तथा उनकी प्राप्तिके साधनोंका ज्ञान प्राप्त किया जाता है, जिसमें भोगोंकी स्थिति, भोगोंके उपभोग करनेके प्रकार, भोग-सामग्रीकी रचना और उनको उपलब्ध करनेके नाना साधन आदिका वर्णन है, वह तो अपरा विद्या है; जैसे ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद—ये चारों वेद। इनमें नाना प्रकारके यज्ञोंकी विधिका और उनके फलका विस्तारपूर्वक वर्णन है। जगत्के सभी पदार्थोंका एवं विषयोंका वेदोंमें भलीभाँति वर्णन किया गया है। यह अवश्य है कि इस समय वेदकी सब शाखाएँ उपलब्ध नहीं हैं और उनमें वर्णित विविध विज्ञानसम्बन्धी बातोंको समझनेवाले भी नहीं हैं। वेदोंका पाठ अर्थात् यथार्थ उच्चारण करनेकी विधिका उपदेश ‘शिक्षा’ है। जिसमें यज्ञयाग आदिकी विधि बतलायी गयी है, उसे ‘कल्प’ कहते हैं (गृह्यसूत्र आदिकी गणना कल्पमें ही है)। वैदिक और लौकिक शब्दोंके अनुशासनका—प्रकृति-प्रत्यय-विभागपूर्वक शब्दसाधनकी प्रक्रिया, शब्दार्थबोधके प्रकार एवं शब्दप्रयोग आदिके नियमोंके उपदेशका नाम ‘व्याकरण’ है। वैदिक शब्दोंका जो कोष है जिसमें अमुक पद अमुक वस्तुका वाचक है—यह बात कारणसहित बतायी गयी है, उसको
खण्ड १ ] मुण्डकोपनिषद् २३३
‘निरुक्त’ कहते हैं। वैदिक छन्दोंकी जाति और भेद बतलानेवाली विद्या ‘छन्द’ कहलाती है। ग्रह और नक्षत्रोंकी स्थिति, गति और उनके साथ हमारा क्या सम्बन्ध है—इन सब बातोंपर जिसमें विचार किया गया है, वह ‘ज्योतिष’ विद्या है। इस प्रकार चार वेद और छः वेदाङ्ग—इन दसका नाम अपरा विद्या है; और जिसके द्वारा परब्रह्म अविनाशी परमात्माका तत्त्वज्ञान होता है, वह परा विद्या है। उसका वर्णन भी वेदोंमें ही है, अतः उतने अंशको छोड़कर अन्य सब वेद और वेदाङ्गोंको अपरा विद्याके अन्तर्गत समझना चाहिये ॥ ५ ॥
सम्बन्ध— ऊपर बतलायी हुई परा विद्याके द्वारा जिसका ज्ञान होता है, वह अविनाशी ब्रह्म कैसा है—इस जिज्ञासापर कहते हैं—
यत्तदद्रेश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्णमचक्षुःश्रोत्रं तदपाणिपादम्।
नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं तदव्ययं यद्भूतयोनिं परिपश्यन्ति धीराः ॥ ६ ॥
तत्=वह; यत्=जो; अद्रेश्यम्=जाननेमें न आनेवाला; अग्राह्यम्=पकड़नेमें न आनेवाला; अगोत्रम्=गोत्र आदिसे रहित; अवर्णम्=रंग और आकृतिसे रहित; अचक्षुःश्रोत्रम्=नेत्र, कान आदि ज्ञानेन्द्रियोंसे (भी) रहित; अपाणिपादम्=(और) हाथ, पैर आदि कर्मेन्द्रियोंसे (भी) रहित है; [ तथा ]=तथा; तत्=वह; यत्=जो; नित्यम्=नित्य; विभुम्=सर्वव्यापी; सर्वगतम्=सबमें फैला हुआ; सुसूक्ष्मम्=अत्यन्त सूक्ष्म (और); अव्ययम्=अविनाशी परब्रह्म है; तत्=उस; भूतयोनिम्=समस्त प्राणियोंके परम कारणको; धीराः=ज्ञानीजन; परिपश्यन्ति=सर्वत्र परिपूर्ण देखते हैं ॥ ६ ॥
व्याख्या— इस मन्त्रमें परब्रह्म परमेश्वरके निराकार स्वरूपका वर्णन किया गया है। सारांश यह है कि वे परब्रह्म परमेश्वर ज्ञानेन्द्रियोंद्वारा जाननेमें नहीं आते, न कर्मेन्द्रियोंद्वारा पकड़नेमें ही आते हैं। वे गोत्र आदि उपाधियोंसे रहित तथा ब्राह्मण आदि वर्णगतभेदसे एवं रंग और आकृतिसे भी सर्वथा रहित हैं; वे नेत्र, कान आदि ज्ञानेन्द्रियोंसे और हाथ, पैर आदि कर्मेन्द्रियोंसे भी रहित हैं। तथा
२३४ ईशादि नौ उपनिषद् [ मुण्डक १
वे अत्यन्त सूक्ष्म, व्यापक, अन्तरात्मारूपसे सबमें फैले हुए और कभी नाश न होनेवाले सर्वथा नित्य हैं। समस्त प्राणियोंके उन परम कारणको ज्ञानीजन सर्वत्र परिपूर्ण देखते हैं॥ ६॥
**सम्बन्ध—**वे जगदात्मा परमेश्वर समस्त भूतोंके परम कारण कैसे हैं, सम्पूर्ण जगत् उनसे किस प्रकार उत्पन्न होता है, इस जिज्ञासापर कहते हैं—
यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च
यथा पृथिव्यामोषधयः सम्भवन्ति।
यथा सतः पुरुषात्केशलोमानि
तथाक्षरात्सम्भवतीह विश्वम्॥ ७॥
यथा=जिस प्रकार; ऊर्णनाभिः=मकड़ी; सृजते=(जालेको) बनाती है; च=और; गृह्णते=निगल जाती है (तथा); यथा=जिस प्रकार; पृथिव्याम्=पृथ्वीमें; ओषधयः=नाना प्रकारकी ओषधियाँ; सम्भवन्ति=उत्पन्न होती हैं (और); यथा=जिस प्रकार; सतः पुरुषात्=जीवित मनुष्यसे; केशलोमानि=केश और रोएँ (उत्पन्न होते हैं); तथा=उसी प्रकार; अक्षरात्=अविनाशी परब्रह्मसे; इह=यहाँ (इस सृष्टिमें); विश्वम्=सब कुछ; सम्भवति=उत्पन्न होता है॥ ७॥
**व्याख्या—**इस मन्त्रमें तीन दृष्टान्तोंद्वारा यह बात समझायी गयी है कि परब्रह्म परमेश्वर ही इस जड-चेतनात्मक सम्पूर्ण जगत्के निमित्त और उपादान कारण हैं। पहले मकड़ीके दृष्टान्तसे यह बात कही गयी है कि जिस प्रकार मकड़ी अपने पेटमें स्थित जालेको बाहर निकालकर फैलाती है और फिर उसे निगल जाती है, उसी प्रकार वह परब्रह्म परमेश्वर अपने अंदर सूक्ष्मरूपसे लीन हुए जड-चेतनरूप जगत्को सृष्टिके आरम्भमें नाना प्रकारसे उत्पन्न करके फैलाते हैं और प्रलयकालमें पुनः उसे अपनेमें लीन कर लेते हैं (गीता ९। ७-८)। दूसरे उदाहरणसे यह बात समझायी है कि जिस प्रकार पृथ्वीमें जैसे-जैसे अन्न, तृण, वृक्ष, लता आदि ओषधियोंके बीज पड़ते हैं, उसी प्रकारकी भिन्न-भिन्न भेदोंवाली ओषधियाँ वहाँ उत्पन्न हो जाती हैं—उसमें पृथ्वीका कोई पक्षपात नहीं है, उसी प्रकार जीवोंके विभिन्न कर्मरूप बीजोंके अनुसार ही भगवान् उनको
खण्ड १ ] मुण्डकोपनिषद् २३५
भिन्न-भिन्न योनियोंमें उत्पन्न करते हैं, अतः उनमें किसी प्रकारकी विषमता और निर्दयताका दोष नहीं है (ब्रह्मसूत्र २।१।३४)। तीसरे मनुष्य-शरीरके उदाहरणसे यह बात समझायी गयी है कि जिस प्रकार मनुष्यके जीवित शरीरसे सर्वथा विलक्षण केश, रोएँ और नख अपने-आप उत्पन्न होते और बढ़ते रहते हैं—उसके लिये उसको कोई कार्य नहीं करना पड़ता, उसी प्रकार परब्रह्म परमेश्वरसे यह जगत् स्वभावसे ही समयपर उत्पन्न हो जाता है और विस्तारको प्राप्त होता है; इसके लिये भगवान्को कोई प्रयत्न नहीं करना पड़ता, इसीलिये भगवान्ने गीतामें कहा है कि 'मैं इस जगत्को बनानेवाला होनेपर भी अकर्ता ही हूँ' (४।१३), 'उदासीनकी तरह स्थित रहनेवाला मुझ परमेश्वरको वे कर्म लिस नहीं करते' (९।९) इत्यादि ॥ ७ ॥
**सम्बन्ध—**अब संक्षेपमें जगत्की उत्पत्तिका क्रम बतलाते हैं—
तपसा चीयते ब्रह्म ततोऽन्नमभिजायते । अन्नात्प्राणो मनः सत्यं लोकाः कर्मसु चामृतम् ॥ ८ ॥
ब्रह्म = परब्रह्म; तपसा = संकल्परूप तपसे; चीयते = उपचय (वृद्धि) को प्राप्त होता है; ततः = उससे; अन्नम् = अन्न; अभिजायते = उत्पन्न होता है; अन्नात् = अन्नसे (क्रमशः); प्राणः = प्राण; मनः = मन; सत्यम् = सत्य (पाँच महाभूत); लोकाः = समस्त लोक (और कर्म); च = तथा; कर्मसु = कर्मोंसे; अमृतम् = अवश्यम्भावी सुख-दुःखरूप फल उत्पन्न होता है ॥ ८ ॥
**व्याख्या—**जब जगत्की रचनाका समय आता है, उस समय परब्रह्म परमेश्वर अपने संकल्परूप तपसे वृद्धिको प्राप्त होते हैं, अर्थात् उनमें विविध रूपोंवाली सृष्टिके निर्माणका संकल्प उठता है। जीवोंके कर्मानुसार उन परब्रह्म पुरुषोत्तममें जो सृष्टिके आदिमें स्फुरणा होती है, वही मानो उनका तप है; उस स्फुरणाके होते ही भगवान्, जो पहले अत्यन्त सूक्ष्मरूपमें रहते हैं, (जिसका वर्णन छठे मन्त्रमें आ चुका है) उसकी अपेक्षा स्थूल हो जाते हैं अर्थात् वे सृष्टिकर्ता ब्रह्माका रूप धारण कर लेते हैं। ब्रह्मासे सब प्राणियोंकी उत्पत्ति और वृद्धि करनेवाला अन्न उत्पन्न होता है। फिर अन्नसे क्रमशः प्राण, मन, कार्यरूप
२३६ ईशादि नौ उपनिषद् [ मुण्डक १
आकाशादि पाँच महाभूत, समस्त प्राणी और उनके वासस्थान, उनके भिन्न-भिन्न कर्म और उन कर्मोंसे उनका अवश्यम्भावी सुख-दुःखरूप फल—इस प्रकार यह सम्पूर्ण जगत् उत्पन्न होता है॥८॥
सम्बन्ध— अब परमेश्वरकी महिमाका वर्णन करते हुए इस प्रकरणका उपसंहार करते हैं—
यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तपः।
तस्मादेतद्ब्रह्म नाम रूपमन्नं च जायते॥९॥
यः=जो; सर्वज्ञः=सर्वज्ञ (तथा); सर्ववित्=सबको जाननेवाला (है); यस्य=जिसका; ज्ञानमयम्=ज्ञानमय; तपः=तप (है); तस्मात्=उसी परमेश्वरसे; एतत्=यह; ब्रह्म=विराट्स्वरूप जगत्; च=तथा; नाम=नाम; रूपम्=रूप (और); अन्नम्=भोजन; जायते=उत्पन्न होते हैं॥९॥
व्याख्या— वे सम्पूर्ण जगत्के कारणभूत परम पुरुष परमेश्वर साधारण-रूपसे तथा विशेषरूपसे भी सबको भलीभाँति जानते हैं, उन परब्रह्मका एकमात्र ज्ञान ही तप है। उन्हें साधारण मनुष्योंकी भाँति जगत्की उत्पत्तिके लिये कष्ट-सहनरूप तप नहीं करना पड़ता। उन सर्वशक्तिमान् परब्रह्म परमेश्वरके संकल्पमात्रसे ही यह प्रत्यक्ष दीखनेवाला विराट्स्वरूप जगत् (जिसे अपर ब्रह्म कहते हैं) अपने-आप प्रकट हो जाता है और समस्त प्राणियों तथा लोकोंके नाम, रूप और आहार आदि भी उत्पन्न हो जाते हैं॥९॥
शौनक ऋषिने यह पूछा था कि ‘किसको जाननेसे यह सब कुछ जान लिया जाता है ?’ इसके उत्तरमें समस्त जगत्के परम कारण परब्रह्म परमात्मासे जगत्की उत्पत्ति बतलाकर संक्षेपमें यह बात समझायी गयी कि ‘उन सर्व-शक्तिमान्, सर्वज्ञ, सबके कर्ता-धर्ता परमेश्वरको जान लेनेपर यह सब कुछ ज्ञात हो जाता है’॥९॥
॥ प्रथम खण्ड समाप्त ॥ १ ॥
खण्ड २ ]
मुण्डकोपनिषद्
२३७
द्वितीय खण्ड
सम्बन्ध —पहले खण्डके चौथे मन्त्रमें परा और अपरा—इन दो विद्याओंको जाननेयोग्य बताया था, उनमेंसे अब इस खण्डमें अपरा विद्याका स्वरूप और फल बतलाकर परा विद्याकी जिज्ञासा उत्पन्न की जाती है—
तदेतत्सत्यं मन्त्रेषु कर्माणि कवयो यान्यपश्यंस्तानि त्रेतायां बहुधा संततानि। तान्याचरथ नियतं सत्यकामा एष वः पन्थाः सुकृतस्य लोके ॥ १ ॥
तत्=वह; एतत्=यह; सत्यम्=सत्य है कि; कवयः=बुद्धिमान् ऋषियोंने; यानि=जिन; कर्माणि=कर्मोंको; मन्त्रेषु=वेद-मन्त्रोंमें; अपश्यन्=देखा था; तानि=वे; त्रेतायाम्=तीनों वेदोंमें; बहुधा=बहुत प्रकारसे; संततानि=व्याप्त हैं; सत्यकामाः=हे सत्यको चाहनेवाले मनुष्यो! (तुमलोग); तानि=उनका; नियतम्=नियमपूर्वक; आचरथ=अनुष्ठान करो; लोके=इस मनुष्य-शरीरमें; वः=तुम्हारे लिये; एषः=यही; सुकृतस्य=शुभकर्मकी फल-प्राप्तिका; पन्थाः=मार्ग हैं ॥ १ ॥
व्याख्या —यह सर्वथा सत्य है कि बुद्धिमान् महर्षियोंने जिन उन्नतिके साधनरूप यज्ञादि नाना प्रकारके कर्मोंको वेद-मन्त्रोंमें पहले देखा था, वे कर्म ऋक्, यजुः और साम—इन तीनों वेदोंमें बहुत प्रकारसे विस्तारपूर्वक वर्णित हैं (गीता ४। ३२)*। अतः जागतिक उन्नति चाहनेवाले मनुष्योंको उन्हें भलीभाँति जानकर नियमपूर्वक उन कर्मोंको करते रहना चाहिये। इस मनुष्य-शरीरमें यही उन्नतिका सुन्दर मार्ग है। आलस्य और प्रमादमें या भोगोंको भोगनेमें पशुओंकी भाँति जीवन बिता देना मनुष्य-शरीरके उपयुक्त नहीं है। यही इस मन्त्रका भाव है ॥ १ ॥
- प्रधानरूपसे वेदोंकी संख्या तीन ही मानी गयी है। जहाँ-तहाँ 'वेदत्रयी' आदि नामोंसे ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद—इन तीनका ही उल्लेख मिलता है। ऐसे स्थलोंमें चौथे अथर्ववेदको उक्त तीनोंके अन्तर्गत ही मानना चाहिये।
२३८
ईशादि नौ उपनिषद्
[ मुण्डक १ ]
सम्बन्ध— वेदोक्त अनेक प्रकारके कर्मोंमेंसे उपलक्षणरूपसे प्रधान अग्निहोत्र-कर्मका वर्णन आरम्भ करते हैं—
यदा लेलायते ह्यर्चिः समिद्धे हव्यवाहने। तदाज्यभागावन्तरेणाहुतीः प्रतिपादयेत् ॥ २ ॥
यदा हि-जिस समय; हव्यवाहने समिद्धे-हविष्यको देवताओंके पास पहुँचानेवाली अग्निके प्रदीप्त हो जानेपर; अर्चिः=(उसमें) ज्वालाएँ; लेलायते=लपलपाने लगती हैं; तदा=उस समय; आज्यभागी अन्तरेण=आज्यभागकी दोनों आहुतियोंके* स्थानको छोड़कर बीचमें; आहुतीः=अन्य आहुतियोंको; प्रतिपादयेत्-डाले ॥ २ ॥
व्याख्या— अधिकारी मनुष्योंको नित्यप्रति अग्निहोत्र करना चाहिये। जब देवताओंको हविष्य पहुँचानेवाली अग्नि अग्निहोत्रकी वेदीमें भलीभाँति प्रज्वलित हो जाय, उसमेंसे लपटें निकलने लगेँ, उस समय आज्यभागके स्थानको छोड़कर मध्यमें आहुतियाँ डालनी चाहिये। इससे यह बात भी समझायी गयी है कि जबतक अग्नि प्रदीप्त न हो, उसमेंसे लपटें न निकलने लगेँ तबतक या निकलकर शान्त हो जायँ, उस समय अग्निमें आहुति नहीं डालनी चाहिये। अग्निको अच्छी तरह प्रज्वलित करके ही अग्निहोत्र करना चाहिये ॥ २ ॥
सम्बन्ध— नित्य अग्निहोत्र करनेवाले मनुष्यको उसके साथ-साथ और क्या-क्या करना चाहिये, इस जिज्ञासापर कहते हैं—
यस्याग्निहोत्रमदर्शमपौर्णमास- मचातुर्मास्यमनाग्रयणमतिथिवर्जितं च।
- यजुर्वेदके अनुसार प्रजापतिके लिये मौनभावसे एक आहुति और इन्द्रके लिये 'आधार' नामकी दो घृताहुतियाँ देनेके पश्चात् जो अग्नि और सोम देवताओंके लिये पृथक्-पृथक् दो आहुतियाँ दी जाती हैं उनका नाम 'आज्यभाग' है। 'ॐ अग्नये स्वाहा' कहकर उत्तर-पूर्वार्धमें और 'ॐ सोमाय स्वाहा' कहकर दक्षिण-पूर्वार्धमें ये आहुतियाँ डाली जाती हैं, इनके बीचमें शेष आहुतियाँ डालनी चाहिये।
खण्ड २]
मुण्डकोपनिषद्
२३१
अहृतमवैश्वदेवमविधिना हृत- माससमास्तस्य लोकान् हिनस्ति ॥ ३ ॥
यस्य=जिसका; अग्निहोत्रम्=अग्निहोत्र; अदर्शम्=दर्श नामक यज्ञसे रहित है; अपौर्णमासम्=पौर्णमास नामक यज्ञसे रहित है; अचातुर्मास्यम्=चातुर्मास्य नामक यज्ञसे रहित है; अनाग्रयणम्=आग्रयण कर्मसे रहित है; च=तथा; अतिथिवर्जितम्=जिसमें अतिथि सत्कार नहीं किया जाता; अहृतम्=जिसमें समयपर आहुति नहीं दी जाती; अवैश्वदेवम्=जो बलिवैश्वदेव नामक कर्मसे रहित है; (तथा) अविधिना हृतम्=जिसमें शास्त्रविधिकी अवहेलना करके हवन किया गया है; ऐसा अग्निहोत्र; तस्य=उस अग्निहोत्रीके; आससमान्=सातों; लोकान्=पुण्यलोकोंका; हिनस्ति=नाश कर देता है ॥ ३ ॥
व्याख्या —नित्य अग्निहोत्र करनेवाला मनुष्य यदि दर्श१ और पौर्णमासयज्ञ२ नहीं करता या चातुर्मास्ययज्ञ३ नहीं करता अथवा शरद् और वसन्त ऋतुओंमें की जानेवाली नवीन अन्नकी इष्टिरूप आग्रयण यज्ञ नहीं करता, यदि उसकी यज्ञशालामें अतिथियोंका विधिपूर्वक सत्कार नहीं किया जाता या वह नित्य अग्निहोत्रमें ठीक समयपर और शास्त्रविधिके अनुसार हवन नहीं करता एवं बलिवैश्वदेव कर्म नहीं करता, तो उस अग्निहोत्र करनेवाले मनुष्यके सातों लोकोंको वह अङ्गहीन अग्निहोत्र नष्ट कर देता है। अर्थात् उस यज्ञके द्वारा उसे मिलनेवाले जो पृथ्वीलोकसे लेकर सत्यलोकतक सातों लोकोंमें प्राप्त होनेयोग्य भोग हैं, उनसे वह वञ्चित रह जाता है ॥ ३ ॥
सम्बन्ध —दूसरे मन्त्रमें यह बात कही गयी थी कि जब अग्निमें लपटें निकलने लगीं तब आहुति देनी चाहिये; अतः अब उन लपटोंके प्रकार-भेद और नाम बतलाते हैं—
१-प्रत्येक अमावस्याको की जानेवाली इष्टि।
२-प्रत्येक पूर्णिमाको की जानेवाली इष्टि।
३-चार महीनोंमें पूरा होनेवाला एक श्रौत यागविशेष।
२४०
ईशादि नौ उपनिषद्
[ मुण्डक १ ]
काली कराली च मनोजवा च सुलोहिता या च सुधूम्रवर्णा। स्फुलिङ्गिनी विश्वरुची च देवी लेलायमाना इति सम जिह्वाः ॥ ४ ॥
या=जो; काली=काली; कराली=कराली; च=तथा; मनोजवा=मनोजवा; च=और; सुलोहिता=सुलोहिता; च=तथा; सुधूम्रवर्णा=सुधूम्रवर्णा; स्फुलिङ्गिनी=स्फुलिङ्गिनी; च=तथा; विश्वरुची देवी=विश्वरुची देवी; इति=ये (अग्रिकी); सम=सात; लेलायमानाः=लपलपाती हुई; जिह्वाः=जिह्वाएँ हैं ॥ ४ ॥
व्याख्या—काली—काले रंगवाली, कराली—अति उग्र (जिसमें आग लग जानेका डर रहता है), मनोजवा—मनकी भाँति अत्यन्त चञ्चल, सुलोहिता—सुन्दर लाली लिये हुए, सुधूम्रवर्णा—सुन्दर धूपैके-से रंगवाली, स्फुलिङ्गिनी—चिनगारियोंवाली तथा विश्वरुची देवी—सब ओरसे प्रकाशित, देदीप्यमान—इस प्रकार ये सात तरहकी लपटें मानो अग्निदेवकी हविको ग्रहण करनेके लिये लपलपाती हुई सात जिह्वाएँ हैं। अतः जब इस प्रकार अग्निदेवता आहतिरूप भोजन ग्रहण करनेके लिये तैयार हों, उसी समय भोजनरूप आहुतियों प्रदान करनी चाहिये; अन्यथा अप्रज्वलित अथवा बुझी हुई अग्निमें दी हुई आहुति राखमें मिलकर व्यर्थ नष्ट हो जाती हैं ॥ ४ ॥
सम्बन्ध—उपर्युक्त प्रकारसे प्रदीप्त अग्निमें नियमपूर्वक नित्यप्रति हवन करनेका फल बतलाते हैं—
एतेषु यश्चरते भ्राजमानेषु यथाकालं चाहृतयो ह्याददायन्। तं नयन्त्येताः सूर्यस्य रश्मयो यत्र देवानां पतिरेकोऽधिवासः ॥ ५ ॥
यः च=जो कोई भी अग्निहोत्री; एतेषु भ्राजमानेषु=इन देदीप्यमान ज्वालाओंमें; यथाकालम्=ठीक समयपर; चरते=अग्निहोत्र करता है; तम्=उस अग्निहोत्रीको;
खण्ड २ ]
मुण्डकोपनिषद्
२४९
हि=निश्चय ही; आददायन्=अपने साथ लेकर; एताः=ये; आहुतयः=आहुतियाँ; सूर्यस्य=सूर्यकी; रश्मयः [ भूत्वा ]=किरणें बनकर; नयन्ति=(वहाँ) पहुँचा देती हैं; यत्र=जहाँ; देवानाम्=देवताओंका; एकः=एकमात्र; पतिः=स्वामी (इन्द्र); अधिवासः=निवास करता है ॥५॥
व्याख्या —जो कोई भी साधक पूर्वमन्त्रमें बतलायी हुई सात प्रकारकी लपटोंसे युक्त भलीभाँति प्रज्वलित अग्निमें ठीक समयपर शास्त्रविधिके अनुसार नित्यप्रति आहुति देकर अग्निहोत्र करता है, उसे मरणकालमें अपने साथ लेकर ये आहुतियाँ सूर्यकी किरणें बनकर वहाँ पहुँचा देती हैं, जहाँ देवताओंका एकमात्र स्वामी इन्द्र निवास करता है। तात्पर्य यह कि अग्निहोत्र स्वर्गके सुखोंकी प्राप्तिका अमोघ उपाय है ॥५॥
सम्बन्ध —किस प्रकार ये आहुतियाँ सूर्य-किरणोंद्वारा यजमानको इन्द्रलोकमें ले जाती हैं—ऐसी जिज्ञासा होनेपर कहते हैं—
एद्येहीति तमाहुतयः सुवर्चसः सूर्यस्य रश्मिभिर्यजमानं वहन्ति । प्रियां वाचमभिवदन्त्योऽर्चयन्त्य एष वः पुण्यः सुकृतो ब्रह्मलोकः ॥६॥
सुवर्चसः=(वे) देदीप्यमान; आहुतयः=आहुतियाँ; एहि एहि=आओ, आओ; एषः=यह; वः=तुम्हारे; सुकृतः=शुभकर्मोंसे प्राप्त; पुण्यः=पवित्र; ब्रह्मलोकः=ब्रह्मलोक (स्वर्ग) है; इति=इस प्रकारकी; प्रियाम्=प्रिय; वाचम्=वाणी; अभिवदन्त्यः=बार-बार कहती हुई (और); अर्चयन्त्यः=उसका आदर-सत्कार करती हुई; तम्=उस; यजमानम्=यजमानको; सूर्यस्य=सूर्यकी; रश्मिभिः=रश्मियोंद्वारा; वहन्ति=ले जाती हैं ॥६॥
व्याख्या —उन प्रदीप्त ज्वालाओंमें दी हुई आहुतियाँ सूर्यकी किरणोंके रूपमें परिणत होकर मरणकालमें उस साधकसे कहती हैं—‘आओ, आओ यह तुम्हारे शुभकर्मोंका फलस्वरूप ब्रह्मलोक अर्थात् भोगरूप सुखोंको भोगनेका स्थान स्वर्गलोक है।’ इस प्रकारकी प्रिय वाणी बार-बार कहती हुई आदर-सत्कारपूर्वक
२४२
ईशादि नौ उपनिषद्
[ मुण्डक १ ]
उसे सूर्यकी किरणोंके मार्गसे ले जाकर स्वर्गलोकमें पहुँचा देती हैं। यहाँ स्वर्गको ब्रह्मलोक कहनेका यह भाव मालूम होता है कि स्वर्गके अधिपति इन्द्र भी भगवान्के ही अपर स्वरूप हैं, अतः प्रकाशन्तरसे ब्रह्म ही हैं॥६॥
सम्बन्ध— अब सांसारिक भोगोंमें वैराग्यकी और परम आनन्दस्वरूप परमेश्वरको पानेकी अभिलाषा उत्पन्न करनेके लिये उपर्युक्त स्वर्गलोकके साधनरूप यज्ञादि सकाम कर्म और उनके फलरूप लौकिक एवं पारलौकिक भोगोंकी तुच्छता बतलाते हैं—
| प्लवा | होते | अदृढा | यज्ञरूपा |
|---|---|---|---|
| अष्टादशोक्तमवरं | येषु | कर्म। | |
| एतच्छ्रेयो | येऽभिन्नन्दन्ति | मूढा | |
| जरामृत्युं | ते | पुनरेवापि | यन्ति॥७॥ |
हि=निश्चय ही; एते=ये; यज्ञरूपाः=यज्ञरूप; अष्टादश प्लवाः=अठारह नौकाएँ; अदृढाः=अदृढ़ (अस्थिर) हैं; येषु=जिनमें; अवरम् कर्म=नीची श्रेणीका उपासनारहित सकाम कर्म; उक्तम्=बताया गया है; ये=जो; मूढाः=मूर्ख; एतत् [ एव ]=यही; श्रेयः=कल्याणका मार्ग है (यों मानकर); अभिन्नन्दन्ति=इसकी प्रशंसा करते हैं; ते=वे; पुनः अपि=बारम्बार; एव=निःसंदेह; जरामृत्युम्=वृद्धावस्था और मृत्युको; यन्ति=प्राप्त होते रहते हैं॥७॥
व्याख्या— इस मन्त्रमें यज्ञको नौकाका रूप दिया गया है और उनकी संख्या अठारह बतलायी गयी है; इससे अनुमान होता है कि नित्य, दर्श, पौर्णमास, चातुर्मास्य आदि भेदोंसे यज्ञके अठारह प्रधान भेद होते हैं। कहना यह है कि जिनमें उपासनारहित सकाम कर्मोंका वर्णन है, ऐसी ये यज्ञरूप अठारह नौकाएँ हैं, जो कि दृढ़ नहीं हैं। इनके द्वारा संसार-समुद्रसे पार होना तो दूर रहा, इस लोकके वर्तमान दुःखरूप छोटी-सी नदीसे पार होकर स्वर्गतक पहुँचनेमें भी संदेह है; क्योंकि तीसरे मन्त्रके वर्णनानुसार किसी भी अङ्गकी कमी रह जानेपर वे साधकको स्वर्गमें नहीं पहुँचा सकती, बीचमें ही छिन्न-भिन्न हो जाती हैं। इसलिये ये अदृढ़ अर्थात् अस्थिर हैं। इस रहस्यको न समझकर जो मूर्खलोग इन सकाम कर्मोंको ही कल्याणका उपाय समझकर—इनके ही
खण्ड २ ]
मुण्डकोपनिषद्
२४३
फलको परम सुख मानकर इनकी प्रशंसा करते रहते हैं, उन्हें निःसंदेह बारम्बार वृद्धावस्था और मरणके दुःख भोगने पड़ते हैं ॥७॥
सम्बन्ध—वे किस प्रकार दुःख भोगते हैं, इसका स्मृष्टीकरण करते हैं—
अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः स्वयंधीराः पण्डितं मन्यमानाः ।
जडून्यमानाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः ॥८॥
अविद्यायाम् अन्तरे=अविद्याके भीतर; वर्तमानाः=स्थित होकर (भी); स्वयंधीराः=अपने-आप बुद्धिमान् बननेवाले (और); पण्डितम् मन्यमानाः=अपनेको विद्वान् माननेवाले; मूढाः=वे मूर्खलोग; जडून्यमानाः=बार-बार आधात (कष्ट) सहन करते हुए; परियन्ति=(ठीक वैसे ही) भटकते रहते हैं; यथा=जैसे; अन्धेन एव=अंधेके द्वारा ही; नीयमानाः=चलाये जानेवाले; अन्धाः=अंधे (अपने लक्ष्यतक न पहुँचकर बीचमें ही इधर-उधर भटकते और कष्ट भोगते रहते हैं) ॥८॥*
व्याख्या—जब अंधे मनुष्यको मार्ग दिखानेवाला भी अंधा ही मिल जाता है, तब जैसे वह अपने अभीष्ट स्थानपर नहीं पहुँच पाता, बीचमें ही ठोकरें खाता भटकता है और कर्टि-कंकड़ोंसे बिंधकर या गहरे गड्ढे आदिमें गिरकर अथवा किसी चट्टान, दीवाल और पशु आदिसे टकराकर नाना प्रकारके कष्ट भोगता है, वैसे ही उन मूर्खोंको भी पशु, पक्षी, कीट, पतंग आदि विविध दुःखपूर्ण योनियोंमें एवं नरकादिमें प्रवेश करके अनन्त जन्मोंतक अनन्त यन्त्रणाओंका भोग करना पड़ता है, जो अपने-आपको ही बुद्धिमान् और विद्वान् समझते हैं; विद्या-बुद्धिके मिथ्याभिमानमें शास्त्र और महापुरुषोंके वचनोंकी कुछ भी परवा न करके उनकी अवहेलना करते हैं और प्रत्यक्ष सुखरूप प्रतीत होनेवाले भोगोंका भोग करनेमें तथा उनके उपायभूत अविद्यामय सकाम कर्मोंमें ही निरन्तर संलग्न रहकर मनुष्यजीवनका अमूल्य समय व्यर्थ नष्ट करते रहते हैं ॥८॥
- यह मन्त्र कठोपनिषद्में भी आया है (क० ३० । १ । १५)।