ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 243, कुल 548 में से
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मुण्डकोपनिषद्
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हि=निश्चय ही; आददायन्=अपने साथ लेकर; एताः=ये; आहुतयः=आहुतियाँ; सूर्यस्य=सूर्यकी; रश्मयः [ भूत्वा ]=किरणें बनकर; नयन्ति=(वहाँ) पहुँचा देती हैं; यत्र=जहाँ; देवानाम्=देवताओंका; एकः=एकमात्र; पतिः=स्वामी (इन्द्र); अधिवासः=निवास करता है ॥५॥
व्याख्या —जो कोई भी साधक पूर्वमन्त्रमें बतलायी हुई सात प्रकारकी लपटोंसे युक्त भलीभाँति प्रज्वलित अग्निमें ठीक समयपर शास्त्रविधिके अनुसार नित्यप्रति आहुति देकर अग्निहोत्र करता है, उसे मरणकालमें अपने साथ लेकर ये आहुतियाँ सूर्यकी किरणें बनकर वहाँ पहुँचा देती हैं, जहाँ देवताओंका एकमात्र स्वामी इन्द्र निवास करता है। तात्पर्य यह कि अग्निहोत्र स्वर्गके सुखोंकी प्राप्तिका अमोघ उपाय है ॥५॥
सम्बन्ध —किस प्रकार ये आहुतियाँ सूर्य-किरणोंद्वारा यजमानको इन्द्रलोकमें ले जाती हैं—ऐसी जिज्ञासा होनेपर कहते हैं—
एद्येहीति तमाहुतयः सुवर्चसः सूर्यस्य रश्मिभिर्यजमानं वहन्ति । प्रियां वाचमभिवदन्त्योऽर्चयन्त्य एष वः पुण्यः सुकृतो ब्रह्मलोकः ॥६॥
सुवर्चसः=(वे) देदीप्यमान; आहुतयः=आहुतियाँ; एहि एहि=आओ, आओ; एषः=यह; वः=तुम्हारे; सुकृतः=शुभकर्मोंसे प्राप्त; पुण्यः=पवित्र; ब्रह्मलोकः=ब्रह्मलोक (स्वर्ग) है; इति=इस प्रकारकी; प्रियाम्=प्रिय; वाचम्=वाणी; अभिवदन्त्यः=बार-बार कहती हुई (और); अर्चयन्त्यः=उसका आदर-सत्कार करती हुई; तम्=उस; यजमानम्=यजमानको; सूर्यस्य=सूर्यकी; रश्मिभिः=रश्मियोंद्वारा; वहन्ति=ले जाती हैं ॥६॥
व्याख्या —उन प्रदीप्त ज्वालाओंमें दी हुई आहुतियाँ सूर्यकी किरणोंके रूपमें परिणत होकर मरणकालमें उस साधकसे कहती हैं—‘आओ, आओ यह तुम्हारे शुभकर्मोंका फलस्वरूप ब्रह्मलोक अर्थात् भोगरूप सुखोंको भोगनेका स्थान स्वर्गलोक है।’ इस प्रकारकी प्रिय वाणी बार-बार कहती हुई आदर-सत्कारपूर्वक