भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ मुण्डक १ ]

काली कराली च मनोजवा च सुलोहिता या च सुधूम्रवर्णा। स्फुलिङ्गिनी विश्वरुची च देवी लेलायमाना इति सम जिह्वाः ॥ ४ ॥

या=जो; काली=काली; कराली=कराली; च=तथा; मनोजवा=मनोजवा; च=और; सुलोहिता=सुलोहिता; च=तथा; सुधूम्रवर्णा=सुधूम्रवर्णा; स्फुलिङ्गिनी=स्फुलिङ्गिनी; च=तथा; विश्वरुची देवी=विश्वरुची देवी; इति=ये (अग्रिकी); सम=सात; लेलायमानाः=लपलपाती हुई; जिह्वाः=जिह्वाएँ हैं ॥ ४ ॥

व्याख्या—काली—काले रंगवाली, कराली—अति उग्र (जिसमें आग लग जानेका डर रहता है), मनोजवा—मनकी भाँति अत्यन्त चञ्चल, सुलोहिता—सुन्दर लाली लिये हुए, सुधूम्रवर्णा—सुन्दर धूपैके-से रंगवाली, स्फुलिङ्गिनी—चिनगारियोंवाली तथा विश्वरुची देवी—सब ओरसे प्रकाशित, देदीप्यमान—इस प्रकार ये सात तरहकी लपटें मानो अग्निदेवकी हविको ग्रहण करनेके लिये लपलपाती हुई सात जिह्वाएँ हैं। अतः जब इस प्रकार अग्निदेवता आहतिरूप भोजन ग्रहण करनेके लिये तैयार हों, उसी समय भोजनरूप आहुतियों प्रदान करनी चाहिये; अन्यथा अप्रज्वलित अथवा बुझी हुई अग्निमें दी हुई आहुति राखमें मिलकर व्यर्थ नष्ट हो जाती हैं ॥ ४ ॥

सम्बन्ध—उपर्युक्त प्रकारसे प्रदीप्त अग्निमें नियमपूर्वक नित्यप्रति हवन करनेका फल बतलाते हैं—

एतेषु यश्चरते भ्राजमानेषु यथाकालं चाहृतयो ह्याददायन्। तं नयन्त्येताः सूर्यस्य रश्मयो यत्र देवानां पतिरेकोऽधिवासः ॥ ५ ॥

यः च=जो कोई भी अग्निहोत्री; एतेषु भ्राजमानेषु=इन देदीप्यमान ज्वालाओंमें; यथाकालम्=ठीक समयपर; चरते=अग्निहोत्र करता है; तम्=उस अग्निहोत्रीको;