भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 241, कुल 548 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 241

खण्ड २]

मुण्डकोपनिषद्

२३१

अहृतमवैश्वदेवमविधिना हृत- माससमास्तस्य लोकान् हिनस्ति ॥ ३ ॥

यस्य=जिसका; अग्निहोत्रम्=अग्निहोत्र; अदर्शम्=दर्श नामक यज्ञसे रहित है; अपौर्णमासम्=पौर्णमास नामक यज्ञसे रहित है; अचातुर्मास्यम्=चातुर्मास्य नामक यज्ञसे रहित है; अनाग्रयणम्=आग्रयण कर्मसे रहित है; च=तथा; अतिथिवर्जितम्=जिसमें अतिथि सत्कार नहीं किया जाता; अहृतम्=जिसमें समयपर आहुति नहीं दी जाती; अवैश्वदेवम्=जो बलिवैश्वदेव नामक कर्मसे रहित है; (तथा) अविधिना हृतम्=जिसमें शास्त्रविधिकी अवहेलना करके हवन किया गया है; ऐसा अग्निहोत्र; तस्य=उस अग्निहोत्रीके; आससमान्=सातों; लोकान्=पुण्यलोकोंका; हिनस्ति=नाश कर देता है ॥ ३ ॥

व्याख्या —नित्य अग्निहोत्र करनेवाला मनुष्य यदि दर्श१ और पौर्णमासयज्ञ२ नहीं करता या चातुर्मास्ययज्ञ३ नहीं करता अथवा शरद् और वसन्त ऋतुओंमें की जानेवाली नवीन अन्नकी इष्टिरूप आग्रयण यज्ञ नहीं करता, यदि उसकी यज्ञशालामें अतिथियोंका विधिपूर्वक सत्कार नहीं किया जाता या वह नित्य अग्निहोत्रमें ठीक समयपर और शास्त्रविधिके अनुसार हवन नहीं करता एवं बलिवैश्वदेव कर्म नहीं करता, तो उस अग्निहोत्र करनेवाले मनुष्यके सातों लोकोंको वह अङ्गहीन अग्निहोत्र नष्ट कर देता है। अर्थात् उस यज्ञके द्वारा उसे मिलनेवाले जो पृथ्वीलोकसे लेकर सत्यलोकतक सातों लोकोंमें प्राप्त होनेयोग्य भोग हैं, उनसे वह वञ्चित रह जाता है ॥ ३ ॥

सम्बन्ध —दूसरे मन्त्रमें यह बात कही गयी थी कि जब अग्निमें लपटें निकलने लगीं तब आहुति देनी चाहिये; अतः अब उन लपटोंके प्रकार-भेद और नाम बतलाते हैं—

१-प्रत्येक अमावस्याको की जानेवाली इष्टि।

२-प्रत्येक पूर्णिमाको की जानेवाली इष्टि।

३-चार महीनोंमें पूरा होनेवाला एक श्रौत यागविशेष।