भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 244, कुल 548 में से

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ मुण्डक १ ]

उसे सूर्यकी किरणोंके मार्गसे ले जाकर स्वर्गलोकमें पहुँचा देती हैं। यहाँ स्वर्गको ब्रह्मलोक कहनेका यह भाव मालूम होता है कि स्वर्गके अधिपति इन्द्र भी भगवान्के ही अपर स्वरूप हैं, अतः प्रकाशन्तरसे ब्रह्म ही हैं॥६॥

सम्बन्ध— अब सांसारिक भोगोंमें वैराग्यकी और परम आनन्दस्वरूप परमेश्वरको पानेकी अभिलाषा उत्पन्न करनेके लिये उपर्युक्त स्वर्गलोकके साधनरूप यज्ञादि सकाम कर्म और उनके फलरूप लौकिक एवं पारलौकिक भोगोंकी तुच्छता बतलाते हैं—

प्लवाहोतेअदृढायज्ञरूपा
अष्टादशोक्तमवरंयेषुकर्म।
एतच्छ्रेयोयेऽभिन्नन्दन्तिमूढा
जरामृत्युंतेपुनरेवापियन्ति॥७॥

हि=निश्चय ही; एते=ये; यज्ञरूपाः=यज्ञरूप; अष्टादश प्लवाः=अठारह नौकाएँ; अदृढाः=अदृढ़ (अस्थिर) हैं; येषु=जिनमें; अवरम् कर्म=नीची श्रेणीका उपासनारहित सकाम कर्म; उक्तम्=बताया गया है; ये=जो; मूढाः=मूर्ख; एतत् [ एव ]=यही; श्रेयः=कल्याणका मार्ग है (यों मानकर); अभिन्नन्दन्ति=इसकी प्रशंसा करते हैं; ते=वे; पुनः अपि=बारम्बार; एव=निःसंदेह; जरामृत्युम्=वृद्धावस्था और मृत्युको; यन्ति=प्राप्त होते रहते हैं॥७॥

व्याख्या— इस मन्त्रमें यज्ञको नौकाका रूप दिया गया है और उनकी संख्या अठारह बतलायी गयी है; इससे अनुमान होता है कि नित्य, दर्श, पौर्णमास, चातुर्मास्य आदि भेदोंसे यज्ञके अठारह प्रधान भेद होते हैं। कहना यह है कि जिनमें उपासनारहित सकाम कर्मोंका वर्णन है, ऐसी ये यज्ञरूप अठारह नौकाएँ हैं, जो कि दृढ़ नहीं हैं। इनके द्वारा संसार-समुद्रसे पार होना तो दूर रहा, इस लोकके वर्तमान दुःखरूप छोटी-सी नदीसे पार होकर स्वर्गतक पहुँचनेमें भी संदेह है; क्योंकि तीसरे मन्त्रके वर्णनानुसार किसी भी अङ्गकी कमी रह जानेपर वे साधकको स्वर्गमें नहीं पहुँचा सकती, बीचमें ही छिन्न-भिन्न हो जाती हैं। इसलिये ये अदृढ़ अर्थात् अस्थिर हैं। इस रहस्यको न समझकर जो मूर्खलोग इन सकाम कर्मोंको ही कल्याणका उपाय समझकर—इनके ही

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