भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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खण्ड २ ]

मुण्डकोपनिषद्

२४३

फलको परम सुख मानकर इनकी प्रशंसा करते रहते हैं, उन्हें निःसंदेह बारम्बार वृद्धावस्था और मरणके दुःख भोगने पड़ते हैं ॥७॥

सम्बन्ध—वे किस प्रकार दुःख भोगते हैं, इसका स्मृष्टीकरण करते हैं—

अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः स्वयंधीराः पण्डितं मन्यमानाः ।

जडून्यमानाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः ॥८॥

अविद्यायाम् अन्तरे=अविद्याके भीतर; वर्तमानाः=स्थित होकर (भी); स्वयंधीराः=अपने-आप बुद्धिमान् बननेवाले (और); पण्डितम् मन्यमानाः=अपनेको विद्वान् माननेवाले; मूढाः=वे मूर्खलोग; जडून्यमानाः=बार-बार आधात (कष्ट) सहन करते हुए; परियन्ति=(ठीक वैसे ही) भटकते रहते हैं; यथा=जैसे; अन्धेन एव=अंधेके द्वारा ही; नीयमानाः=चलाये जानेवाले; अन्धाः=अंधे (अपने लक्ष्यतक न पहुँचकर बीचमें ही इधर-उधर भटकते और कष्ट भोगते रहते हैं) ॥८॥*

व्याख्या—जब अंधे मनुष्यको मार्ग दिखानेवाला भी अंधा ही मिल जाता है, तब जैसे वह अपने अभीष्ट स्थानपर नहीं पहुँच पाता, बीचमें ही ठोकरें खाता भटकता है और कर्टि-कंकड़ोंसे बिंधकर या गहरे गड्ढे आदिमें गिरकर अथवा किसी चट्टान, दीवाल और पशु आदिसे टकराकर नाना प्रकारके कष्ट भोगता है, वैसे ही उन मूर्खोंको भी पशु, पक्षी, कीट, पतंग आदि विविध दुःखपूर्ण योनियोंमें एवं नरकादिमें प्रवेश करके अनन्त जन्मोंतक अनन्त यन्त्रणाओंका भोग करना पड़ता है, जो अपने-आपको ही बुद्धिमान् और विद्वान् समझते हैं; विद्या-बुद्धिके मिथ्याभिमानमें शास्त्र और महापुरुषोंके वचनोंकी कुछ भी परवा न करके उनकी अवहेलना करते हैं और प्रत्यक्ष सुखरूप प्रतीत होनेवाले भोगोंका भोग करनेमें तथा उनके उपायभूत अविद्यामय सकाम कर्मोंमें ही निरन्तर संलग्न रहकर मनुष्यजीवनका अमूल्य समय व्यर्थ नष्ट करते रहते हैं ॥८॥

  • यह मन्त्र कठोपनिषद्में भी आया है (क० ३० । १ । १५)।