भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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२३४ ईशादि नौ उपनिषद् [ मुण्डक १

वे अत्यन्त सूक्ष्म, व्यापक, अन्तरात्मारूपसे सबमें फैले हुए और कभी नाश न होनेवाले सर्वथा नित्य हैं। समस्त प्राणियोंके उन परम कारणको ज्ञानीजन सर्वत्र परिपूर्ण देखते हैं॥ ६॥

**सम्बन्ध—**वे जगदात्मा परमेश्वर समस्त भूतोंके परम कारण कैसे हैं, सम्पूर्ण जगत् उनसे किस प्रकार उत्पन्न होता है, इस जिज्ञासापर कहते हैं—

यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च
यथा पृथिव्यामोषधयः सम्भवन्ति।
यथा सतः पुरुषात्केशलोमानि
तथाक्षरात्सम्भवतीह विश्वम्॥ ७॥

यथा=जिस प्रकार; ऊर्णनाभिः=मकड़ी; सृजते=(जालेको) बनाती है; =और; गृह्णते=निगल जाती है (तथा); यथा=जिस प्रकार; पृथिव्याम्=पृथ्वीमें; ओषधयः=नाना प्रकारकी ओषधियाँ; सम्भवन्ति=उत्पन्न होती हैं (और); यथा=जिस प्रकार; सतः पुरुषात्=जीवित मनुष्यसे; केशलोमानि=केश और रोएँ (उत्पन्न होते हैं); तथा=उसी प्रकार; अक्षरात्=अविनाशी परब्रह्मसे; इह=यहाँ (इस सृष्टिमें); विश्वम्=सब कुछ; सम्भवति=उत्पन्न होता है॥ ७॥

**व्याख्या—**इस मन्त्रमें तीन दृष्टान्तोंद्वारा यह बात समझायी गयी है कि परब्रह्म परमेश्वर ही इस जड-चेतनात्मक सम्पूर्ण जगत्के निमित्त और उपादान कारण हैं। पहले मकड़ीके दृष्टान्तसे यह बात कही गयी है कि जिस प्रकार मकड़ी अपने पेटमें स्थित जालेको बाहर निकालकर फैलाती है और फिर उसे निगल जाती है, उसी प्रकार वह परब्रह्म परमेश्वर अपने अंदर सूक्ष्मरूपसे लीन हुए जड-चेतनरूप जगत्को सृष्टिके आरम्भमें नाना प्रकारसे उत्पन्न करके फैलाते हैं और प्रलयकालमें पुनः उसे अपनेमें लीन कर लेते हैं (गीता ९। ७-८)। दूसरे उदाहरणसे यह बात समझायी है कि जिस प्रकार पृथ्वीमें जैसे-जैसे अन्न, तृण, वृक्ष, लता आदि ओषधियोंके बीज पड़ते हैं, उसी प्रकारकी भिन्न-भिन्न भेदोंवाली ओषधियाँ वहाँ उत्पन्न हो जाती हैं—उसमें पृथ्वीका कोई पक्षपात नहीं है, उसी प्रकार जीवोंके विभिन्न कर्मरूप बीजोंके अनुसार ही भगवान् उनको