ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 235, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड १ ] मुण्डकोपनिषद् २३३
‘निरुक्त’ कहते हैं। वैदिक छन्दोंकी जाति और भेद बतलानेवाली विद्या ‘छन्द’ कहलाती है। ग्रह और नक्षत्रोंकी स्थिति, गति और उनके साथ हमारा क्या सम्बन्ध है—इन सब बातोंपर जिसमें विचार किया गया है, वह ‘ज्योतिष’ विद्या है। इस प्रकार चार वेद और छः वेदाङ्ग—इन दसका नाम अपरा विद्या है; और जिसके द्वारा परब्रह्म अविनाशी परमात्माका तत्त्वज्ञान होता है, वह परा विद्या है। उसका वर्णन भी वेदोंमें ही है, अतः उतने अंशको छोड़कर अन्य सब वेद और वेदाङ्गोंको अपरा विद्याके अन्तर्गत समझना चाहिये ॥ ५ ॥
सम्बन्ध— ऊपर बतलायी हुई परा विद्याके द्वारा जिसका ज्ञान होता है, वह अविनाशी ब्रह्म कैसा है—इस जिज्ञासापर कहते हैं—
यत्तदद्रेश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्णमचक्षुःश्रोत्रं तदपाणिपादम्।
नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं तदव्ययं यद्भूतयोनिं परिपश्यन्ति धीराः ॥ ६ ॥
तत्=वह; यत्=जो; अद्रेश्यम्=जाननेमें न आनेवाला; अग्राह्यम्=पकड़नेमें न आनेवाला; अगोत्रम्=गोत्र आदिसे रहित; अवर्णम्=रंग और आकृतिसे रहित; अचक्षुःश्रोत्रम्=नेत्र, कान आदि ज्ञानेन्द्रियोंसे (भी) रहित; अपाणिपादम्=(और) हाथ, पैर आदि कर्मेन्द्रियोंसे (भी) रहित है; [ तथा ]=तथा; तत्=वह; यत्=जो; नित्यम्=नित्य; विभुम्=सर्वव्यापी; सर्वगतम्=सबमें फैला हुआ; सुसूक्ष्मम्=अत्यन्त सूक्ष्म (और); अव्ययम्=अविनाशी परब्रह्म है; तत्=उस; भूतयोनिम्=समस्त प्राणियोंके परम कारणको; धीराः=ज्ञानीजन; परिपश्यन्ति=सर्वत्र परिपूर्ण देखते हैं ॥ ६ ॥
व्याख्या— इस मन्त्रमें परब्रह्म परमेश्वरके निराकार स्वरूपका वर्णन किया गया है। सारांश यह है कि वे परब्रह्म परमेश्वर ज्ञानेन्द्रियोंद्वारा जाननेमें नहीं आते, न कर्मेन्द्रियोंद्वारा पकड़नेमें ही आते हैं। वे गोत्र आदि उपाधियोंसे रहित तथा ब्राह्मण आदि वर्णगतभेदसे एवं रंग और आकृतिसे भी सर्वथा रहित हैं; वे नेत्र, कान आदि ज्ञानेन्द्रियोंसे और हाथ, पैर आदि कर्मेन्द्रियोंसे भी रहित हैं। तथा