भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ मुण्डक १ ]

ब्रह्मको जाननेवाले महर्षियोंका कहना है कि मनुष्यके लिये जाननेयोग्य दो विद्याएँ हैं—एक तो परा और दूसरी अपरा ॥ ४ ॥

तत्रापरा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिषमिति। अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते ॥ ५ ॥

तत्र=उन दोनोंमेंसे; ऋग्वेदः=ऋग्वेद; यजुर्वेदः=यजुर्वेद; सामवेदः=सामवेद (तथा); अथर्ववेदः=अथर्ववेद; शिक्षा=शिक्षा; कल्पः=कल्प; व्याकरणम्=व्याकरण; निरुक्तम्=निरुक्त; छन्दः=छन्द; ज्योतिषम्=ज्योतिष; इति अपरा=ये (सब तो) अपरा विद्या (के अन्तर्गत हैं); अथ=तथा; यया=जिससे; तत्=वह; अक्षरम्=अविनाशी परब्रह्म; अधिगम्यते=तत्त्वसे जाना जाता है; [ सा ]=वह; परा=परा विद्या (है) ॥ ५ ॥

व्याख्या —उन दोनोंमेंसे जिसके द्वारा इस लोक और परलोकसम्बन्धी भोगों तथा उनकी प्राप्तिके साधनोंका ज्ञान प्राप्त किया जाता है, जिसमें भोगोंकी स्थिति, भोगोंके उपभोग करनेके प्रकार, भोग-सामग्रीकी रचना और उनको उपलब्ध करनेके नाना साधन आदिका वर्णन है, वह तो अपरा विद्या है; जैसे ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद—ये चारों वेद। इनमें नाना प्रकारके यज्ञोंकी विधिका और उनके फलका विस्तारपूर्वक वर्णन है। जगत्के सभी पदार्थोंका एवं विषयोंका वेदोंमें भलीभाँति वर्णन किया गया है। यह अवश्य है कि इस समय वेदकी सब शाखाएँ उपलब्ध नहीं हैं और उनमें वर्णित विविध विज्ञानसम्बन्धी बातोंको समझनेवाले भी नहीं हैं। वेदोंका पाठ अर्थात् यथार्थ उच्चारण करनेकी विधिका उपदेश ‘शिक्षा’ है। जिसमें यज्ञयाग आदिकी विधि बतलायी गयी है, उसे ‘कल्प’ कहते हैं (गृह्यसूत्र आदिकी गणना कल्पमें ही है)। वैदिक और लौकिक शब्दोंके अनुशासनका—प्रकृति-प्रत्यय-विभागपूर्वक शब्दसाधनकी प्रक्रिया, शब्दार्थबोधके प्रकार एवं शब्दप्रयोग आदिके नियमोंके उपदेशका नाम ‘व्याकरण’ है। वैदिक शब्दोंका जो कोष है जिसमें अमुक पद अमुक वस्तुका वाचक है—यह बात कारणसहित बतायी गयी है, उसको