ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 233, कुल 548 में से
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मुण्डकोपनिषद्
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नामक ऋषिको कही। भारद्वाज ऋषिने परम्परासे चली आती हुई ब्रह्मके पर और अपर—दोनों स्वरूपोंका ज्ञान करानेवाली इस ब्रह्मविद्याका उपदेश अङ्गिरा नामक ऋषिको दिया॥ २ ॥
शौनको ह वै महाशालोऽङ्गिरसं विधिवदुपसन्नः पप्रच्छ। कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवतीति॥ ३ ॥
ह=विख्यात है (कि); शौनकः=वै=शौनक नामसे प्रसिद्ध मुनि; महाशालः=जो अति बृहत् विद्यालय (ऋषिकुल) के अधिष्ठाता थे; विधिवत्=शास्त्रविधिके अनुसार; अङ्गिरसम् उपसन्नः=महर्षि अङ्गिराके पास आये (और उनसे); पप्रच्छ= (विनयपूर्वक) पूछा; भगवः=भगवन्!; नु=निश्चयपूर्वक; कस्मिन् विज्ञाते=किसके जान लिये जानेपर; इदम्=यह; सर्वम्=सब कुछ; विज्ञातम्=जाना हुआ; भवति=हो जाता है; इति=यह (मेरा प्रश्न है)॥ ३ ॥
व्याख्या —शौनक नामसे प्रसिद्ध एक महर्षि थे, जो बड़े भारी विश्वविद्यालयके अधिष्ठाता थे; पुराणोंके अनुसार उनके ऋषिकुलमें अट्ठासी हजार ऋषि रहते थे। वे उपर्युक्त ब्रह्मविद्याको जाननेके लिये शास्त्रविधिके अनुसार हाथमें समिधा लेकर श्रद्धापूर्वक महर्षि अङ्गिराके पास आये। उन्होंने अत्यन्त विनयपूर्वक महर्षिसे पूछा—‘भगवन्! जिसको भलीभाँति जान लेनेपर यह जो कुछ देखने, सुनने और अनुमान करनेमें आता है, सब-का-सब जान लिया जाता है, वह परम तत्त्व क्या है? कृपया बतलाइये कि उसे कैसे जाना जाय?॥ ३ ॥
तस्मै स होवाच। द्वे विद्ये वेदितव्ये इति ह स्म यद्ब्रह्मविदो वदन्ति परा चैवापरा च॥ ४ ॥
तस्मै=उन शौनक मुनिसे; सः ह=वे विख्यात महर्षि अङ्गिरा; उवाच=बोले; ब्रह्मविदः=ब्रह्मको जाननेवाले; इति=इस प्रकार; ह=निश्चयपूर्वक; वदन्ति स्म यत्=कहते आये हैं कि; द्वे विद्ये=दो विद्याएँ; एव=ही; वेदितव्ये=जाननेयोग्य हैं; परा=एक परा; च=और; अपरा=दूसरी अपरा; च=भी॥ ४ ॥
व्याख्या —इस प्रकार शौनकके पूछनेपर महर्षि अङ्गिरा बोले—‘शौनक!