भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ मुण्डक १ ]

जाता है। इसके द्वारा यहाँ यह सूचित किया गया है कि मनुष्यको प्रत्येक कार्यके आरम्भमें ईश्वरका स्मरण तथा उनके नामका उच्चारण अवश्य करना चाहिये।

विश्वस्य कर्ता=सम्पूर्ण जगत्के रचयिता (और); भुवनस्य गोसा=सब लोकोंकी रक्षा करनेवाले; ब्रह्मा=(चतुर्मुख) ब्रह्माजी; देवानाम्=सब देवताओंमें; प्रथमः=पहले; सम्बभूव=प्रकट हुए; सः=उन्होंने; ज्येष्ठपुत्राय अथर्वाय=सबसे बड़े पुत्र अथर्वाको; सर्वविद्याप्रतिष्ठाम्=समस्त विद्याओंकी आधारभूता; ब्रह्मविद्याम् प्राह=ब्रह्मविद्याका भलीभाँति उपदेश किया ॥ १ ॥

व्याख्या—सर्वशक्तिमान् परब्रह्म परमेश्वरसे देवताओंमें सर्वप्रथम ब्रह्मा प्रकट हुए। फिर इन्होंने ही सब देवताओं, महर्षियों और मरीचि आदि प्रजापतियोंको उत्पन्न किया। साथ ही, समस्त लोकोंकी रचना भी की तथा उन सबकी रक्षाके सुदृढ़ नियम आदि बनाये। उनके सबसे बड़े पुत्र महर्षि अथर्वा थे; उन्हींको सबसे पहले ब्रह्माजीने ब्रह्मविद्याका उपदेश दिया था। जिस विद्यासे ब्रह्मके पर और अपर—दोनों स्वरूपोंका पूर्णतया ज्ञान हो, उसे ब्रह्मविद्या कहते हैं; यह सम्पूर्ण विद्याओंकी आश्रय है ॥ १ ॥

अथर्वणे यां प्रवदेत ब्रह्मा- शर्वा तां पुरोवाच्छङ्गिरे ब्रह्मविद्याम्। स भारद्वाजाय सत्यवहाय प्राह भारद्वाजोऽङ्गिरे परावराम् ॥ २ ॥

ब्रह्मा=ब्रह्माने; याम्=जिस विद्याका; अथर्वणे=अथर्वाको; प्रवदेत=उपदेश दिया था; ताम् ब्रह्मविद्याम्=उसी ब्रह्मविद्याको; अथर्वा=अथर्वाने; पुरा=पहले; अङ्गिरे=अङ्गी ऋषिसे; उवाच=कहा था; सः=उन अङ्गी ऋषिने; भारद्वाजाय=भरद्वाजगोत्री; सत्यवहाय=सत्यवह नामक ऋषिको; प्राह=बतलायी; भारद्वाजः=भारद्वाजने; परावराम्=पहलेवालोंसे पीछेवालोंको प्राप्त हुई उस परम्परागत विद्याको; अङ्गिरेसे=अङ्गिा नामक ऋषिसे; [ प्राह ]=कहा ॥ २ ॥

व्याख्या—अथर्वा ऋषिको जो ब्रह्मविद्या ब्रह्मासे मिली थी, वही ब्रह्मविद्या उन्होंने अङ्गी ऋषिको बतलायी और अङ्गीने भरद्वाजगोत्रमें उत्पन्न सत्यवह