भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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खण्ड १ ] मुण्डकोपनिषद् २३५

भिन्न-भिन्न योनियोंमें उत्पन्न करते हैं, अतः उनमें किसी प्रकारकी विषमता और निर्दयताका दोष नहीं है (ब्रह्मसूत्र २।१।३४)। तीसरे मनुष्य-शरीरके उदाहरणसे यह बात समझायी गयी है कि जिस प्रकार मनुष्यके जीवित शरीरसे सर्वथा विलक्षण केश, रोएँ और नख अपने-आप उत्पन्न होते और बढ़ते रहते हैं—उसके लिये उसको कोई कार्य नहीं करना पड़ता, उसी प्रकार परब्रह्म परमेश्वरसे यह जगत् स्वभावसे ही समयपर उत्पन्न हो जाता है और विस्तारको प्राप्त होता है; इसके लिये भगवान्‌को कोई प्रयत्न नहीं करना पड़ता, इसीलिये भगवान्‌ने गीतामें कहा है कि 'मैं इस जगत्‌को बनानेवाला होनेपर भी अकर्ता ही हूँ' (४।१३), 'उदासीनकी तरह स्थित रहनेवाला मुझ परमेश्वरको वे कर्म लिस नहीं करते' (९।९) इत्यादि ॥ ७ ॥

**सम्बन्ध—**अब संक्षेपमें जगत्‌की उत्पत्तिका क्रम बतलाते हैं—

तपसा चीयते ब्रह्म ततोऽन्नमभिजायते । अन्नात्प्राणो मनः सत्यं लोकाः कर्मसु चामृतम् ॥ ८ ॥

ब्रह्म = परब्रह्म; तपसा = संकल्परूप तपसे; चीयते = उपचय (वृद्धि) को प्राप्त होता है; ततः = उससे; अन्नम् = अन्न; अभिजायते = उत्पन्न होता है; अन्नात् = अन्नसे (क्रमशः); प्राणः = प्राण; मनः = मन; सत्यम् = सत्य (पाँच महाभूत); लोकाः = समस्त लोक (और कर्म); = तथा; कर्मसु = कर्मोंसे; अमृतम् = अवश्यम्भावी सुख-दुःखरूप फल उत्पन्न होता है ॥ ८ ॥

**व्याख्या—**जब जगत्‌की रचनाका समय आता है, उस समय परब्रह्म परमेश्वर अपने संकल्परूप तपसे वृद्धिको प्राप्त होते हैं, अर्थात् उनमें विविध रूपोंवाली सृष्टिके निर्माणका संकल्प उठता है। जीवोंके कर्मानुसार उन परब्रह्म पुरुषोत्तममें जो सृष्टिके आदिमें स्फुरणा होती है, वही मानो उनका तप है; उस स्फुरणाके होते ही भगवान्, जो पहले अत्यन्त सूक्ष्मरूपमें रहते हैं, (जिसका वर्णन छठे मन्त्रमें आ चुका है) उसकी अपेक्षा स्थूल हो जाते हैं अर्थात् वे सृष्टिकर्ता ब्रह्माका रूप धारण कर लेते हैं। ब्रह्मासे सब प्राणियोंकी उत्पत्ति और वृद्धि करनेवाला अन्न उत्पन्न होता है। फिर अन्नसे क्रमशः प्राण, मन, कार्यरूप