भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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२३६ ईशादि नौ उपनिषद् [ मुण्डक १

आकाशादि पाँच महाभूत, समस्त प्राणी और उनके वासस्थान, उनके भिन्न-भिन्न कर्म और उन कर्मोंसे उनका अवश्यम्भावी सुख-दुःखरूप फल—इस प्रकार यह सम्पूर्ण जगत् उत्पन्न होता है॥८॥

सम्बन्ध— अब परमेश्वरकी महिमाका वर्णन करते हुए इस प्रकरणका उपसंहार करते हैं—

यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तपः।
तस्मादेतद्ब्रह्म नाम रूपमन्नं च जायते॥९॥

यः=जो; सर्वज्ञः=सर्वज्ञ (तथा); सर्ववित्=सबको जाननेवाला (है); यस्य=जिसका; ज्ञानमयम्=ज्ञानमय; तपः=तप (है); तस्मात्=उसी परमेश्वरसे; एतत्=यह; ब्रह्म=विराट्स्वरूप जगत्; =तथा; नाम=नाम; रूपम्=रूप (और); अन्नम्=भोजन; जायते=उत्पन्न होते हैं॥९॥

व्याख्या— वे सम्पूर्ण जगत्के कारणभूत परम पुरुष परमेश्वर साधारण-रूपसे तथा विशेषरूपसे भी सबको भलीभाँति जानते हैं, उन परब्रह्मका एकमात्र ज्ञान ही तप है। उन्हें साधारण मनुष्योंकी भाँति जगत्की उत्पत्तिके लिये कष्ट-सहनरूप तप नहीं करना पड़ता। उन सर्वशक्तिमान् परब्रह्म परमेश्वरके संकल्पमात्रसे ही यह प्रत्यक्ष दीखनेवाला विराट्स्वरूप जगत् (जिसे अपर ब्रह्म कहते हैं) अपने-आप प्रकट हो जाता है और समस्त प्राणियों तथा लोकोंके नाम, रूप और आहार आदि भी उत्पन्न हो जाते हैं॥९॥

शौनक ऋषिने यह पूछा था कि ‘किसको जाननेसे यह सब कुछ जान लिया जाता है ?’ इसके उत्तरमें समस्त जगत्के परम कारण परब्रह्म परमात्मासे जगत्की उत्पत्ति बतलाकर संक्षेपमें यह बात समझायी गयी कि ‘उन सर्व-शक्तिमान्, सर्वज्ञ, सबके कर्ता-धर्ता परमेश्वरको जान लेनेपर यह सब कुछ ज्ञात हो जाता है’॥९॥

॥ प्रथम खण्ड समाप्त ॥ १ ॥