ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 239, कुल 548 में से
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मुण्डकोपनिषद्
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द्वितीय खण्ड
सम्बन्ध —पहले खण्डके चौथे मन्त्रमें परा और अपरा—इन दो विद्याओंको जाननेयोग्य बताया था, उनमेंसे अब इस खण्डमें अपरा विद्याका स्वरूप और फल बतलाकर परा विद्याकी जिज्ञासा उत्पन्न की जाती है—
तदेतत्सत्यं मन्त्रेषु कर्माणि कवयो यान्यपश्यंस्तानि त्रेतायां बहुधा संततानि। तान्याचरथ नियतं सत्यकामा एष वः पन्थाः सुकृतस्य लोके ॥ १ ॥
तत्=वह; एतत्=यह; सत्यम्=सत्य है कि; कवयः=बुद्धिमान् ऋषियोंने; यानि=जिन; कर्माणि=कर्मोंको; मन्त्रेषु=वेद-मन्त्रोंमें; अपश्यन्=देखा था; तानि=वे; त्रेतायाम्=तीनों वेदोंमें; बहुधा=बहुत प्रकारसे; संततानि=व्याप्त हैं; सत्यकामाः=हे सत्यको चाहनेवाले मनुष्यो! (तुमलोग); तानि=उनका; नियतम्=नियमपूर्वक; आचरथ=अनुष्ठान करो; लोके=इस मनुष्य-शरीरमें; वः=तुम्हारे लिये; एषः=यही; सुकृतस्य=शुभकर्मकी फल-प्राप्तिका; पन्थाः=मार्ग हैं ॥ १ ॥
व्याख्या —यह सर्वथा सत्य है कि बुद्धिमान् महर्षियोंने जिन उन्नतिके साधनरूप यज्ञादि नाना प्रकारके कर्मोंको वेद-मन्त्रोंमें पहले देखा था, वे कर्म ऋक्, यजुः और साम—इन तीनों वेदोंमें बहुत प्रकारसे विस्तारपूर्वक वर्णित हैं (गीता ४। ३२)*। अतः जागतिक उन्नति चाहनेवाले मनुष्योंको उन्हें भलीभाँति जानकर नियमपूर्वक उन कर्मोंको करते रहना चाहिये। इस मनुष्य-शरीरमें यही उन्नतिका सुन्दर मार्ग है। आलस्य और प्रमादमें या भोगोंको भोगनेमें पशुओंकी भाँति जीवन बिता देना मनुष्य-शरीरके उपयुक्त नहीं है। यही इस मन्त्रका भाव है ॥ १ ॥
- प्रधानरूपसे वेदोंकी संख्या तीन ही मानी गयी है। जहाँ-तहाँ 'वेदत्रयी' आदि नामोंसे ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद—इन तीनका ही उल्लेख मिलता है। ऐसे स्थलोंमें चौथे अथर्ववेदको उक्त तीनोंके अन्तर्गत ही मानना चाहिये।