ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
२३४ ईशादि नौ उपनिषद् [ मुण्डक १
वे अत्यन्त सूक्ष्म, व्यापक, अन्तरात्मारूपसे सबमें फैले हुए और कभी नाश न होनेवाले सर्वथा नित्य हैं। समस्त प्राणियोंके उन परम कारणको ज्ञानीजन सर्वत्र परिपूर्ण देखते हैं॥ ६॥
**सम्बन्ध—**वे जगदात्मा परमेश्वर समस्त भूतोंके परम कारण कैसे हैं, सम्पूर्ण जगत् उनसे किस प्रकार उत्पन्न होता है, इस जिज्ञासापर कहते हैं—
यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च
यथा पृथिव्यामोषधयः सम्भवन्ति।
यथा सतः पुरुषात्केशलोमानि
तथाक्षरात्सम्भवतीह विश्वम्॥ ७॥
यथा=जिस प्रकार; ऊर्णनाभिः=मकड़ी; सृजते=(जालेको) बनाती है; च=और; गृह्णते=निगल जाती है (तथा); यथा=जिस प्रकार; पृथिव्याम्=पृथ्वीमें; ओषधयः=नाना प्रकारकी ओषधियाँ; सम्भवन्ति=उत्पन्न होती हैं (और); यथा=जिस प्रकार; सतः पुरुषात्=जीवित मनुष्यसे; केशलोमानि=केश और रोएँ (उत्पन्न होते हैं); तथा=उसी प्रकार; अक्षरात्=अविनाशी परब्रह्मसे; इह=यहाँ (इस सृष्टिमें); विश्वम्=सब कुछ; सम्भवति=उत्पन्न होता है॥ ७॥
**व्याख्या—**इस मन्त्रमें तीन दृष्टान्तोंद्वारा यह बात समझायी गयी है कि परब्रह्म परमेश्वर ही इस जड-चेतनात्मक सम्पूर्ण जगत्के निमित्त और उपादान कारण हैं। पहले मकड़ीके दृष्टान्तसे यह बात कही गयी है कि जिस प्रकार मकड़ी अपने पेटमें स्थित जालेको बाहर निकालकर फैलाती है और फिर उसे निगल जाती है, उसी प्रकार वह परब्रह्म परमेश्वर अपने अंदर सूक्ष्मरूपसे लीन हुए जड-चेतनरूप जगत्को सृष्टिके आरम्भमें नाना प्रकारसे उत्पन्न करके फैलाते हैं और प्रलयकालमें पुनः उसे अपनेमें लीन कर लेते हैं (गीता ९। ७-८)। दूसरे उदाहरणसे यह बात समझायी है कि जिस प्रकार पृथ्वीमें जैसे-जैसे अन्न, तृण, वृक्ष, लता आदि ओषधियोंके बीज पड़ते हैं, उसी प्रकारकी भिन्न-भिन्न भेदोंवाली ओषधियाँ वहाँ उत्पन्न हो जाती हैं—उसमें पृथ्वीका कोई पक्षपात नहीं है, उसी प्रकार जीवोंके विभिन्न कर्मरूप बीजोंके अनुसार ही भगवान् उनको
खण्ड १ ] मुण्डकोपनिषद् २३५
भिन्न-भिन्न योनियोंमें उत्पन्न करते हैं, अतः उनमें किसी प्रकारकी विषमता और निर्दयताका दोष नहीं है (ब्रह्मसूत्र २।१।३४)। तीसरे मनुष्य-शरीरके उदाहरणसे यह बात समझायी गयी है कि जिस प्रकार मनुष्यके जीवित शरीरसे सर्वथा विलक्षण केश, रोएँ और नख अपने-आप उत्पन्न होते और बढ़ते रहते हैं—उसके लिये उसको कोई कार्य नहीं करना पड़ता, उसी प्रकार परब्रह्म परमेश्वरसे यह जगत् स्वभावसे ही समयपर उत्पन्न हो जाता है और विस्तारको प्राप्त होता है; इसके लिये भगवान्को कोई प्रयत्न नहीं करना पड़ता, इसीलिये भगवान्ने गीतामें कहा है कि 'मैं इस जगत्को बनानेवाला होनेपर भी अकर्ता ही हूँ' (४।१३), 'उदासीनकी तरह स्थित रहनेवाला मुझ परमेश्वरको वे कर्म लिस नहीं करते' (९।९) इत्यादि ॥ ७ ॥
**सम्बन्ध—**अब संक्षेपमें जगत्की उत्पत्तिका क्रम बतलाते हैं—
तपसा चीयते ब्रह्म ततोऽन्नमभिजायते । अन्नात्प्राणो मनः सत्यं लोकाः कर्मसु चामृतम् ॥ ८ ॥
ब्रह्म = परब्रह्म; तपसा = संकल्परूप तपसे; चीयते = उपचय (वृद्धि) को प्राप्त होता है; ततः = उससे; अन्नम् = अन्न; अभिजायते = उत्पन्न होता है; अन्नात् = अन्नसे (क्रमशः); प्राणः = प्राण; मनः = मन; सत्यम् = सत्य (पाँच महाभूत); लोकाः = समस्त लोक (और कर्म); च = तथा; कर्मसु = कर्मोंसे; अमृतम् = अवश्यम्भावी सुख-दुःखरूप फल उत्पन्न होता है ॥ ८ ॥
**व्याख्या—**जब जगत्की रचनाका समय आता है, उस समय परब्रह्म परमेश्वर अपने संकल्परूप तपसे वृद्धिको प्राप्त होते हैं, अर्थात् उनमें विविध रूपोंवाली सृष्टिके निर्माणका संकल्प उठता है। जीवोंके कर्मानुसार उन परब्रह्म पुरुषोत्तममें जो सृष्टिके आदिमें स्फुरणा होती है, वही मानो उनका तप है; उस स्फुरणाके होते ही भगवान्, जो पहले अत्यन्त सूक्ष्मरूपमें रहते हैं, (जिसका वर्णन छठे मन्त्रमें आ चुका है) उसकी अपेक्षा स्थूल हो जाते हैं अर्थात् वे सृष्टिकर्ता ब्रह्माका रूप धारण कर लेते हैं। ब्रह्मासे सब प्राणियोंकी उत्पत्ति और वृद्धि करनेवाला अन्न उत्पन्न होता है। फिर अन्नसे क्रमशः प्राण, मन, कार्यरूप
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आकाशादि पाँच महाभूत, समस्त प्राणी और उनके वासस्थान, उनके भिन्न-भिन्न कर्म और उन कर्मोंसे उनका अवश्यम्भावी सुख-दुःखरूप फल—इस प्रकार यह सम्पूर्ण जगत् उत्पन्न होता है॥८॥
सम्बन्ध— अब परमेश्वरकी महिमाका वर्णन करते हुए इस प्रकरणका उपसंहार करते हैं—
यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तपः।
तस्मादेतद्ब्रह्म नाम रूपमन्नं च जायते॥९॥
यः=जो; सर्वज्ञः=सर्वज्ञ (तथा); सर्ववित्=सबको जाननेवाला (है); यस्य=जिसका; ज्ञानमयम्=ज्ञानमय; तपः=तप (है); तस्मात्=उसी परमेश्वरसे; एतत्=यह; ब्रह्म=विराट्स्वरूप जगत्; च=तथा; नाम=नाम; रूपम्=रूप (और); अन्नम्=भोजन; जायते=उत्पन्न होते हैं॥९॥
व्याख्या— वे सम्पूर्ण जगत्के कारणभूत परम पुरुष परमेश्वर साधारण-रूपसे तथा विशेषरूपसे भी सबको भलीभाँति जानते हैं, उन परब्रह्मका एकमात्र ज्ञान ही तप है। उन्हें साधारण मनुष्योंकी भाँति जगत्की उत्पत्तिके लिये कष्ट-सहनरूप तप नहीं करना पड़ता। उन सर्वशक्तिमान् परब्रह्म परमेश्वरके संकल्पमात्रसे ही यह प्रत्यक्ष दीखनेवाला विराट्स्वरूप जगत् (जिसे अपर ब्रह्म कहते हैं) अपने-आप प्रकट हो जाता है और समस्त प्राणियों तथा लोकोंके नाम, रूप और आहार आदि भी उत्पन्न हो जाते हैं॥९॥
शौनक ऋषिने यह पूछा था कि ‘किसको जाननेसे यह सब कुछ जान लिया जाता है ?’ इसके उत्तरमें समस्त जगत्के परम कारण परब्रह्म परमात्मासे जगत्की उत्पत्ति बतलाकर संक्षेपमें यह बात समझायी गयी कि ‘उन सर्व-शक्तिमान्, सर्वज्ञ, सबके कर्ता-धर्ता परमेश्वरको जान लेनेपर यह सब कुछ ज्ञात हो जाता है’॥९॥
॥ प्रथम खण्ड समाप्त ॥ १ ॥
खण्ड २ ]
मुण्डकोपनिषद्
२३७
द्वितीय खण्ड
सम्बन्ध —पहले खण्डके चौथे मन्त्रमें परा और अपरा—इन दो विद्याओंको जाननेयोग्य बताया था, उनमेंसे अब इस खण्डमें अपरा विद्याका स्वरूप और फल बतलाकर परा विद्याकी जिज्ञासा उत्पन्न की जाती है—
तदेतत्सत्यं मन्त्रेषु कर्माणि कवयो यान्यपश्यंस्तानि त्रेतायां बहुधा संततानि। तान्याचरथ नियतं सत्यकामा एष वः पन्थाः सुकृतस्य लोके ॥ १ ॥
तत्=वह; एतत्=यह; सत्यम्=सत्य है कि; कवयः=बुद्धिमान् ऋषियोंने; यानि=जिन; कर्माणि=कर्मोंको; मन्त्रेषु=वेद-मन्त्रोंमें; अपश्यन्=देखा था; तानि=वे; त्रेतायाम्=तीनों वेदोंमें; बहुधा=बहुत प्रकारसे; संततानि=व्याप्त हैं; सत्यकामाः=हे सत्यको चाहनेवाले मनुष्यो! (तुमलोग); तानि=उनका; नियतम्=नियमपूर्वक; आचरथ=अनुष्ठान करो; लोके=इस मनुष्य-शरीरमें; वः=तुम्हारे लिये; एषः=यही; सुकृतस्य=शुभकर्मकी फल-प्राप्तिका; पन्थाः=मार्ग हैं ॥ १ ॥
व्याख्या —यह सर्वथा सत्य है कि बुद्धिमान् महर्षियोंने जिन उन्नतिके साधनरूप यज्ञादि नाना प्रकारके कर्मोंको वेद-मन्त्रोंमें पहले देखा था, वे कर्म ऋक्, यजुः और साम—इन तीनों वेदोंमें बहुत प्रकारसे विस्तारपूर्वक वर्णित हैं (गीता ४। ३२)*। अतः जागतिक उन्नति चाहनेवाले मनुष्योंको उन्हें भलीभाँति जानकर नियमपूर्वक उन कर्मोंको करते रहना चाहिये। इस मनुष्य-शरीरमें यही उन्नतिका सुन्दर मार्ग है। आलस्य और प्रमादमें या भोगोंको भोगनेमें पशुओंकी भाँति जीवन बिता देना मनुष्य-शरीरके उपयुक्त नहीं है। यही इस मन्त्रका भाव है ॥ १ ॥
- प्रधानरूपसे वेदोंकी संख्या तीन ही मानी गयी है। जहाँ-तहाँ 'वेदत्रयी' आदि नामोंसे ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद—इन तीनका ही उल्लेख मिलता है। ऐसे स्थलोंमें चौथे अथर्ववेदको उक्त तीनोंके अन्तर्गत ही मानना चाहिये।
२३८
ईशादि नौ उपनिषद्
[ मुण्डक १ ]
सम्बन्ध— वेदोक्त अनेक प्रकारके कर्मोंमेंसे उपलक्षणरूपसे प्रधान अग्निहोत्र-कर्मका वर्णन आरम्भ करते हैं—
यदा लेलायते ह्यर्चिः समिद्धे हव्यवाहने। तदाज्यभागावन्तरेणाहुतीः प्रतिपादयेत् ॥ २ ॥
यदा हि-जिस समय; हव्यवाहने समिद्धे-हविष्यको देवताओंके पास पहुँचानेवाली अग्निके प्रदीप्त हो जानेपर; अर्चिः=(उसमें) ज्वालाएँ; लेलायते=लपलपाने लगती हैं; तदा=उस समय; आज्यभागी अन्तरेण=आज्यभागकी दोनों आहुतियोंके* स्थानको छोड़कर बीचमें; आहुतीः=अन्य आहुतियोंको; प्रतिपादयेत्-डाले ॥ २ ॥
व्याख्या— अधिकारी मनुष्योंको नित्यप्रति अग्निहोत्र करना चाहिये। जब देवताओंको हविष्य पहुँचानेवाली अग्नि अग्निहोत्रकी वेदीमें भलीभाँति प्रज्वलित हो जाय, उसमेंसे लपटें निकलने लगेँ, उस समय आज्यभागके स्थानको छोड़कर मध्यमें आहुतियाँ डालनी चाहिये। इससे यह बात भी समझायी गयी है कि जबतक अग्नि प्रदीप्त न हो, उसमेंसे लपटें न निकलने लगेँ तबतक या निकलकर शान्त हो जायँ, उस समय अग्निमें आहुति नहीं डालनी चाहिये। अग्निको अच्छी तरह प्रज्वलित करके ही अग्निहोत्र करना चाहिये ॥ २ ॥
सम्बन्ध— नित्य अग्निहोत्र करनेवाले मनुष्यको उसके साथ-साथ और क्या-क्या करना चाहिये, इस जिज्ञासापर कहते हैं—
यस्याग्निहोत्रमदर्शमपौर्णमास- मचातुर्मास्यमनाग्रयणमतिथिवर्जितं च।
- यजुर्वेदके अनुसार प्रजापतिके लिये मौनभावसे एक आहुति और इन्द्रके लिये 'आधार' नामकी दो घृताहुतियाँ देनेके पश्चात् जो अग्नि और सोम देवताओंके लिये पृथक्-पृथक् दो आहुतियाँ दी जाती हैं उनका नाम 'आज्यभाग' है। 'ॐ अग्नये स्वाहा' कहकर उत्तर-पूर्वार्धमें और 'ॐ सोमाय स्वाहा' कहकर दक्षिण-पूर्वार्धमें ये आहुतियाँ डाली जाती हैं, इनके बीचमें शेष आहुतियाँ डालनी चाहिये।
खण्ड २]
मुण्डकोपनिषद्
२३१
अहृतमवैश्वदेवमविधिना हृत- माससमास्तस्य लोकान् हिनस्ति ॥ ३ ॥
यस्य=जिसका; अग्निहोत्रम्=अग्निहोत्र; अदर्शम्=दर्श नामक यज्ञसे रहित है; अपौर्णमासम्=पौर्णमास नामक यज्ञसे रहित है; अचातुर्मास्यम्=चातुर्मास्य नामक यज्ञसे रहित है; अनाग्रयणम्=आग्रयण कर्मसे रहित है; च=तथा; अतिथिवर्जितम्=जिसमें अतिथि सत्कार नहीं किया जाता; अहृतम्=जिसमें समयपर आहुति नहीं दी जाती; अवैश्वदेवम्=जो बलिवैश्वदेव नामक कर्मसे रहित है; (तथा) अविधिना हृतम्=जिसमें शास्त्रविधिकी अवहेलना करके हवन किया गया है; ऐसा अग्निहोत्र; तस्य=उस अग्निहोत्रीके; आससमान्=सातों; लोकान्=पुण्यलोकोंका; हिनस्ति=नाश कर देता है ॥ ३ ॥
व्याख्या —नित्य अग्निहोत्र करनेवाला मनुष्य यदि दर्श१ और पौर्णमासयज्ञ२ नहीं करता या चातुर्मास्ययज्ञ३ नहीं करता अथवा शरद् और वसन्त ऋतुओंमें की जानेवाली नवीन अन्नकी इष्टिरूप आग्रयण यज्ञ नहीं करता, यदि उसकी यज्ञशालामें अतिथियोंका विधिपूर्वक सत्कार नहीं किया जाता या वह नित्य अग्निहोत्रमें ठीक समयपर और शास्त्रविधिके अनुसार हवन नहीं करता एवं बलिवैश्वदेव कर्म नहीं करता, तो उस अग्निहोत्र करनेवाले मनुष्यके सातों लोकोंको वह अङ्गहीन अग्निहोत्र नष्ट कर देता है। अर्थात् उस यज्ञके द्वारा उसे मिलनेवाले जो पृथ्वीलोकसे लेकर सत्यलोकतक सातों लोकोंमें प्राप्त होनेयोग्य भोग हैं, उनसे वह वञ्चित रह जाता है ॥ ३ ॥
सम्बन्ध —दूसरे मन्त्रमें यह बात कही गयी थी कि जब अग्निमें लपटें निकलने लगीं तब आहुति देनी चाहिये; अतः अब उन लपटोंके प्रकार-भेद और नाम बतलाते हैं—
१-प्रत्येक अमावस्याको की जानेवाली इष्टि।
२-प्रत्येक पूर्णिमाको की जानेवाली इष्टि।
३-चार महीनोंमें पूरा होनेवाला एक श्रौत यागविशेष।
२४०
ईशादि नौ उपनिषद्
[ मुण्डक १ ]
काली कराली च मनोजवा च सुलोहिता या च सुधूम्रवर्णा। स्फुलिङ्गिनी विश्वरुची च देवी लेलायमाना इति सम जिह्वाः ॥ ४ ॥
या=जो; काली=काली; कराली=कराली; च=तथा; मनोजवा=मनोजवा; च=और; सुलोहिता=सुलोहिता; च=तथा; सुधूम्रवर्णा=सुधूम्रवर्णा; स्फुलिङ्गिनी=स्फुलिङ्गिनी; च=तथा; विश्वरुची देवी=विश्वरुची देवी; इति=ये (अग्रिकी); सम=सात; लेलायमानाः=लपलपाती हुई; जिह्वाः=जिह्वाएँ हैं ॥ ४ ॥
व्याख्या—काली—काले रंगवाली, कराली—अति उग्र (जिसमें आग लग जानेका डर रहता है), मनोजवा—मनकी भाँति अत्यन्त चञ्चल, सुलोहिता—सुन्दर लाली लिये हुए, सुधूम्रवर्णा—सुन्दर धूपैके-से रंगवाली, स्फुलिङ्गिनी—चिनगारियोंवाली तथा विश्वरुची देवी—सब ओरसे प्रकाशित, देदीप्यमान—इस प्रकार ये सात तरहकी लपटें मानो अग्निदेवकी हविको ग्रहण करनेके लिये लपलपाती हुई सात जिह्वाएँ हैं। अतः जब इस प्रकार अग्निदेवता आहतिरूप भोजन ग्रहण करनेके लिये तैयार हों, उसी समय भोजनरूप आहुतियों प्रदान करनी चाहिये; अन्यथा अप्रज्वलित अथवा बुझी हुई अग्निमें दी हुई आहुति राखमें मिलकर व्यर्थ नष्ट हो जाती हैं ॥ ४ ॥
सम्बन्ध—उपर्युक्त प्रकारसे प्रदीप्त अग्निमें नियमपूर्वक नित्यप्रति हवन करनेका फल बतलाते हैं—
एतेषु यश्चरते भ्राजमानेषु यथाकालं चाहृतयो ह्याददायन्। तं नयन्त्येताः सूर्यस्य रश्मयो यत्र देवानां पतिरेकोऽधिवासः ॥ ५ ॥
यः च=जो कोई भी अग्निहोत्री; एतेषु भ्राजमानेषु=इन देदीप्यमान ज्वालाओंमें; यथाकालम्=ठीक समयपर; चरते=अग्निहोत्र करता है; तम्=उस अग्निहोत्रीको;
खण्ड २ ]
मुण्डकोपनिषद्
२४९
हि=निश्चय ही; आददायन्=अपने साथ लेकर; एताः=ये; आहुतयः=आहुतियाँ; सूर्यस्य=सूर्यकी; रश्मयः [ भूत्वा ]=किरणें बनकर; नयन्ति=(वहाँ) पहुँचा देती हैं; यत्र=जहाँ; देवानाम्=देवताओंका; एकः=एकमात्र; पतिः=स्वामी (इन्द्र); अधिवासः=निवास करता है ॥५॥
व्याख्या —जो कोई भी साधक पूर्वमन्त्रमें बतलायी हुई सात प्रकारकी लपटोंसे युक्त भलीभाँति प्रज्वलित अग्निमें ठीक समयपर शास्त्रविधिके अनुसार नित्यप्रति आहुति देकर अग्निहोत्र करता है, उसे मरणकालमें अपने साथ लेकर ये आहुतियाँ सूर्यकी किरणें बनकर वहाँ पहुँचा देती हैं, जहाँ देवताओंका एकमात्र स्वामी इन्द्र निवास करता है। तात्पर्य यह कि अग्निहोत्र स्वर्गके सुखोंकी प्राप्तिका अमोघ उपाय है ॥५॥
सम्बन्ध —किस प्रकार ये आहुतियाँ सूर्य-किरणोंद्वारा यजमानको इन्द्रलोकमें ले जाती हैं—ऐसी जिज्ञासा होनेपर कहते हैं—
एद्येहीति तमाहुतयः सुवर्चसः सूर्यस्य रश्मिभिर्यजमानं वहन्ति । प्रियां वाचमभिवदन्त्योऽर्चयन्त्य एष वः पुण्यः सुकृतो ब्रह्मलोकः ॥६॥
सुवर्चसः=(वे) देदीप्यमान; आहुतयः=आहुतियाँ; एहि एहि=आओ, आओ; एषः=यह; वः=तुम्हारे; सुकृतः=शुभकर्मोंसे प्राप्त; पुण्यः=पवित्र; ब्रह्मलोकः=ब्रह्मलोक (स्वर्ग) है; इति=इस प्रकारकी; प्रियाम्=प्रिय; वाचम्=वाणी; अभिवदन्त्यः=बार-बार कहती हुई (और); अर्चयन्त्यः=उसका आदर-सत्कार करती हुई; तम्=उस; यजमानम्=यजमानको; सूर्यस्य=सूर्यकी; रश्मिभिः=रश्मियोंद्वारा; वहन्ति=ले जाती हैं ॥६॥
व्याख्या —उन प्रदीप्त ज्वालाओंमें दी हुई आहुतियाँ सूर्यकी किरणोंके रूपमें परिणत होकर मरणकालमें उस साधकसे कहती हैं—‘आओ, आओ यह तुम्हारे शुभकर्मोंका फलस्वरूप ब्रह्मलोक अर्थात् भोगरूप सुखोंको भोगनेका स्थान स्वर्गलोक है।’ इस प्रकारकी प्रिय वाणी बार-बार कहती हुई आदर-सत्कारपूर्वक
२४२
ईशादि नौ उपनिषद्
[ मुण्डक १ ]
उसे सूर्यकी किरणोंके मार्गसे ले जाकर स्वर्गलोकमें पहुँचा देती हैं। यहाँ स्वर्गको ब्रह्मलोक कहनेका यह भाव मालूम होता है कि स्वर्गके अधिपति इन्द्र भी भगवान्के ही अपर स्वरूप हैं, अतः प्रकाशन्तरसे ब्रह्म ही हैं॥६॥
सम्बन्ध— अब सांसारिक भोगोंमें वैराग्यकी और परम आनन्दस्वरूप परमेश्वरको पानेकी अभिलाषा उत्पन्न करनेके लिये उपर्युक्त स्वर्गलोकके साधनरूप यज्ञादि सकाम कर्म और उनके फलरूप लौकिक एवं पारलौकिक भोगोंकी तुच्छता बतलाते हैं—
| प्लवा | होते | अदृढा | यज्ञरूपा |
|---|---|---|---|
| अष्टादशोक्तमवरं | येषु | कर्म। | |
| एतच्छ्रेयो | येऽभिन्नन्दन्ति | मूढा | |
| जरामृत्युं | ते | पुनरेवापि | यन्ति॥७॥ |
हि=निश्चय ही; एते=ये; यज्ञरूपाः=यज्ञरूप; अष्टादश प्लवाः=अठारह नौकाएँ; अदृढाः=अदृढ़ (अस्थिर) हैं; येषु=जिनमें; अवरम् कर्म=नीची श्रेणीका उपासनारहित सकाम कर्म; उक्तम्=बताया गया है; ये=जो; मूढाः=मूर्ख; एतत् [ एव ]=यही; श्रेयः=कल्याणका मार्ग है (यों मानकर); अभिन्नन्दन्ति=इसकी प्रशंसा करते हैं; ते=वे; पुनः अपि=बारम्बार; एव=निःसंदेह; जरामृत्युम्=वृद्धावस्था और मृत्युको; यन्ति=प्राप्त होते रहते हैं॥७॥
व्याख्या— इस मन्त्रमें यज्ञको नौकाका रूप दिया गया है और उनकी संख्या अठारह बतलायी गयी है; इससे अनुमान होता है कि नित्य, दर्श, पौर्णमास, चातुर्मास्य आदि भेदोंसे यज्ञके अठारह प्रधान भेद होते हैं। कहना यह है कि जिनमें उपासनारहित सकाम कर्मोंका वर्णन है, ऐसी ये यज्ञरूप अठारह नौकाएँ हैं, जो कि दृढ़ नहीं हैं। इनके द्वारा संसार-समुद्रसे पार होना तो दूर रहा, इस लोकके वर्तमान दुःखरूप छोटी-सी नदीसे पार होकर स्वर्गतक पहुँचनेमें भी संदेह है; क्योंकि तीसरे मन्त्रके वर्णनानुसार किसी भी अङ्गकी कमी रह जानेपर वे साधकको स्वर्गमें नहीं पहुँचा सकती, बीचमें ही छिन्न-भिन्न हो जाती हैं। इसलिये ये अदृढ़ अर्थात् अस्थिर हैं। इस रहस्यको न समझकर जो मूर्खलोग इन सकाम कर्मोंको ही कल्याणका उपाय समझकर—इनके ही
खण्ड २ ]
मुण्डकोपनिषद्
२४३
फलको परम सुख मानकर इनकी प्रशंसा करते रहते हैं, उन्हें निःसंदेह बारम्बार वृद्धावस्था और मरणके दुःख भोगने पड़ते हैं ॥७॥
सम्बन्ध—वे किस प्रकार दुःख भोगते हैं, इसका स्मृष्टीकरण करते हैं—
अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः स्वयंधीराः पण्डितं मन्यमानाः ।
जडून्यमानाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः ॥८॥
अविद्यायाम् अन्तरे=अविद्याके भीतर; वर्तमानाः=स्थित होकर (भी); स्वयंधीराः=अपने-आप बुद्धिमान् बननेवाले (और); पण्डितम् मन्यमानाः=अपनेको विद्वान् माननेवाले; मूढाः=वे मूर्खलोग; जडून्यमानाः=बार-बार आधात (कष्ट) सहन करते हुए; परियन्ति=(ठीक वैसे ही) भटकते रहते हैं; यथा=जैसे; अन्धेन एव=अंधेके द्वारा ही; नीयमानाः=चलाये जानेवाले; अन्धाः=अंधे (अपने लक्ष्यतक न पहुँचकर बीचमें ही इधर-उधर भटकते और कष्ट भोगते रहते हैं) ॥८॥*
व्याख्या—जब अंधे मनुष्यको मार्ग दिखानेवाला भी अंधा ही मिल जाता है, तब जैसे वह अपने अभीष्ट स्थानपर नहीं पहुँच पाता, बीचमें ही ठोकरें खाता भटकता है और कर्टि-कंकड़ोंसे बिंधकर या गहरे गड्ढे आदिमें गिरकर अथवा किसी चट्टान, दीवाल और पशु आदिसे टकराकर नाना प्रकारके कष्ट भोगता है, वैसे ही उन मूर्खोंको भी पशु, पक्षी, कीट, पतंग आदि विविध दुःखपूर्ण योनियोंमें एवं नरकादिमें प्रवेश करके अनन्त जन्मोंतक अनन्त यन्त्रणाओंका भोग करना पड़ता है, जो अपने-आपको ही बुद्धिमान् और विद्वान् समझते हैं; विद्या-बुद्धिके मिथ्याभिमानमें शास्त्र और महापुरुषोंके वचनोंकी कुछ भी परवा न करके उनकी अवहेलना करते हैं और प्रत्यक्ष सुखरूप प्रतीत होनेवाले भोगोंका भोग करनेमें तथा उनके उपायभूत अविद्यामय सकाम कर्मोंमें ही निरन्तर संलग्न रहकर मनुष्यजीवनका अमूल्य समय व्यर्थ नष्ट करते रहते हैं ॥८॥
- यह मन्त्र कठोपनिषद्में भी आया है (क० ३० । १ । १५)।
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ मुण्डक १ ]
सम्बन्ध—वे लोग बारम्बार दुःखोंमें पड़कर भी चेतते क्यों नहीं, कल्याणके लिये चेष्टा क्यों नहीं करते, इस जिज्ञासापर कहते हैं—
अविद्यायां बहुधा वर्तमाना वयं कृतार्था इत्यभिमन्यन्ति बालाः। यत्कर्मिणो न प्रवेदयन्ति रागात् तेनातुराः क्षीणलोकाश्च्यवन्ते ॥ १ ॥
बालाः=वे मूर्खलोग; अविद्यायाम्=उपासनारहित सकाम कर्मोंमें; बहुधा=बहुत प्रकारसे; वर्तमानाः=वर्तते हुए; वयम्=हम; कृतार्थाः=कृतार्थ हो गये; इति अभिमन्यन्ति=ऐसा अभिमान कर लेते हैं; यत्=क्योंकि; कर्मिणः=वे सकाम कर्म करनेवाले लोग; रागात्=विषयोंकी आसक्तिके कारण; न प्रवेदयन्ति=कल्याणके मार्गको नहीं जान पाते; तेन=इस कारण; आतुराः=बारम्बार दुःखसे आतुर हो; क्षीणलोकाः=पुण्योपाजित लोकोंसे हटाये जाकर; च्यवन्ते=नीचे गिर जाते हैं ॥ १ ॥
व्याख्या—पूर्वमन्त्रमें कहे हुए प्रकारसे जो इस लोक और परलोकके भोगोंकी प्राप्तिके लिये सांसारिक उन्नतिके साधनरूप नाना प्रकारके सकाम कर्मोंमें ही बहुत प्रकारसे लगे रहते हैं, वे अविद्यामें निमग्न अज्ञानी मनुष्य समझते हैं कि 'हमने अपने कर्तव्यका पालन कर लिया।' उन सांसारिक कर्मोंमें लगे हुए मनुष्योंकी भोगोंमें अत्यन्त आसक्ति होती है, इस कारण वे सांसारिक उन्नतिके सिवा कल्याणकी ओर दृष्टि ही नहीं डालते। उन्हें इस बातका पता ही नहीं रहता कि परमानन्दके समुद्र कोई परमात्मा हैं और मनुष्य उन्हें पा सकता है। इसलिये वे उन परमेश्वरकी प्राप्तिके लिये चेष्टा न करके बारम्बार दुःखी होते रहते हैं और पुण्यकर्मोंका फल पूरा होनेपर वे स्वर्गादि लोकोंसे नीचे गिर जाते हैं ॥ १ ॥
सम्बन्ध—ऊपर कही हुई बातको ही और भी स्पष्ट करते हैं—
इष्टापूर्तं मन्यमाना वरिष्ठं नान्यच्छ्रेयो वेदयन्ते प्रमूढाः। नाकस्य पृष्ठे ते सुकृतेऽनुभूत्वमं लोकं हीनतरं वा विशन्ति ॥ १० ॥
खण्ड २ ]
मुण्डकोपनिषद्
२४५
इष्टापूर्तम्=इष्ट और पूर्त* (सकाम) कर्मोंको ही; वरिष्ठम्=श्रेष्ठ; मन्वमानाः=माननेवाले; प्रमूढाः=अत्यन्त मूर्खलोग; अन्यत्=उससे भिन्न; श्रेयः=वास्तविक श्रेयको; न वेदयन्ते=नहीं जानते; ते=वे; सुकृते=पुण्यकर्मके फलस्वरूप; नाकस्य पुष्टे=स्वर्गके उच्चतम स्थानमें; अनुभूत्वा=(जाकर श्रेष्ठ कर्मके फलस्वरूप) वहाँके भोगोंका अनुभव करके; इमम् लोकम्=इस मनुष्यलोकमें; वा=अथवा; हीनतरम्=इससे भी अत्यन्त हीन योनियोंमें; विशन्ति=प्रवेश करते हैं ॥१०॥
व्याख्या—वे अतिशय मूर्ख भोगासक्त मनुष्य इष्ट और पूर्तको अर्थात् वेद और स्मृति आदि शास्त्रोंमें सांसारिक सुखोंकी प्राप्तिके जितने भी साधन बताये गये हैं, उन्हींको सर्वश्रेष्ठ कल्याण-साधन मानते हैं। इसलिये उनसे भिन्न अर्थात् परमेश्वरका भजन, ध्यान और निष्कामभावसे कर्तव्यपालन करना एवं परमपुरुष परमात्माको जाननेके लिये तीव्र जिज्ञासापूर्वक चेष्टा करना आदि जितने भी परम कल्याणके साधन हैं, उन्हें वे नहीं जानते, उन कल्याण-साधनोंकी ओर लक्ष्यतक नहीं करते। अतः वे अपने पुण्यकर्मके फलरूप स्वर्गलोकतकके सुखोंको भोगकर पुण्य क्षय होनेपर पुनः इस मनुष्यलोकमें अथवा इससे भी नीची शूकर-कूकर, कीट-पतङ्ग आदि योनियोंमें या रौरवादि घोर नरकोंमें चले जाते हैं। (गीता ९।२०-२१) ॥१०॥
सम्बन्ध—ऊपर बतलाये हुए सांसारिक भोगोंसे विरक्त मनुष्योंके आचार-व्यवहार और उनके फलका वर्णन करते हैं—
तपःश्रद्धे ये ह्युपवसन्त्यरण्ये शान्ता विद्वान्सो भैक्ष्यचर्या चरन्तः। सूर्यद्वारेण ते विरजाः प्रयान्ति यत्रामृतः स पुरुषो ह्यव्ययात्मा ॥११॥
- यज्ञ-यागादि श्रौतकर्मोंको 'इष्ट' तथा बावली, कुआँ खुदवाना और बगीचे आदि लगाना स्मृतिविहित कर्मको 'पूर्त' कहते हैं।
२४६
ईशादि नौ उपनिषद्
[ मण्डक १ ]
हि=किंतु; ये=जो; अरण्ये [ स्थिताः ]=वनमें रहनेवाले; शान्ताः=शान्तस्वभाववाले; विद्वान्सः=विद्वान्; भैक्ष्यचर्याम् चरन्तः=तथा भिक्षाके लिये विचरनेवाले; तपःश्रद्धे=संयमरूप तप तथा श्रद्धाका; उपवसन्ति=सेवन करते हैं; ते=वे; विरजाः=रजोगुणरहित; सूर्यद्रारेण=सूर्यके मार्गसे; [ तत्र ] प्रयान्ति=वहाँ चले जाते हैं; यत्र हि=जहाँपर; सः=वह; अमृतः=जन्म-मृत्युसे रहित; अव्ययात्मा=नित्य, अविनाशी; पुरुषः=परम पुरुष (रहता है) ॥ ११ ॥
व्याख्या —उपर्युक्त भोगासक्त मनुष्योंसे जो सर्वथा भिन्न हैं, मनुष्य-शरीरका महत्त्व समझ लेनेके कारण जिनके अन्तःकरणमें परमात्माका तत्त्व जाननेकी और परमेश्वरको प्राप्त करनेकी इच्छा जग उठी है, वे चाहे वनमें निवास करनेवाले वानप्रस्थ हों, शान्त स्वभाववाले विद्वान् सदाचारी गृहस्थ हों या भिक्षासे निर्वाह करनेवाले ब्रह्मचारी अथवा संन्यासी हों, वे तो निरन्तर तप और श्रद्धाका ही सेवन किया करते हैं, अर्थात् अपने-अपने वर्ण, आश्रम तथा परिस्थितिके अनुसार जिस समय जो कर्तव्य होता है, उसका शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार बिना किसी प्रकारकी कामनाके पालन करते रहते हैं और संयमपूर्वक शम-दमादि साधनोंसे सम्पन्न होकर परम श्रद्धाके साथ परमेश्वरको जानने और प्राप्त करनेके साधनोंमें लगे रहते हैं। इसलिये तम और रजोगुणके विकारोंसे सर्वथा शून्य निर्मल सत्त्वगुणमें स्थित वे सज्जन सूर्यलोकमें होते हुए वहाँ चले जाते हैं, जहाँ उनके परम प्राप्त अमृतस्वरूप नित्य अविनाशी परमपुरुष पुरुषोत्तम निवास करते हैं ॥ ११ ॥
सम्बन्ध —उन परब्रह्म परमेश्वरको जानने और प्राप्त करनेके लिये मनुष्यको क्या करना चाहिये, इस जिज्ञासापर कहते हैं—
परीक्ष्य लोकान् कर्मचितान् ब्राह्मणो
निर्वेदमायात्रास्त्यकृतः कृतेन ।
तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्
समित्याणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् ॥ १२ ॥
कर्मचितान्=कर्मसे प्राप्त किये जानेवाले; लोकान् परीक्ष्य=लोकोंकी परीक्षा
खण्ड २ ]
मुण्डकोपनिषद्
२४७
करके; ब्राह्मणः=ब्राह्मण; निर्वेदम्=वैराग्यको; आयात्=प्राप्त हो जाय (यह समझ ले कि); कृतेन=किये जानेवाले कर्मोंसे; अकृतः=स्वतःसिद्ध नित्य परमेश्वर; न अस्ति=नहीं मिल सकता; सः=वह; तद्विज्ञानार्थम्=उस परब्रह्मका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये; समित्पाणिः=हाथमें समिधा लेकर; श्रोत्रियम्=वेदको भलीभाँति जानेवाले (और); ब्रह्मनिष्ठम्=परब्रह्म परमात्मामें स्थित; गुरुम्=गुरुके पास; एव=ही; अभिगच्छेत्=विनयपूर्वक जाय ॥ १२ ॥
व्याख्या —अपना कल्याण चाहनेवाले मनुष्यको पहले बतलाये हुए सकाम कर्मके फलस्वरूप इस लोक और परलोकके समस्त सांसारिक सुखोंकी भलीभाँति परीक्षा करके अर्थात् विवेकपूर्वक उनकी अनित्यता और दुःखरूपताको समझकर सब प्रकारके भोगोंसे सर्वथा विरक्त हो जाना चाहिये। यह निश्चय कर लेना चाहिये कि कर्तापनके अभिमानपूर्वक सकामभावसे किये जानेवाले कर्म अनित्य फलको देनेवाले तथा स्वयं भी अनित्य हैं। अतः जो सर्वथा अकृत है अर्थात् क्रियासाध्य नहीं है, ऐसे नित्य परमेश्वरकी प्राप्ति वे नहीं करा सकते। यह सोचकर उस जिज्ञासुको परमात्माका वास्तविक तत्त्वज्ञान प्राप्त करनेके लिये हाथमें समिधा लेकर श्रद्धा और विनयभावके सहित ऐसे सदगुरुकी शरणमें जाना चाहिये, जो वेदोंके रहस्यको भलीभाँति जानते हों और परब्रह्म परमात्मामें स्थित हों ॥ १२ ॥
सम्बन्ध —ऊपर बतलाये हुए लक्षणोंवाला कोई शिष्य यदि गुरुके पास आ जाय तो गुरुको क्या करना चाहिये, इस जिज्ञासापर कहते हैं—
तस्मै स विद्वानुपसन्नाय सम्यक् प्रशान्तचित्ताय शमान्विताय । येनाक्षरं पुरुषं वेद सत्यं प्रोवाच तां तत्त्वतो ब्रह्मविद्याम् ॥ १३ ॥
सः=वह; विद्वान्=ज्ञानी महात्मा; उपसन्नाय=शरणमें आये हुए; सम्यक्प्रशान्तचित्ताय=पूर्णतया शान्तचित्तवाले; शमान्विताय=शम-दमादि साधनयुक्त; तस्मै=उस शिष्यको; ताम् ब्रह्मविद्याम्=उस ब्रह्मविद्याका; तत्त्वतः=तत्त्व-विवेचनपूर्वक;
२४८
ईशादि नौ उपनिषद्
[ मुण्डक २ ]
प्रोवाच=भलीभाँति उपदेश करे; येन [ सः ]=जिससे वह शिष्य; अक्षरम्=अविनाशी; सत्यम्=नित्य; पुरुषम्=परम पुरुषको; वेद=जान ले ॥ १३ ॥
व्याख्या —उन श्रोत्रिय ब्रह्मणिष्ठ महात्माको भी चाहिये कि अपनी शरणमें आये हुए ऐसे शिष्यको, जिसका चित्त पूर्णतया शान्त—निश्चिन्त हो चुका हो, सांसारिक भोगोंमें सर्वथा वैराग्य हो जानेके कारण जिसके चित्तमें किसी प्रकारकी चिन्ता, व्याकुलता या विकार नहीं रह गये हों, जो शम-दमादि साधनसम्पन्न हो अर्थात् जिसने अपने मन, बुद्धि और इन्द्रियोंको भलीभाँति वशमें कर लिया हो, उस ब्रह्मविद्याका तत्त्व-विवेचनपूर्वक भलीभाँति समझाकर उपदेश करे, जिससे वह शिष्य नित्य अविनाशी परब्रह्म पुरुषोत्तमका ज्ञान प्राप्त कर सके ॥ १३ ॥
॥ द्वितीय खण्ड समाप्त ॥ २ ॥
॥ प्रथम मुण्डक समाप्त ॥ १ ॥
द्वितीय मुण्डक
प्रथम खण्ड
सम्बन्ध —प्रथम मुण्डकके द्वितीय खण्डमें अपर विद्याका स्वरूप और फल बतलाया तथा उसकी तुच्छता दिखाते हुए उससे विरक्त होनेकी बात कहकर परविद्या प्राप्त करनेके लिये सदुरुकी शरणमें जानेको कहा। अब परविद्याका वर्णन करनेके लिये प्रकरण आरम्भ करते हैं—
तदेतत्सत्यं यथा सुदीप्तात्पावकाद् विस्फुल्लिङ्गाः
सहस्रशः प्रभवन्ते सरूपाः ।
तथाक्षराद् विविधाः सोम्य भावाः
प्रजायन्ते तत्र चैवापियन्ति ॥ १ ॥
खण्ड १ ]
मुण्डकोपनिषद्
२४९
सोम्य=हे प्रिय!; तत्=वह; सत्यम्=सत्य; एतत्=यह है; यथा=जिस प्रकार; सुदीमात् पावकात्=प्रज्वलित अग्निमेंसे; सरूपाः=उसीके समान रूपवाली; सहस्रशः=हजारों; विस्फुल्लिङ्गाः=चिनगारियाँ; प्रभवन्ते=नाना प्रकारसे प्रकट होती हैं; तथा=उसी प्रकार; अक्षरात्=अविनाशी ब्रह्मसे; विविधाः=नाना प्रकारके; भावाः=भाव; प्रजायन्ते=उत्पन्न होते हैं; च=और; तत्र एव=उसीमें; अपियन्ति=विलीन हो जाते हैं* ॥ १ ॥
व्याख्या —महर्षि अङ्गिरा कहते हैं—प्रिय शौनक! मैंने तुमको पहले परब्रह्म परमेश्वरके स्वरूपका वर्णन करते हुए (पूर्व प्रकरणके पहले खण्डमें छठे मन्त्रसे नवैतक) जो रहस्य बतलाया था, वह सर्वथा सत्य है; अब उसीको पुनः समझाता हूँ, तुम ध्यानपूर्वक सुनो। जिस प्रकार प्रज्वलित अग्निमेंसे उसीके-जैसे रूप-रंगवाली हजारों चिनगारियाँ चारों ओर निकलती हैं, उसी प्रकार परमपुरुष अविनाशी ब्रह्मसे सृष्टिकालमें नाना प्रकारके भाव मूर्त-अमूर्त पदार्थ उत्पन्न होते हैं और प्रलयकालमें पुनः उन्हींमें लीन हो जाते हैं। यहाँ भावोंके प्रकट होनेकी बात समझानेके लिये ही अग्नि और चिनगारियोंका दृष्टान्त दिया गया है। उनके विलीन होनेकी बात दृष्टान्तसे स्पष्ट नहीं होती ॥ १ ॥
सम्बन्ध —जिन परब्रह्म अविनाशी पुरुषोत्तमसे यह जगत् उत्पन्न होकर पुनः उन्हींमें विलीन हो जाता है, वे स्वयं कैसे हैं—इस जिज्ञासापर कहते हैं—
दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः।
अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्षरात् परतः परः ॥ २ ॥
हि=निश्चय ही; दिव्यः=दिव्य; पुरुषः=पूर्णपुरुष; अमूर्तः=आकाररहित; सबाह्याभ्यन्तरः हि=समस्त जगत्के बाहर और भीतर भी व्याप्त; अजः=जन्मादि विकारोंसे अतीत; अप्राणः=प्राणरहित; अमनाः=मनरहित; हि=होनेके कारण; शुभ्रः=सर्वथा विशुद्ध है (तथा); हि=इसीलिये; अक्षरात्=अविनाशी जीवात्मासे; परतः परः=अत्यन्त श्रेष्ठ है ॥ २ ॥
- प्रथम मुण्डकके प्रथम खण्डके सातवें मन्त्रमें मकड़ी, पृथ्वी और मनुष्य-शरीरके दृष्टान्तसे जो बात कही थी, वही बात इस मन्त्रमें अगिके दृष्टान्तसे समझायी गयी है।
२५०
ईशादि नौ उपनिषद्
[ मुण्डक २ ]
व्याख्या —वे दिव्य पुरुष परमात्मा निःसंदेह आकाररहित और समस्त जगत्के बाहर एवं भीतर भी परिपूर्ण हैं। वे जन्म आदि विकारोंसे रहित, सर्वथा विशुद्ध हैं; क्योंकि उनके न तो प्राण हैं, न इन्द्रियाँ हैं और न मन ही है। वे इन सबके बिना ही सब कुछ करनेमें समर्थ हैं; इसीलिये वे सर्वशक्तिमान् परमेश्वर अविनाशी जीवात्मासे अत्यन्त श्रेष्ठ—सर्वथा उत्तम हैं ॥ २ ॥
सम्बन्ध —उपर्युक्त लक्षणोंवाले निराकार परमेश्वरसे यह साकार जगत् किस प्रकार उत्पन्न हो जाता है, इस जिज्ञासापर उनकी सर्वशक्तिमताका वर्णन करते हैं—
एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च।
खं वायुज्यौतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी ॥ ३ ॥
एतस्मात् —इसी परमेश्वरसे; प्राणः —प्राण; जायते —उत्पन्न होता है (तथा); मनः —मन (अन्तःकरण); सर्वेन्द्रियाणि —समस्त इन्द्रियाँ, खम् —आकाश; वायुः —वायु; ज्योतिः —तेज; आपः —जल; चः —और; विश्वस्य धारिणी —सम्पूर्ण प्राणियोंको धारण करनेवाली; पृथिवी —पृथ्वी (ये सब उत्पन्न होते हैं) ॥ ३ ॥
व्याख्या —यद्यपि वे परब्रह्म पुरुषोत्तम निराकार और मन, इन्द्रिय आदि करण-समुदायसे सर्वथा रहित हैं, तथापि सब कुछ करनेमें समर्थ हैं। इन सर्वशक्तिमान् परब्रह्म पुरुषोत्तमसे ही सृष्टिकालमें प्राण, मन (अन्तःकरण) और सम्पूर्ण इन्द्रियाँ तथा आकाश, वायु, तेज, जल और सम्पूर्ण प्राणियोंको धारण करनेवाली पृथ्वी—ये पाँचों महाभूत, सब-के-सब उत्पन्न होते हैं ॥ ३ ॥
सम्बन्ध —इस प्रकार संक्षेपमें परमेश्वरसे सूक्ष्म तत्वोंकी उत्पत्तिका प्रकार बतलाकर अब इस जगत्में भगवान्का विराट् रूप देखनेका प्रकार बतलाते हैं—
अग्निर्मूर्धा चक्षुषी चन्द्रसूर्यौ
दिशः श्रोत्रे वाग् विवृताश्च वेदाः।
वायुः प्राणो हृदयं विश्वमस्य
पदभ्यां पृथिवी होष सर्वभूतान्तरात्मा ॥ ४ ॥
खण्ड १ ]
मुण्डकोपनिषद्
२५१
अस्य=इस परमेश्वरका; अग्नि =:अग्नि; मूर्धा=मस्तक है; चन्द्रसूर्यौ=चन्द्रमा और सूर्य; चक्षुषी=दोनों नेत्र हैं; दिशः=सब दिशाएँ; श्रोत्रे=दोनों कान हैं; च=और; विवृताः वेदाः=विस्तृत वेद; वाक्=वाणी हैं (तथा); वायुः प्राणः=वायु प्राण है; विश्वम् हृदयम्=जगत् हृदय है; पदभ्याम्=इसके दोनों पैरोंसे; पृथिवी=पृथ्वी (उत्पन्न हुई है); एषः हि=यही; सर्वभूतान्तरात्मा=समस्त प्राणियोंका अन्तरात्मा ॥ ४ ॥
व्याख्या—दूसरे मन्त्रमें जिन परमेश्वरके निराकार स्वरूपका वर्णन किया गया है, उन्हीं परब्रह्मका यह प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाला जगत् विराट् रूप है। इन विराट्स्वरूप परमेश्वरका अग्नि अर्थात् धूलोक ही मानो मस्तक है, चन्द्रमा और सूर्य दोनों नेत्र हैं, समस्त दिशाएँ कान हैं, नाना छन्द और ऋचाओंके रूपमें विस्तृत चारों वेद वाणी हैं, वायु प्राण है, सम्पूर्ण चराचर जगत् हृदय है, पृथ्वी मानो उनके पैर हैं। ये ही परब्रह्म परमेश्वर समस्त प्राणियोंके अन्तर्मीमा परमात्मा हैं ॥ ४ ॥
सम्बन्ध—उन परमात्मासे इस चराचर जगत्की उत्पत्ति किस क्रमसे होती है, इस जिज्ञासापर प्रकारान्तरसे जगत्की उत्पत्तिका क्रम बतलाते हैं—
तस्मादग्निः समिधो यस्य सूर्यः सोमात्पज्जन्य ओषधयः पृथिव्याम् । पुमान् रेतः सिञ्चति योषितायां बह्वीः प्रजाः पुरुषात् सम्प्रसूताः ॥ ५ ॥
तस्मात्=उससे ही; अग्निः=अग्निदेव प्रकट हुआ; यस्य समिधः=जिसकी समिधा; सूर्यः=सूर्य है; (उस अग्निसे सोम उत्पन्न हुआ) सोमात्=सोमसे; पज्जन्यः=मेघ उत्पन्न हुए (और मेघोंसे वर्षाद्वारा); पृथिव्याम्=पृथ्वीमें; ओषधयः=नाना प्रकारकी ओषधियाँ (उत्पन्न हुईं); रेतः=(ओषधियोंके भक्षणसे उत्पन्न हुए) वीर्यको; पुमान्=पुरुष; योषितायाम्=स्त्रीमें; सिञ्चति=सिंचन करता है (जिससे संतान उत्पन्न होती है); [ एवम् ]=इस प्रकार; पुरुषात्=उस परम पुरुषसे ही; बह्वीः प्रजाः=नाना प्रकारके चराचर प्राणी; सम्प्रसूताः=नियमपूर्वक उत्पन्न हुए हैं ॥ ५ ॥
२५२
ईशादि नौ उपनिषद्
[ मुण्डक २ ]
व्याख्या —जब-जब परमेश्वरसे यह जगत् उत्पन्न होता है तब-तब सदैव एक प्रकारसे ही होता हो—ऐसा नियम नहीं है। वे जब जैसा संकल्प करते हैं, उसी प्रकार उसी क्रमसे जगत् उत्पन्न हो जाता है। इसी भावको प्रकट करनेके लिये यहाँ प्रकारान्तरसे सृष्टिकी उत्पत्ति बतलाई गयी है। मन्त्रका सारांश यह है कि परब्रह्म पुरुषोत्तमसे सर्वप्रथम तो उनकी अचिन्त्य शक्तिका एक अंश अद्भुत अग्निात्त्व उत्पन्न हुआ, जिसकी समिधा (ईंधन) सूर्य है, अर्थात् जो सूर्यबिम्बके रूपमें प्रज्वलित रहती है; अग्रिसे चन्द्रमा उत्पन्न हुआ, चन्द्रमासे (सूर्यकी रश्मियोंमें सूक्ष्मरूपसे स्थित जलमें कुछ शीतलता आ जानेके कारण) मेघ उत्पन्न हुए। मेघोंसे वर्षाद्वारा पृथ्वीमें नाना प्रकारकी ओषधियाँ उत्पन्न हुईं। उन ओषधियोंके भक्षणसे उत्पन्न हुए वीर्यको जब पुरुष अपनी जातिकी स्त्रीमें सिंचन करता है, तब उससे संतान उत्पन्न होती है। इस प्रकार परमपुरुष परमेश्वरसे ये नाना प्रकारके चराचर प्राणी उत्पन्न हुए हैं ॥५॥
सम्बन्ध —इस प्रकार समस्त प्राणियोंकी उत्पत्तिका क्रम बतलाकर अब यह बात बतायी जाती है कि उन सबकी रक्षाके लिये किये जानेवाले यज्ञादि, उनके साधन और फल भी उन्हीं परमेश्वरसे प्रकट होते हैं—
तस्मादृचः साम यजुषि दीक्षा यज्ञाश्च सर्वे क्रतवो दक्षिणाश्च। संवत्सरश्च यजमानश्च लोकाः सोमो यत्र पवते यत्र सूर्यः ॥ ६ ॥
तस्मात्—उस परमेश्वरसे ही; ऋचः=ऋग्वेदकी ऋचाएँ; साम=सामवेदके मन्त्र; यजुषि=यजुर्वेदकी श्रुतियाँ; (और) दीक्षा=दीक्षा; च=तथा; सर्वे=समस्त; यज्ञाः=यज्ञ; क्रतवः=क्रतु; च=एवं; दक्षिणाः=दक्षिणाएँ; च=तथा; संवत्सरः=संवत्सररूप काल; यजमानः=यजमान; च=और; लोकाः=सब लोक (उत्पन्न हुए हैं); यत्र=जहाँ; सोमः=चन्द्रमा; पवते=प्रकाश फैलाता है (और); यत्र=जहाँ; सूर्यः=सूर्य; [ पवते ]=प्रकाश देता है ॥ ६ ॥
खण्ड १ ]
मुण्डकोपनिषद्
२५३
व्याख्या —उन परमेश्वरसे ही ऋग्वेदकी ऋचाएँ, सामवेदके मन्त्र और यजुर्वेदकी श्रुतियाँ एवं यज्ञादि कर्मोंकी दीक्षा*, सब प्रकारके यज्ञ और क्रतु,† उनमें दी जानेवाली दक्षिणाएँ, जिसमें वे किये जाते हैं—वह संवत्सररूप काल, उनको करनेका अधिकारी यजमान, उनके फलस्वरूप वे सब लोक, जहाँ चन्द्रमा और सूर्य प्रकाश फैलाते हैं—ये सब उत्पन्न हुए हैं॥६॥
सम्बन्ध —अब देवादि समस्त प्राणियोंके भेद और सब प्रकारके सदाचार भी उन्हीं ब्रह्मसे उत्पन्न हुए हैं, यह बतलाते हैं—
तस्माच्च देवा बहुधा सम्प्रसूताः साध्या मनुष्याः पशवो वयांसि । प्राणापानौ व्रीहियवौ तपश्च श्रद्धा सत्यं ब्रह्मचर्यं विधिश्च॥७॥
च=तथा; तस्मात्=उसी परमेश्वरसे; बहुधा=अनेक भेदोंवाले; देवाः=देवतालोग; सम्प्रसूताः=उत्पन्न हुए; साध्याः=साध्यगण; मनुष्याः=मनुष्य; पशवः वयांसि=पशु-पक्षी; प्राणापानौ=प्राण-अपानवायु; व्रीहियवौ=धान, जो आदि अन्न; च=तथा; तपः=तप; श्रद्धा=श्रद्धा; सत्यम्=सत्य (और); ब्रह्मचर्यम्=ब्रह्मचर्य; च=एवं; विधिः=यज्ञ आदिके अनुष्ठानकी विधि भी; [ एते सम्प्रसूताः ]=ये सब-के-सब उत्पन्न हुए हैं॥७॥
व्याख्या —उन परब्रह्म परमेश्वरसे ही वसु, रुद्र आदि अनेक भेदोंवाले देवतालोग उत्पन्न हुए हैं। उन्हींसे साध्यगण, नाना प्रकारके मनुष्य, विभिन्न जातियोंके पशु, विविध भाँतिके पक्षी और अन्य सब प्राणी उत्पन्न हुए हैं। सबके जीवनरूप प्राण और अपान तथा सब प्राणियोंके आहाररूप धान, जो आदि
- शास्त्रविधिके अनुसार किसी यज्ञका आरम्भ करते समय यजमान जो संकल्पके साथ उसके अनुष्ठानसम्बन्धी नियमोंके पालनका व्रत लेता है, उसका नाम 'दीक्षा' है।
† यज्ञ और क्रतु—ये यज्ञके ही दो भेद हैं। जिन यज्ञोंमें यूष बनानेकी विधि है, उन्हें 'क्रतु' कहते हैं।