ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 255, कुल 548 में से
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मुण्डकोपनिषद्
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व्याख्या —उन परमेश्वरसे ही ऋग्वेदकी ऋचाएँ, सामवेदके मन्त्र और यजुर्वेदकी श्रुतियाँ एवं यज्ञादि कर्मोंकी दीक्षा*, सब प्रकारके यज्ञ और क्रतु,† उनमें दी जानेवाली दक्षिणाएँ, जिसमें वे किये जाते हैं—वह संवत्सररूप काल, उनको करनेका अधिकारी यजमान, उनके फलस्वरूप वे सब लोक, जहाँ चन्द्रमा और सूर्य प्रकाश फैलाते हैं—ये सब उत्पन्न हुए हैं॥६॥
सम्बन्ध —अब देवादि समस्त प्राणियोंके भेद और सब प्रकारके सदाचार भी उन्हीं ब्रह्मसे उत्पन्न हुए हैं, यह बतलाते हैं—
तस्माच्च देवा बहुधा सम्प्रसूताः साध्या मनुष्याः पशवो वयांसि । प्राणापानौ व्रीहियवौ तपश्च श्रद्धा सत्यं ब्रह्मचर्यं विधिश्च॥७॥
च=तथा; तस्मात्=उसी परमेश्वरसे; बहुधा=अनेक भेदोंवाले; देवाः=देवतालोग; सम्प्रसूताः=उत्पन्न हुए; साध्याः=साध्यगण; मनुष्याः=मनुष्य; पशवः वयांसि=पशु-पक्षी; प्राणापानौ=प्राण-अपानवायु; व्रीहियवौ=धान, जो आदि अन्न; च=तथा; तपः=तप; श्रद्धा=श्रद्धा; सत्यम्=सत्य (और); ब्रह्मचर्यम्=ब्रह्मचर्य; च=एवं; विधिः=यज्ञ आदिके अनुष्ठानकी विधि भी; [ एते सम्प्रसूताः ]=ये सब-के-सब उत्पन्न हुए हैं॥७॥
व्याख्या —उन परब्रह्म परमेश्वरसे ही वसु, रुद्र आदि अनेक भेदोंवाले देवतालोग उत्पन्न हुए हैं। उन्हींसे साध्यगण, नाना प्रकारके मनुष्य, विभिन्न जातियोंके पशु, विविध भाँतिके पक्षी और अन्य सब प्राणी उत्पन्न हुए हैं। सबके जीवनरूप प्राण और अपान तथा सब प्राणियोंके आहाररूप धान, जो आदि
- शास्त्रविधिके अनुसार किसी यज्ञका आरम्भ करते समय यजमान जो संकल्पके साथ उसके अनुष्ठानसम्बन्धी नियमोंके पालनका व्रत लेता है, उसका नाम 'दीक्षा' है।
† यज्ञ और क्रतु—ये यज्ञके ही दो भेद हैं। जिन यज्ञोंमें यूष बनानेकी विधि है, उन्हें 'क्रतु' कहते हैं।