ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 254, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ मुण्डक २ ]
व्याख्या —जब-जब परमेश्वरसे यह जगत् उत्पन्न होता है तब-तब सदैव एक प्रकारसे ही होता हो—ऐसा नियम नहीं है। वे जब जैसा संकल्प करते हैं, उसी प्रकार उसी क्रमसे जगत् उत्पन्न हो जाता है। इसी भावको प्रकट करनेके लिये यहाँ प्रकारान्तरसे सृष्टिकी उत्पत्ति बतलाई गयी है। मन्त्रका सारांश यह है कि परब्रह्म पुरुषोत्तमसे सर्वप्रथम तो उनकी अचिन्त्य शक्तिका एक अंश अद्भुत अग्निात्त्व उत्पन्न हुआ, जिसकी समिधा (ईंधन) सूर्य है, अर्थात् जो सूर्यबिम्बके रूपमें प्रज्वलित रहती है; अग्रिसे चन्द्रमा उत्पन्न हुआ, चन्द्रमासे (सूर्यकी रश्मियोंमें सूक्ष्मरूपसे स्थित जलमें कुछ शीतलता आ जानेके कारण) मेघ उत्पन्न हुए। मेघोंसे वर्षाद्वारा पृथ्वीमें नाना प्रकारकी ओषधियाँ उत्पन्न हुईं। उन ओषधियोंके भक्षणसे उत्पन्न हुए वीर्यको जब पुरुष अपनी जातिकी स्त्रीमें सिंचन करता है, तब उससे संतान उत्पन्न होती है। इस प्रकार परमपुरुष परमेश्वरसे ये नाना प्रकारके चराचर प्राणी उत्पन्न हुए हैं ॥५॥
सम्बन्ध —इस प्रकार समस्त प्राणियोंकी उत्पत्तिका क्रम बतलाकर अब यह बात बतायी जाती है कि उन सबकी रक्षाके लिये किये जानेवाले यज्ञादि, उनके साधन और फल भी उन्हीं परमेश्वरसे प्रकट होते हैं—
तस्मादृचः साम यजुषि दीक्षा यज्ञाश्च सर्वे क्रतवो दक्षिणाश्च। संवत्सरश्च यजमानश्च लोकाः सोमो यत्र पवते यत्र सूर्यः ॥ ६ ॥
तस्मात्—उस परमेश्वरसे ही; ऋचः=ऋग्वेदकी ऋचाएँ; साम=सामवेदके मन्त्र; यजुषि=यजुर्वेदकी श्रुतियाँ; (और) दीक्षा=दीक्षा; च=तथा; सर्वे=समस्त; यज्ञाः=यज्ञ; क्रतवः=क्रतु; च=एवं; दक्षिणाः=दक्षिणाएँ; च=तथा; संवत्सरः=संवत्सररूप काल; यजमानः=यजमान; च=और; लोकाः=सब लोक (उत्पन्न हुए हैं); यत्र=जहाँ; सोमः=चन्द्रमा; पवते=प्रकाश फैलाता है (और); यत्र=जहाँ; सूर्यः=सूर्य; [ पवते ]=प्रकाश देता है ॥ ६ ॥