ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 253, कुल 548 में से
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मुण्डकोपनिषद्
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अस्य=इस परमेश्वरका; अग्नि =:अग्नि; मूर्धा=मस्तक है; चन्द्रसूर्यौ=चन्द्रमा और सूर्य; चक्षुषी=दोनों नेत्र हैं; दिशः=सब दिशाएँ; श्रोत्रे=दोनों कान हैं; च=और; विवृताः वेदाः=विस्तृत वेद; वाक्=वाणी हैं (तथा); वायुः प्राणः=वायु प्राण है; विश्वम् हृदयम्=जगत् हृदय है; पदभ्याम्=इसके दोनों पैरोंसे; पृथिवी=पृथ्वी (उत्पन्न हुई है); एषः हि=यही; सर्वभूतान्तरात्मा=समस्त प्राणियोंका अन्तरात्मा ॥ ४ ॥
व्याख्या—दूसरे मन्त्रमें जिन परमेश्वरके निराकार स्वरूपका वर्णन किया गया है, उन्हीं परब्रह्मका यह प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाला जगत् विराट् रूप है। इन विराट्स्वरूप परमेश्वरका अग्नि अर्थात् धूलोक ही मानो मस्तक है, चन्द्रमा और सूर्य दोनों नेत्र हैं, समस्त दिशाएँ कान हैं, नाना छन्द और ऋचाओंके रूपमें विस्तृत चारों वेद वाणी हैं, वायु प्राण है, सम्पूर्ण चराचर जगत् हृदय है, पृथ्वी मानो उनके पैर हैं। ये ही परब्रह्म परमेश्वर समस्त प्राणियोंके अन्तर्मीमा परमात्मा हैं ॥ ४ ॥
सम्बन्ध—उन परमात्मासे इस चराचर जगत्की उत्पत्ति किस क्रमसे होती है, इस जिज्ञासापर प्रकारान्तरसे जगत्की उत्पत्तिका क्रम बतलाते हैं—
तस्मादग्निः समिधो यस्य सूर्यः सोमात्पज्जन्य ओषधयः पृथिव्याम् । पुमान् रेतः सिञ्चति योषितायां बह्वीः प्रजाः पुरुषात् सम्प्रसूताः ॥ ५ ॥
तस्मात्=उससे ही; अग्निः=अग्निदेव प्रकट हुआ; यस्य समिधः=जिसकी समिधा; सूर्यः=सूर्य है; (उस अग्निसे सोम उत्पन्न हुआ) सोमात्=सोमसे; पज्जन्यः=मेघ उत्पन्न हुए (और मेघोंसे वर्षाद्वारा); पृथिव्याम्=पृथ्वीमें; ओषधयः=नाना प्रकारकी ओषधियाँ (उत्पन्न हुईं); रेतः=(ओषधियोंके भक्षणसे उत्पन्न हुए) वीर्यको; पुमान्=पुरुष; योषितायाम्=स्त्रीमें; सिञ्चति=सिंचन करता है (जिससे संतान उत्पन्न होती है); [ एवम् ]=इस प्रकार; पुरुषात्=उस परम पुरुषसे ही; बह्वीः प्रजाः=नाना प्रकारके चराचर प्राणी; सम्प्रसूताः=नियमपूर्वक उत्पन्न हुए हैं ॥ ५ ॥