ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 252, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ मुण्डक २ ]
व्याख्या —वे दिव्य पुरुष परमात्मा निःसंदेह आकाररहित और समस्त जगत्के बाहर एवं भीतर भी परिपूर्ण हैं। वे जन्म आदि विकारोंसे रहित, सर्वथा विशुद्ध हैं; क्योंकि उनके न तो प्राण हैं, न इन्द्रियाँ हैं और न मन ही है। वे इन सबके बिना ही सब कुछ करनेमें समर्थ हैं; इसीलिये वे सर्वशक्तिमान् परमेश्वर अविनाशी जीवात्मासे अत्यन्त श्रेष्ठ—सर्वथा उत्तम हैं ॥ २ ॥
सम्बन्ध —उपर्युक्त लक्षणोंवाले निराकार परमेश्वरसे यह साकार जगत् किस प्रकार उत्पन्न हो जाता है, इस जिज्ञासापर उनकी सर्वशक्तिमताका वर्णन करते हैं—
एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च।
खं वायुज्यौतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी ॥ ३ ॥
एतस्मात् —इसी परमेश्वरसे; प्राणः —प्राण; जायते —उत्पन्न होता है (तथा); मनः —मन (अन्तःकरण); सर्वेन्द्रियाणि —समस्त इन्द्रियाँ, खम् —आकाश; वायुः —वायु; ज्योतिः —तेज; आपः —जल; चः —और; विश्वस्य धारिणी —सम्पूर्ण प्राणियोंको धारण करनेवाली; पृथिवी —पृथ्वी (ये सब उत्पन्न होते हैं) ॥ ३ ॥
व्याख्या —यद्यपि वे परब्रह्म पुरुषोत्तम निराकार और मन, इन्द्रिय आदि करण-समुदायसे सर्वथा रहित हैं, तथापि सब कुछ करनेमें समर्थ हैं। इन सर्वशक्तिमान् परब्रह्म पुरुषोत्तमसे ही सृष्टिकालमें प्राण, मन (अन्तःकरण) और सम्पूर्ण इन्द्रियाँ तथा आकाश, वायु, तेज, जल और सम्पूर्ण प्राणियोंको धारण करनेवाली पृथ्वी—ये पाँचों महाभूत, सब-के-सब उत्पन्न होते हैं ॥ ३ ॥
सम्बन्ध —इस प्रकार संक्षेपमें परमेश्वरसे सूक्ष्म तत्वोंकी उत्पत्तिका प्रकार बतलाकर अब इस जगत्में भगवान्का विराट् रूप देखनेका प्रकार बतलाते हैं—
अग्निर्मूर्धा चक्षुषी चन्द्रसूर्यौ
दिशः श्रोत्रे वाग् विवृताश्च वेदाः।
वायुः प्राणो हृदयं विश्वमस्य
पदभ्यां पृथिवी होष सर्वभूतान्तरात्मा ॥ ४ ॥