ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 251, कुल 548 में से
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मुण्डकोपनिषद्
२४९
सोम्य=हे प्रिय!; तत्=वह; सत्यम्=सत्य; एतत्=यह है; यथा=जिस प्रकार; सुदीमात् पावकात्=प्रज्वलित अग्निमेंसे; सरूपाः=उसीके समान रूपवाली; सहस्रशः=हजारों; विस्फुल्लिङ्गाः=चिनगारियाँ; प्रभवन्ते=नाना प्रकारसे प्रकट होती हैं; तथा=उसी प्रकार; अक्षरात्=अविनाशी ब्रह्मसे; विविधाः=नाना प्रकारके; भावाः=भाव; प्रजायन्ते=उत्पन्न होते हैं; च=और; तत्र एव=उसीमें; अपियन्ति=विलीन हो जाते हैं* ॥ १ ॥
व्याख्या —महर्षि अङ्गिरा कहते हैं—प्रिय शौनक! मैंने तुमको पहले परब्रह्म परमेश्वरके स्वरूपका वर्णन करते हुए (पूर्व प्रकरणके पहले खण्डमें छठे मन्त्रसे नवैतक) जो रहस्य बतलाया था, वह सर्वथा सत्य है; अब उसीको पुनः समझाता हूँ, तुम ध्यानपूर्वक सुनो। जिस प्रकार प्रज्वलित अग्निमेंसे उसीके-जैसे रूप-रंगवाली हजारों चिनगारियाँ चारों ओर निकलती हैं, उसी प्रकार परमपुरुष अविनाशी ब्रह्मसे सृष्टिकालमें नाना प्रकारके भाव मूर्त-अमूर्त पदार्थ उत्पन्न होते हैं और प्रलयकालमें पुनः उन्हींमें लीन हो जाते हैं। यहाँ भावोंके प्रकट होनेकी बात समझानेके लिये ही अग्नि और चिनगारियोंका दृष्टान्त दिया गया है। उनके विलीन होनेकी बात दृष्टान्तसे स्पष्ट नहीं होती ॥ १ ॥
सम्बन्ध —जिन परब्रह्म अविनाशी पुरुषोत्तमसे यह जगत् उत्पन्न होकर पुनः उन्हींमें विलीन हो जाता है, वे स्वयं कैसे हैं—इस जिज्ञासापर कहते हैं—
दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः।
अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्षरात् परतः परः ॥ २ ॥
हि=निश्चय ही; दिव्यः=दिव्य; पुरुषः=पूर्णपुरुष; अमूर्तः=आकाररहित; सबाह्याभ्यन्तरः हि=समस्त जगत्के बाहर और भीतर भी व्याप्त; अजः=जन्मादि विकारोंसे अतीत; अप्राणः=प्राणरहित; अमनाः=मनरहित; हि=होनेके कारण; शुभ्रः=सर्वथा विशुद्ध है (तथा); हि=इसीलिये; अक्षरात्=अविनाशी जीवात्मासे; परतः परः=अत्यन्त श्रेष्ठ है ॥ २ ॥
- प्रथम मुण्डकके प्रथम खण्डके सातवें मन्त्रमें मकड़ी, पृथ्वी और मनुष्य-शरीरके दृष्टान्तसे जो बात कही थी, वही बात इस मन्त्रमें अगिके दृष्टान्तसे समझायी गयी है।