ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 250, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ मुण्डक २ ]
प्रोवाच=भलीभाँति उपदेश करे; येन [ सः ]=जिससे वह शिष्य; अक्षरम्=अविनाशी; सत्यम्=नित्य; पुरुषम्=परम पुरुषको; वेद=जान ले ॥ १३ ॥
व्याख्या —उन श्रोत्रिय ब्रह्मणिष्ठ महात्माको भी चाहिये कि अपनी शरणमें आये हुए ऐसे शिष्यको, जिसका चित्त पूर्णतया शान्त—निश्चिन्त हो चुका हो, सांसारिक भोगोंमें सर्वथा वैराग्य हो जानेके कारण जिसके चित्तमें किसी प्रकारकी चिन्ता, व्याकुलता या विकार नहीं रह गये हों, जो शम-दमादि साधनसम्पन्न हो अर्थात् जिसने अपने मन, बुद्धि और इन्द्रियोंको भलीभाँति वशमें कर लिया हो, उस ब्रह्मविद्याका तत्त्व-विवेचनपूर्वक भलीभाँति समझाकर उपदेश करे, जिससे वह शिष्य नित्य अविनाशी परब्रह्म पुरुषोत्तमका ज्ञान प्राप्त कर सके ॥ १३ ॥
॥ द्वितीय खण्ड समाप्त ॥ २ ॥
॥ प्रथम मुण्डक समाप्त ॥ १ ॥
द्वितीय मुण्डक
प्रथम खण्ड
सम्बन्ध —प्रथम मुण्डकके द्वितीय खण्डमें अपर विद्याका स्वरूप और फल बतलाया तथा उसकी तुच्छता दिखाते हुए उससे विरक्त होनेकी बात कहकर परविद्या प्राप्त करनेके लिये सदुरुकी शरणमें जानेको कहा। अब परविद्याका वर्णन करनेके लिये प्रकरण आरम्भ करते हैं—
तदेतत्सत्यं यथा सुदीप्तात्पावकाद् विस्फुल्लिङ्गाः
सहस्रशः प्रभवन्ते सरूपाः ।
तथाक्षराद् विविधाः सोम्य भावाः
प्रजायन्ते तत्र चैवापियन्ति ॥ १ ॥