ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 249, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड २ ]
मुण्डकोपनिषद्
२४७
करके; ब्राह्मणः=ब्राह्मण; निर्वेदम्=वैराग्यको; आयात्=प्राप्त हो जाय (यह समझ ले कि); कृतेन=किये जानेवाले कर्मोंसे; अकृतः=स्वतःसिद्ध नित्य परमेश्वर; न अस्ति=नहीं मिल सकता; सः=वह; तद्विज्ञानार्थम्=उस परब्रह्मका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये; समित्पाणिः=हाथमें समिधा लेकर; श्रोत्रियम्=वेदको भलीभाँति जानेवाले (और); ब्रह्मनिष्ठम्=परब्रह्म परमात्मामें स्थित; गुरुम्=गुरुके पास; एव=ही; अभिगच्छेत्=विनयपूर्वक जाय ॥ १२ ॥
व्याख्या —अपना कल्याण चाहनेवाले मनुष्यको पहले बतलाये हुए सकाम कर्मके फलस्वरूप इस लोक और परलोकके समस्त सांसारिक सुखोंकी भलीभाँति परीक्षा करके अर्थात् विवेकपूर्वक उनकी अनित्यता और दुःखरूपताको समझकर सब प्रकारके भोगोंसे सर्वथा विरक्त हो जाना चाहिये। यह निश्चय कर लेना चाहिये कि कर्तापनके अभिमानपूर्वक सकामभावसे किये जानेवाले कर्म अनित्य फलको देनेवाले तथा स्वयं भी अनित्य हैं। अतः जो सर्वथा अकृत है अर्थात् क्रियासाध्य नहीं है, ऐसे नित्य परमेश्वरकी प्राप्ति वे नहीं करा सकते। यह सोचकर उस जिज्ञासुको परमात्माका वास्तविक तत्त्वज्ञान प्राप्त करनेके लिये हाथमें समिधा लेकर श्रद्धा और विनयभावके सहित ऐसे सदगुरुकी शरणमें जाना चाहिये, जो वेदोंके रहस्यको भलीभाँति जानते हों और परब्रह्म परमात्मामें स्थित हों ॥ १२ ॥
सम्बन्ध —ऊपर बतलाये हुए लक्षणोंवाला कोई शिष्य यदि गुरुके पास आ जाय तो गुरुको क्या करना चाहिये, इस जिज्ञासापर कहते हैं—
तस्मै स विद्वानुपसन्नाय सम्यक् प्रशान्तचित्ताय शमान्विताय । येनाक्षरं पुरुषं वेद सत्यं प्रोवाच तां तत्त्वतो ब्रह्मविद्याम् ॥ १३ ॥
सः=वह; विद्वान्=ज्ञानी महात्मा; उपसन्नाय=शरणमें आये हुए; सम्यक्प्रशान्तचित्ताय=पूर्णतया शान्तचित्तवाले; शमान्विताय=शम-दमादि साधनयुक्त; तस्मै=उस शिष्यको; ताम् ब्रह्मविद्याम्=उस ब्रह्मविद्याका; तत्त्वतः=तत्त्व-विवेचनपूर्वक;