ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 256, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ मुण्डक २ ]
अनेक प्रकारके अन्न भी उन्हींसे उत्पन्न हुए हैं। उन्हींसे तप, श्रद्धा, सत्य और ब्रह्मचर्य प्रकट हुए हैं तथा यज्ञादि कर्म करनेकी विधि भी उन परमेश्वरसे ही प्रकट हुई है। तात्पर्य यह कि सब कुछ उन्हींसे उत्पन्न हुआ है। वे ही सबके परम कारण हैं ॥७॥
सप्त प्राणाः प्रभवन्ति तस्मात् सप्तर्चिषः समिधः सप्त होमाः । सप्त इमे लोका येषु चरन्ति प्राणा गुहाशया निहिताः सप्त सप्त ॥८॥
तस्मात्=उसी परमेश्वरसे; सप्त=सात; प्राणाः=प्राण; प्रभवन्ति=उत्पन्न होते हैं (तथा); सप्त अर्चिषः=अग्निकी (काली-कराली आदि) सात लपटें; [सप्त] समिधः=सात (विषयरूपी) समिधाएँ; सप्त= सात प्रकारके; होमाः=हवन (तथा); इमे सप्त लोकाः=ये सात लोक—इन्द्रियोंके सात द्वार (उसीसे उत्पन्न होते हैं); येषु=जिनमें; प्राणाः=प्राण; चरन्ति=विचरते हैं; गुहाशयाः=हृदयरूप गुफामें शयन करनेवाले ये; सप्त सप्त=सात-सातके समुदाय; निहिताः=(उसीके द्वारा) सब प्राणियोंमें स्थापित किये हुए हैं ॥८॥
व्याख्या—उन्हीं परमेश्वरसे सात प्राण अर्थात् जिनमें विषयोंको प्रकाशित करनेकी विशेष शक्ति है, ऐसी सात इन्द्रियाँ—कान, त्वचा, नेत्र, रसना और प्राण तथा वाणी एवं मन*; तथा मनसहित इन्द्रियोंकी सुनना, स्पर्श करना, देखना, स्वाद लेना, सृष्टिना, बोलना और मनन करना, इस प्रकार सात वृत्तियाँ अर्थात् विषय ग्रहण करनेवाली शक्तियाँ; उन इन्द्रियोंके विषयरूप सात समिधाएँ; सात प्रकारका हवन अर्थात् बाह्यविषयरूप समिधाओंका इन्द्रियरूप
- ब्रह्मसूत्रमें इस विषयपर विचार किया गया है कि यहाँ इन्द्रियाँ सात ही क्यों बतलाई गयी हैं, वहाँ कहा गया है कि इन सातके अतिरिक्त हाथ, पैर, उपस्थ तथा गुदा भी इन्द्रियाँ हैं, अतः मनसहित कुल ग्यारह इन्द्रियाँ हैं, यहाँ प्रधानतासे सातका वर्णन है (ब्रह्मसूत्र २।४।२,६)।