ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 257, कुल 548 में से
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मुण्डकोपनिषद्
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अग्नियोंमें निक्षेपरूप क्रिया और इन इन्द्रियोंके वासस्थानरूप सात लोक, जिनमें रहकर ये इन्द्रियरूप सात प्राण अपना-अपना कार्य करते हैं—निद्राके समय मनके साथ एक होकर हृदयरूप गुफामें शयन करनेवाले ये सात-सातके समुदाय परमेश्वरके द्वारा ही समस्त प्राणियोंमें स्थापित किये हुए हैं ॥८॥
सम्बन्ध —इस प्रकार आध्यात्मिक वस्तुओंकी उत्पत्ति और स्थिति परमेश्वरसे बतलाकर अब बाह्य जगत्की उत्पत्ति भी उसीसे बताते हुए प्रकरणका उपसंहार करते हैं—
अतः समुद्रा गिरयश्च सर्वे- उस्मात्स्यन्दन्ते सिन्धवः सर्वरूपाः । अतश्च सर्वा ओषधयो रसश्च येनैष भूतैस्तिष्ठते ह्यन्तरात्मा ॥ ९ ॥
अतः=इसीसे; सर्वे=समस्त; समुद्राः=समुद्र; च=और; गिरयः=पर्वत (उत्पन्न हुए हैं); अस्मात्=इसीसे (प्रकट होकर); सर्वरूपाः=अनेक रूपोंवाली; सिन्धवः=नदियाँ; स्यन्दन्ते=बहती हैं; च=तथा; अतः=इसीसे; सर्वाः=सम्पूर्ण; ओषधयः=ओषधियाँ; च=और; रसः=रस (उत्पन्न हुए हैं); येन=जिस रससे (पुष्ट हुए शरीरोंमें); हि=ही; एषः=यह; अन्तरात्मा=(सबका) अन्तरात्मा (परमेश्वर); भूतैः=सब प्राणियों (की आत्मा)-के सहित; तिष्ठते=(उन-उनके हृदयमें) स्थित है ॥९॥
व्याख्या —इन्हीं परमेश्वरसे समस्त समुद्र और पर्वत उत्पन्न हुए हैं, इन्हींसे निकलकर अनेक आकारवाली नदियाँ बह रही हैं, इन्हींसे समस्त ओषधियाँ और वह रस भी उत्पन्न हुआ है, जिससे पुष्ट हुए शरीरोंमें वे सबके अन्तरात्मा परमेश्वर उन सब प्राणियोंकी आत्माके सहित उन-उनके हृदयमें रहते हैं ॥९॥
सम्बन्ध —उन परमेश्वरसे सबकी उत्पत्ति होनेके कारण सब उन्हींका स्वरूप है, यह कहकर उनको जाननेका फल बताते हुए इस खण्डकी समाप्ति करते हैं—