ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ मुण्डक २ ]
पुरुष एवेदं विश्वं कर्म तपो ब्रह्म परामृतम् । एतद्यो वेद निहितं गुहायां सोऽविद्याग्रन्थिं विकिरतीह सोम्य ॥ १० ॥
तपः=तपः; कर्म=कर्म; (और) परामृतम्=परम अमृतरूपः; ब्रह्म=ब्रह्म; इदम्=यह; विश्वम्=सब कुछ; पुरुषः एव=परमपुरुष पुरुषोत्तम ही है; सोम्य=हे प्रिय!; एतत्=इस; गुहायाम्=हृदयरूप गुफामें; निहितम्=स्थित अन्तर््यामी परमपुरुषको; यः=जो; वेद=जानता है; सः=वह; इह [ एव ]=यहाँ (इस मनुष्यशरीरमें) ही; अविद्याग्रन्थिम्=अविद्याजनित गॉठको; विकिरति=खोल डालता है ॥ १० ॥
व्याख्या—तप अर्थात् संयमरूप साधन, कर्म अर्थात् बाह्य साधनोंद्वारा किये जानेवाले कृत्य तथा परम अमृत ब्रह्म—यह सब कुछ परमपुरुष पुरुषोत्तम ही है। प्रिय शौनक! हृदयरूप गुफामें छिपे हुए इन अन्तर््यामी परमेश्वरको जो जान लेता है, वह इस मनुष्यशरीरमें ही अविद्याजनित अन्तःकरणकी गॉठका भेदन कर देता है अर्थात् सब प्रकारके संशय और भ्रमसे रहित होकर परब्रह्म पुरुषोत्तमको प्राप्त हो जाता है ॥ १० ॥
॥ प्रथम खण्ड समाप्त ॥ १ ॥
द्वितीय खण्ड
आविः संनिहितं गुहाचरं नाम महत्यदमत्रैतत्समर्पितम् । एजत्प्राणत्रिमिषच्च यदेतन्जानथ सदसद्वरेण्यं परं विज्ञानाद्यद्वृष्टिं प्रजानाम् ॥ १ ॥*
आविः=(जो) प्रकाशस्वरूपः; संनिहितम्=अत्यन्त समीपस्थ; गुहाचरम् नाम=(हृदयरूप गुहामें स्थित होनेके कारण) गुहाचरनामसे प्रसिद्ध; महत् पदम्=(और) महान् पद (परम प्राप्य) है; यत्=जितने भी; एजत्=चेष्टा करनेवाले;
- इस मन्त्रसे मिलता हुआ मन्त्र अथर्व० का० १०।८।६ है।