ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 259, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड २ ]
मुण्डकोपनिषद्
२५७
प्राणत्=श्वस लेनेवाले; च=और; निमिषत्=आँखोंको खोलने-मूँदनेवाले (प्राणी हैं); एतत्=ये (सब-के-सब); अत्र=इसीमें; समर्पितम्=समर्पित (प्रतिष्ठित) हैं; एतत्=इस परमेश्वरको; जानथ=तुमलोग जानो; यत्=जो; सत्=सत्; असत्=(और) असत् है; वरेण्यम्=सबके द्वारा वरण करनेयोग्य (और); वरिष्ठम्=अतिशय श्रेष्ठ है (तथा); प्रजानाम्=समस्त प्राणियोंकी; विज्ञानात्=बुद्धिसे; परम्=परे अर्थात् जाननेमें न आनेवाला है ॥ १ ॥
व्याख्या —सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञ और सर्वव्यापी परमेश्वर प्रकाशस्वरूप हैं। समस्त प्राणियोंके अत्यन्त समीप उन्हींके हृदयरूप गुहामें छिपे रहनेके कारण ही ये गुहाचरनामसे प्रसिद्ध हैं। जितने भी हिलने-चलनेवाले, श्वस लेनेवाले और आँख खोलने-मूँदनेवाले प्राणी हैं, उन सबका समुदाय इन्हीं परमेश्वरमें समर्पित अर्थात् स्थित है। सबके आश्रय ये परमात्मा ही हैं। तुम इनको जानो। ये सत् और असत् अर्थात् कार्य और कारण एवं प्रकट और अप्रकट—सब कुछ हैं। सबके द्वारा वरण करनेयोग्य और अत्यन्त श्रेष्ठ हैं तथा समस्त प्राणियोंकी बुद्धिसे परे अर्थात् बुद्धिद्वारा अज्ञेय हैं ॥ १ ॥
सम्बन्ध —उन्हीं परब्रह्म परमेश्वरका तत्त्व समझानेके लिये पुनः उनके स्वरूपका दूसरे शब्दोंमें वर्णन करते हैं—
यदधिमद्यदणुभ्योऽणु च यस्मिँल्लोका निहिता लोकिनश्च। तदेतदक्षरं ब्रह्म स प्राणस्तदु वाङ्मनः। तदेतत्सत्यं तदमृतं तद्वेद्व्यं सोम्यं विद्धि ॥ २ ॥
यत्=जो; अधिमत=दीसिमान् है; च=और; यत्=जो; अणुभ्यः=सूक्ष्मोंसे भी; अणु-सूक्ष्म है; यस्मिन्=जिसमें; लोकाः=समस्त लोक; च=और; लोकिनः=उन लोकोंमें रहनेवाले प्राणी; निहिताः=स्थित हैं; तत्=वही; एतत्=यह; अक्षरम्=अविनाशी; ब्रह्म=ब्रह्म है; सः=वही; प्राणः=प्राण है; तत् उ=वही; वाक्=वाणी; मनः=(और) मन है; तत्=वही; एतत्=यह; सत्यम्=सत्य है; तत्=वह; अमृतम्=अमृत है; सोम्य=हे प्यारे!; तत्=उस; वेद्व्यम्=वेधनेयोग्य लक्ष्यको; विद्धि=तू वेध ॥ २ ॥