ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 260, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ मुण्डक २ ]
व्याख्या —जो परब्रह्म परमेश्वर अतिशय देदीप्यमान प्रकाशस्वरूप हैं, जो सूक्ष्मोंसे भी अतिशय सूक्ष्म हैं, जिनमें समस्त लोक और उन लोकोंमें रहनेवाले समस्त प्राणी स्थित हैं अर्थात् ये सब जिनके आश्रित हैं, वे ही परम अक्षर ब्रह्म हैं, वे ही सबके जीवनदाता प्राण हैं, वे ही सबकी वाणी और मन अर्थात् समस्त जगत्के इन्द्रिय और अन्तःकरणरूपमें प्रकट हैं। वे ही परम सत्य और अमृत—अविनाशी तत्त्व हैं। प्रिय शौनक! उस वैधनेयोग्य लक्ष्यको तू वैध अर्थात् आगे बताये जानेवाले प्रकारसे साधन करके उसमें तन्मय हो जा॥ २ ॥
सम्बन्ध —लक्ष्यको वैधनेके लिये धनुष और बाण चाहिये; अतः इस रूपककी पूर्णताके लिये सारी सामग्रीका वर्णन करते हैं—
| धनुर्गृहीत्वौपनिषदं | महास्त्रं |
|---|---|
| शरं | ह्युपासानिशितं |
| संधयीत। | |
| आयम्य तद् | भावगतेन |
| चेतसा | |
| लक्ष्यं | तदेवाक्षरं |
| सोम्य | विद्धि ॥ ३ ॥ |
औपनिषदम्=उपनिषद्में वर्णित प्रणवरूप; महास्त्रम्=महान् अस्त्र; धनुः=धनुषको; गृहीत्वा=लेकर (उसपर); हि=निश्चय ही; उपासानिशितम्=उपासनाद्वारा तीक्ष्ण किया हुआ; शरम्=बाण; संधयीत=चढ़ाये; भावगतेन= (फिर) भावपूर्ण; चेतसा=चित्तके द्वारा; तत्=उस बाणको; आयम्य=खींचकर; सोम्य=हे प्रिय !; तत्=उस; अक्षरम्=परम अक्षर पुरुषोत्तमको; एव=ही; लक्ष्यम्=लक्ष्य मानकर; विद्धि=वैधे ॥ ३ ॥
व्याख्या —जिस प्रकार किसी बाणको लक्ष्यपर छोड़नेसे पहले उसकी नोकको सानपर धरकर तेज किया जाता है, उसपर चढ़े हुए मोरचे आदिको दूर करके उसे उज्ज्वल एवं चमकीला बनाया जाता है, उसी प्रकार आत्मारूपी बाणको उपासनाद्वारा निर्मल एवं शुद्ध बनाकर उसको प्रणवरूप धनुषपर भलीभाँति चढ़ाना चाहिये। अर्थात् आत्माको प्रणवके उच्चारण एवं उसके अर्थरूप परमात्माके चिन्तनमें सम्यक् प्रकारसे लगाना चाहिये। इसके अनन्तर जैसे धनुषको पूरी शक्तिसे खींचकर बाणको लक्ष्यपर छोड़ा जाता है, जिससे