ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 261, कुल 548 में से
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मुण्डकोपनिषद्
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वह पूरी तरहसे लक्ष्यको वेध सके, उसी प्रकार यहाँ भावपूर्ण चित्तसे ओंकारका अधिक-से-अधिक लम्बा उच्चारण एवं उसके अर्थका प्रगाढ़ एवं सुदीर्घ कालतक चिन्तन करनेके लिये कहा गया है, जिससे आत्मा निश्चितरूपसे अविनाशी परमात्मामें प्रवेश कर जाय, उसमें तन्मय होकर अविचल स्थिति प्राप्त कर ले। भाव यह है कि ओंकारका प्रेमपूर्वक उच्चारण एवं उसके अर्थरूप परमात्माका प्रगाढ़ चिन्तन ही उनकी प्राप्तिका सर्वोत्तम उपाय है॥ ३ ॥
सम्बन्ध— पूर्वमन्त्रमें कहे हुए रूपकको यहाँ स्पष्ट करते हैं—
प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते।
अप्रमत्तेन वेद्वद्व्यं शरवत्तन्मयो भवेत्॥ ४ ॥
प्रणवः =(यहाँ) ओंकार ही; धनुः =धनुष है; आत्मा =आत्मा; हि =ही; शरः =बाण है (और); ब्रह्म =परब्रह्म परमेश्वर ही; तल्लक्ष्यम् =उसका लक्ष्य; उच्यते =कहा जाता है; अप्रमत्तेन =(वह) प्रमादरहित मनुष्यद्वारा ही; वेद्वद्व्यम् =बीधा जानेयोग्य है (अतः); शरवत् =(उसे बेधकर) बाणकी तरह; तन्मयः =(उस लक्ष्यमें) तन्मय; भवेत् =हो जाना चाहिये॥ ४ ॥
व्याख्या— ऊपर बतलाये हुए रूपकमें परमेश्वरका वाचक प्रणव (ओंकार) ही मानो धनुष है, यह जीवात्मा ही बाण है और परब्रह्म परमेश्वर ही उसके लक्ष्य हैं। तत्परतासे उनकी उपासना करनेवाले प्रमादरहित साधकद्वारा ही वह लक्ष्य बेधा जा सकता है; इसलिये हे सोम्य! तुझे पूर्वोक्तरूपसे उस लक्ष्यको बेधकर बाणकी ही भाँति उसमें तन्मय हो जाना चाहिये॥ ४ ॥
सम्बन्ध— पुनः परमेश्वरके स्वरूपका वर्णन करते हुए प्रमादरहित और विरक्त होकर उसे जाननेके लिये श्रुति कहती है—
यस्मिन् द्यौः पृथिवी चान्तरिक्ष-
मोतं मनः सह प्राणेश्व सर्वैः।
तमेवैकं जानथ आत्मानमन्या
वाचो विमुञ्चथामृतस्यैष सेतुः॥ ५ ॥