भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ मुण्डक २ ]

यस्मिन्=जिसमें; द्यौः=स्वर्ग; पृथिवी=पृथिवी; च=और; अन्तरिक्षम्=और उनके बीचका आकाश; च=तथा; सर्वैः प्राणैः सह=समस्त प्राणोंके सहित; मनः=मन; ओतम्=गुँथा हुआ है; तम् एव=उसी; एकम्=एक; आत्मानम्=सबके आत्मरूप परमेश्वरको; जानथ=जानो; अन्याः=दूसरी; वाचः=सब बातोंको; विमुञ्चथ=सर्वथा छोड़ दो; एषः=यही; अमृतस्य=अमृतका; सेतुः=सेतु है ॥५॥

व्याख्या —जिन परब्रह्म परमात्मामें स्वर्ग, पृथ्वी तथा उनके बीचका सम्पूर्ण आकाश एवं समस्त प्राण और इन्द्रियोंके सहित मन-बुद्धिरूप अन्तःकरण सबके-सब ओत-प्रोत हैं; उन्हीं एक सर्वात्मा परमेश्वरको तुम पूर्वोक्त उपायके द्वारा जानो; दूसरी सब बातोंको—ग्राम्यचर्चाको सर्वथा छोड़ दो। वे सब तुम्हारे साधनमें विघ्न हैं; अतः उनसे सर्वथा विरक्त होकर साधनमें तत्पर हो जाओ। यही अमृतका सेतु है, अर्थात् संसार-समुद्रसे पार होकर अमृतस्वरूप परमात्माको प्राप्त करनेके लिये पुलके सदृश है ॥५॥

सम्बन्ध —पुनः परमेश्वरके स्वरूपका वर्णन करते हुए उनकी प्रासिका साधन बताते हैं—

अरा इव रथनाभौ संहता यत्र नाड्यः

स एषोऽन्तश्चरते बहुधा जायमानः।

ओमित्येवं ध्यायथ आत्मानं

स्वस्ति वः पाराय तमसः परस्तात् ॥६॥

रथनाभौ=रथकी नाभिमें (जुड़े हुए); अराः इव=अरोंकी भाँति; यत्र=जिसमें; नाड्यः=समस्त देहव्यापिनी नाड़ियाँ; संहताः=एकत्र स्थित हैं; (उसी हृदयमें) सः=वह; बहुधा=बहुत प्रकारसे; जायमानः=उत्पन्न होनेवाला; एषः=यह (अन्तर्यामी परमेश्वर); अन्तः=मध्यभागमें; चरते=रहता है; [ एनम् ]=इस; आत्मानम्=सर्वात्मा परमात्माका; ओम्=ओम्; इति एवम्=इस नामके द्वारा ही; ध्यायथ=ध्यान करो; तमसः परस्तात्=अज्ञानमय अन्धकारसे अतीत; पाराय=(तथा) भवसागरसे अन्तिम तटरूप पुरुषोत्तमकी प्राप्तिके लिये (साधन करनेमें); वः=तुमलोगोंका; स्वस्ति=कल्याण हो ॥६॥