ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 263, कुल 548 में से
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मुण्डकोपनिषद्
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व्याख्या—‘जिस प्रकार रथके पहियेके केन्द्रमें अरे लगे रहते हैं, उसी प्रकार शरीरकी समस्त नाड़ियाँ जिस हृदयदेशमें एकत्र स्थित हैं, उसी हृदयमें नाना रूपसे प्रकट होनेवाले परब्रह्म परमात्मा अन्तर्धामीरूपसे रहते हैं। इन सबके आत्मा पुरुषोत्तमका ‘ओम्’ इस नामके उच्चारणके साथ-साथ निरन्तर ध्यान करते रहो। इस प्रकार परमात्माके ‘ओम्’ इस नामका जप और उसके अर्थभूत परमात्माका ध्यान करते रहनेसे तुम उन परमात्माको प्राप्त करनेमें समर्थ हो जाओगे, जो अज्ञानरूप अन्धकारसे सर्वथा अतीत और संसार-समुद्रके दूसरे पार हैं। तुम्हारा कल्याण हो।’ इस प्रकार आचार्य उपर्युक्त विधिसे साधन करनेवाले शिष्योंको आशीर्वाद देते हैं ॥ ६ ॥
सम्बन्ध—पुनः परमेश्वरके स्वरूपका ही वर्णन करते हैं—
यः सर्वज्ञः सर्वविद् यस्यैष महिमा भुवि। दिव्ये ब्रह्मपुरे होष व्योम्नात्मा प्रतिष्ठितः ॥
मनोमयः प्राणशरीरनेता प्रतिष्ठितोऽत्रे हृदयं संनिधाय। तद्विज्ञानेन परिपश्यन्ति धीरा आनन्दरूपममृतं यद् विभाति ॥ ७ ॥
यः सर्वज्ञः=जो सर्वदा जाननेवाला (और); सर्वविद्=सब ओरसे सबको जाननेवाला है; यस्य=जिसकी; भुवि=जगत्में; एषः=यह; महिमा=महिमा है; एषः हि आत्मा=यह प्रसिद्ध सबका आत्मा परमेश्वर; दिव्ये व्योम्नि=दिव्य आकाशरूप; ब्रह्मपुरे=ब्रह्मलोकमें; प्रतिष्ठितः=स्वरूपसे स्थित है; प्राणशरीरनेता=सबके प्राण और शरीरका नेता; मनोमयः=(यह परमात्मा मनमें व्याप्त होनेके कारण) मनोमय है; हृदयं संनिधाय=(यही) हृदय-कमलका आश्रय लेकर; अत्रे=अन्नमय स्थूल शरीरमें; प्रतिष्ठितः=प्रतिष्ठित है; यत्=जो; आनन्दरूपम्=आनन्दस्वरूप; अमृतम्=अविनाशी परब्रह्म; विभाति=सर्वत्र प्रकाशित है; धीराः=बुद्धिमान् मनुष्य; विज्ञानेन=विज्ञानके द्वारा; तत्=उसको; परिपश्यन्ति=भलीभाँति प्रत्यक्ष कर लेते हैं ॥ ७ ॥