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ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

खण्ड १ ]

मुण्डकोपनिषद्

२५३

व्याख्या —उन परमेश्वरसे ही ऋग्वेदकी ऋचाएँ, सामवेदके मन्त्र और यजुर्वेदकी श्रुतियाँ एवं यज्ञादि कर्मोंकी दीक्षा*, सब प्रकारके यज्ञ और क्रतु,† उनमें दी जानेवाली दक्षिणाएँ, जिसमें वे किये जाते हैं—वह संवत्सररूप काल, उनको करनेका अधिकारी यजमान, उनके फलस्वरूप वे सब लोक, जहाँ चन्द्रमा और सूर्य प्रकाश फैलाते हैं—ये सब उत्पन्न हुए हैं॥६॥

सम्बन्ध —अब देवादि समस्त प्राणियोंके भेद और सब प्रकारके सदाचार भी उन्हीं ब्रह्मसे उत्पन्न हुए हैं, यह बतलाते हैं—

तस्माच्च देवा बहुधा सम्प्रसूताः साध्या मनुष्याः पशवो वयांसि । प्राणापानौ व्रीहियवौ तपश्च श्रद्धा सत्यं ब्रह्मचर्यं विधिश्च॥७॥

च=तथा; तस्मात्=उसी परमेश्वरसे; बहुधा=अनेक भेदोंवाले; देवाः=देवतालोग; सम्प्रसूताः=उत्पन्न हुए; साध्याः=साध्यगण; मनुष्याः=मनुष्य; पशवः वयांसि=पशु-पक्षी; प्राणापानौ=प्राण-अपानवायु; व्रीहियवौ=धान, जो आदि अन्न; च=तथा; तपः=तप; श्रद्धा=श्रद्धा; सत्यम्=सत्य (और); ब्रह्मचर्यम्=ब्रह्मचर्य; च=एवं; विधिः=यज्ञ आदिके अनुष्ठानकी विधि भी; [ एते सम्प्रसूताः ]=ये सब-के-सब उत्पन्न हुए हैं॥७॥

व्याख्या —उन परब्रह्म परमेश्वरसे ही वसु, रुद्र आदि अनेक भेदोंवाले देवतालोग उत्पन्न हुए हैं। उन्हींसे साध्यगण, नाना प्रकारके मनुष्य, विभिन्न जातियोंके पशु, विविध भाँतिके पक्षी और अन्य सब प्राणी उत्पन्न हुए हैं। सबके जीवनरूप प्राण और अपान तथा सब प्राणियोंके आहाररूप धान, जो आदि

  • शास्त्रविधिके अनुसार किसी यज्ञका आरम्भ करते समय यजमान जो संकल्पके साथ उसके अनुष्ठानसम्बन्धी नियमोंके पालनका व्रत लेता है, उसका नाम 'दीक्षा' है।

† यज्ञ और क्रतु—ये यज्ञके ही दो भेद हैं। जिन यज्ञोंमें यूष बनानेकी विधि है, उन्हें 'क्रतु' कहते हैं।

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ मुण्डक २ ]

अनेक प्रकारके अन्न भी उन्हींसे उत्पन्न हुए हैं। उन्हींसे तप, श्रद्धा, सत्य और ब्रह्मचर्य प्रकट हुए हैं तथा यज्ञादि कर्म करनेकी विधि भी उन परमेश्वरसे ही प्रकट हुई है। तात्पर्य यह कि सब कुछ उन्हींसे उत्पन्न हुआ है। वे ही सबके परम कारण हैं ॥७॥

सप्त प्राणाः प्रभवन्ति तस्मात् सप्तर्चिषः समिधः सप्त होमाः । सप्त इमे लोका येषु चरन्ति प्राणा गुहाशया निहिताः सप्त सप्त ॥८॥

तस्मात्=उसी परमेश्वरसे; सप्त=सात; प्राणाः=प्राण; प्रभवन्ति=उत्पन्न होते हैं (तथा); सप्त अर्चिषः=अग्निकी (काली-कराली आदि) सात लपटें; [सप्त] समिधः=सात (विषयरूपी) समिधाएँ; सप्त= सात प्रकारके; होमाः=हवन (तथा); इमे सप्त लोकाः=ये सात लोक—इन्द्रियोंके सात द्वार (उसीसे उत्पन्न होते हैं); येषु=जिनमें; प्राणाः=प्राण; चरन्ति=विचरते हैं; गुहाशयाः=हृदयरूप गुफामें शयन करनेवाले ये; सप्त सप्त=सात-सातके समुदाय; निहिताः=(उसीके द्वारा) सब प्राणियोंमें स्थापित किये हुए हैं ॥८॥

व्याख्या—उन्हीं परमेश्वरसे सात प्राण अर्थात् जिनमें विषयोंको प्रकाशित करनेकी विशेष शक्ति है, ऐसी सात इन्द्रियाँ—कान, त्वचा, नेत्र, रसना और प्राण तथा वाणी एवं मन*; तथा मनसहित इन्द्रियोंकी सुनना, स्पर्श करना, देखना, स्वाद लेना, सृष्टिना, बोलना और मनन करना, इस प्रकार सात वृत्तियाँ अर्थात् विषय ग्रहण करनेवाली शक्तियाँ; उन इन्द्रियोंके विषयरूप सात समिधाएँ; सात प्रकारका हवन अर्थात् बाह्यविषयरूप समिधाओंका इन्द्रियरूप

  • ब्रह्मसूत्रमें इस विषयपर विचार किया गया है कि यहाँ इन्द्रियाँ सात ही क्यों बतलाई गयी हैं, वहाँ कहा गया है कि इन सातके अतिरिक्त हाथ, पैर, उपस्थ तथा गुदा भी इन्द्रियाँ हैं, अतः मनसहित कुल ग्यारह इन्द्रियाँ हैं, यहाँ प्रधानतासे सातका वर्णन है (ब्रह्मसूत्र २।४।२,६)।

खण्ड १ ]

मुण्डकोपनिषद्

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अग्नियोंमें निक्षेपरूप क्रिया और इन इन्द्रियोंके वासस्थानरूप सात लोक, जिनमें रहकर ये इन्द्रियरूप सात प्राण अपना-अपना कार्य करते हैं—निद्राके समय मनके साथ एक होकर हृदयरूप गुफामें शयन करनेवाले ये सात-सातके समुदाय परमेश्वरके द्वारा ही समस्त प्राणियोंमें स्थापित किये हुए हैं ॥८॥

सम्बन्ध —इस प्रकार आध्यात्मिक वस्तुओंकी उत्पत्ति और स्थिति परमेश्वरसे बतलाकर अब बाह्य जगत्की उत्पत्ति भी उसीसे बताते हुए प्रकरणका उपसंहार करते हैं—

अतः समुद्रा गिरयश्च सर्वे- उस्मात्स्यन्दन्ते सिन्धवः सर्वरूपाः । अतश्च सर्वा ओषधयो रसश्च येनैष भूतैस्तिष्ठते ह्यन्तरात्मा ॥ ९ ॥

अतः=इसीसे; सर्वे=समस्त; समुद्राः=समुद्र; च=और; गिरयः=पर्वत (उत्पन्न हुए हैं); अस्मात्=इसीसे (प्रकट होकर); सर्वरूपाः=अनेक रूपोंवाली; सिन्धवः=नदियाँ; स्यन्दन्ते=बहती हैं; च=तथा; अतः=इसीसे; सर्वाः=सम्पूर्ण; ओषधयः=ओषधियाँ; च=और; रसः=रस (उत्पन्न हुए हैं); येन=जिस रससे (पुष्ट हुए शरीरोंमें); हि=ही; एषः=यह; अन्तरात्मा=(सबका) अन्तरात्मा (परमेश्वर); भूतैः=सब प्राणियों (की आत्मा)-के सहित; तिष्ठते=(उन-उनके हृदयमें) स्थित है ॥९॥

व्याख्या —इन्हीं परमेश्वरसे समस्त समुद्र और पर्वत उत्पन्न हुए हैं, इन्हींसे निकलकर अनेक आकारवाली नदियाँ बह रही हैं, इन्हींसे समस्त ओषधियाँ और वह रस भी उत्पन्न हुआ है, जिससे पुष्ट हुए शरीरोंमें वे सबके अन्तरात्मा परमेश्वर उन सब प्राणियोंकी आत्माके सहित उन-उनके हृदयमें रहते हैं ॥९॥

सम्बन्ध —उन परमेश्वरसे सबकी उत्पत्ति होनेके कारण सब उन्हींका स्वरूप है, यह कहकर उनको जाननेका फल बताते हुए इस खण्डकी समाप्ति करते हैं—

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ मुण्डक २ ]

पुरुष एवेदं विश्वं कर्म तपो ब्रह्म परामृतम् । एतद्यो वेद निहितं गुहायां सोऽविद्याग्रन्थिं विकिरतीह सोम्य ॥ १० ॥

तपः=तपः; कर्म=कर्म; (और) परामृतम्=परम अमृतरूपः; ब्रह्म=ब्रह्म; इदम्=यह; विश्वम्=सब कुछ; पुरुषः एव=परमपुरुष पुरुषोत्तम ही है; सोम्य=हे प्रिय!; एतत्=इस; गुहायाम्=हृदयरूप गुफामें; निहितम्=स्थित अन्तर््यामी परमपुरुषको; यः=जो; वेद=जानता है; सः=वह; इह [ एव ]=यहाँ (इस मनुष्यशरीरमें) ही; अविद्याग्रन्थिम्=अविद्याजनित गॉठको; विकिरति=खोल डालता है ॥ १० ॥

व्याख्या—तप अर्थात् संयमरूप साधन, कर्म अर्थात् बाह्य साधनोंद्वारा किये जानेवाले कृत्य तथा परम अमृत ब्रह्म—यह सब कुछ परमपुरुष पुरुषोत्तम ही है। प्रिय शौनक! हृदयरूप गुफामें छिपे हुए इन अन्तर््यामी परमेश्वरको जो जान लेता है, वह इस मनुष्यशरीरमें ही अविद्याजनित अन्तःकरणकी गॉठका भेदन कर देता है अर्थात् सब प्रकारके संशय और भ्रमसे रहित होकर परब्रह्म पुरुषोत्तमको प्राप्त हो जाता है ॥ १० ॥

॥ प्रथम खण्ड समाप्त ॥ १ ॥

द्वितीय खण्ड

आविः संनिहितं गुहाचरं नाम महत्यदमत्रैतत्समर्पितम् । एजत्प्राणत्रिमिषच्च यदेतन्जानथ सदसद्वरेण्यं परं विज्ञानाद्यद्वृष्टिं प्रजानाम् ॥ १ ॥*

आविः=(जो) प्रकाशस्वरूपः; संनिहितम्=अत्यन्त समीपस्थ; गुहाचरम् नाम=(हृदयरूप गुहामें स्थित होनेके कारण) गुहाचरनामसे प्रसिद्ध; महत् पदम्=(और) महान् पद (परम प्राप्य) है; यत्=जितने भी; एजत्=चेष्टा करनेवाले;

  • इस मन्त्रसे मिलता हुआ मन्त्र अथर्व० का० १०।८।६ है।

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मुण्डकोपनिषद्

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प्राणत्=श्वस लेनेवाले; च=और; निमिषत्=आँखोंको खोलने-मूँदनेवाले (प्राणी हैं); एतत्=ये (सब-के-सब); अत्र=इसीमें; समर्पितम्=समर्पित (प्रतिष्ठित) हैं; एतत्=इस परमेश्वरको; जानथ=तुमलोग जानो; यत्=जो; सत्=सत्; असत्=(और) असत् है; वरेण्यम्=सबके द्वारा वरण करनेयोग्य (और); वरिष्ठम्=अतिशय श्रेष्ठ है (तथा); प्रजानाम्=समस्त प्राणियोंकी; विज्ञानात्=बुद्धिसे; परम्=परे अर्थात् जाननेमें न आनेवाला है ॥ १ ॥

व्याख्या —सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञ और सर्वव्यापी परमेश्वर प्रकाशस्वरूप हैं। समस्त प्राणियोंके अत्यन्त समीप उन्हींके हृदयरूप गुहामें छिपे रहनेके कारण ही ये गुहाचरनामसे प्रसिद्ध हैं। जितने भी हिलने-चलनेवाले, श्वस लेनेवाले और आँख खोलने-मूँदनेवाले प्राणी हैं, उन सबका समुदाय इन्हीं परमेश्वरमें समर्पित अर्थात् स्थित है। सबके आश्रय ये परमात्मा ही हैं। तुम इनको जानो। ये सत् और असत् अर्थात् कार्य और कारण एवं प्रकट और अप्रकट—सब कुछ हैं। सबके द्वारा वरण करनेयोग्य और अत्यन्त श्रेष्ठ हैं तथा समस्त प्राणियोंकी बुद्धिसे परे अर्थात् बुद्धिद्वारा अज्ञेय हैं ॥ १ ॥

सम्बन्ध —उन्हीं परब्रह्म परमेश्वरका तत्त्व समझानेके लिये पुनः उनके स्वरूपका दूसरे शब्दोंमें वर्णन करते हैं—

यदधिमद्यदणुभ्योऽणु च यस्मिँल्लोका निहिता लोकिनश्च। तदेतदक्षरं ब्रह्म स प्राणस्तदु वाङ्मनः। तदेतत्सत्यं तदमृतं तद्वेद्व्यं सोम्यं विद्धि ॥ २ ॥

यत्=जो; अधिमत=दीसिमान् है; च=और; यत्=जो; अणुभ्यः=सूक्ष्मोंसे भी; अणु-सूक्ष्म है; यस्मिन्=जिसमें; लोकाः=समस्त लोक; च=और; लोकिनः=उन लोकोंमें रहनेवाले प्राणी; निहिताः=स्थित हैं; तत्=वही; एतत्=यह; अक्षरम्=अविनाशी; ब्रह्म=ब्रह्म है; सः=वही; प्राणः=प्राण है; तत् उ=वही; वाक्=वाणी; मनः=(और) मन है; तत्=वही; एतत्=यह; सत्यम्=सत्य है; तत्=वह; अमृतम्=अमृत है; सोम्य=हे प्यारे!; तत्=उस; वेद्व्यम्=वेधनेयोग्य लक्ष्यको; विद्धि=तू वेध ॥ २ ॥

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ मुण्डक २ ]

व्याख्या —जो परब्रह्म परमेश्वर अतिशय देदीप्यमान प्रकाशस्वरूप हैं, जो सूक्ष्मोंसे भी अतिशय सूक्ष्म हैं, जिनमें समस्त लोक और उन लोकोंमें रहनेवाले समस्त प्राणी स्थित हैं अर्थात् ये सब जिनके आश्रित हैं, वे ही परम अक्षर ब्रह्म हैं, वे ही सबके जीवनदाता प्राण हैं, वे ही सबकी वाणी और मन अर्थात् समस्त जगत्के इन्द्रिय और अन्तःकरणरूपमें प्रकट हैं। वे ही परम सत्य और अमृत—अविनाशी तत्त्व हैं। प्रिय शौनक! उस वैधनेयोग्य लक्ष्यको तू वैध अर्थात् आगे बताये जानेवाले प्रकारसे साधन करके उसमें तन्मय हो जा॥ २ ॥

सम्बन्ध —लक्ष्यको वैधनेके लिये धनुष और बाण चाहिये; अतः इस रूपककी पूर्णताके लिये सारी सामग्रीका वर्णन करते हैं—

धनुर्गृहीत्वौपनिषदंमहास्त्रं
शरंह्युपासानिशितं
संधयीत।
आयम्य तद्भावगतेन
चेतसा
लक्ष्यंतदेवाक्षरं
सोम्यविद्धि ॥ ३ ॥

औपनिषदम्=उपनिषद्में वर्णित प्रणवरूप; महास्त्रम्=महान् अस्त्र; धनुः=धनुषको; गृहीत्वा=लेकर (उसपर); हि=निश्चय ही; उपासानिशितम्=उपासनाद्वारा तीक्ष्ण किया हुआ; शरम्=बाण; संधयीत=चढ़ाये; भावगतेन= (फिर) भावपूर्ण; चेतसा=चित्तके द्वारा; तत्=उस बाणको; आयम्य=खींचकर; सोम्य=हे प्रिय !; तत्=उस; अक्षरम्=परम अक्षर पुरुषोत्तमको; एव=ही; लक्ष्यम्=लक्ष्य मानकर; विद्धि=वैधे ॥ ३ ॥

व्याख्या —जिस प्रकार किसी बाणको लक्ष्यपर छोड़नेसे पहले उसकी नोकको सानपर धरकर तेज किया जाता है, उसपर चढ़े हुए मोरचे आदिको दूर करके उसे उज्ज्वल एवं चमकीला बनाया जाता है, उसी प्रकार आत्मारूपी बाणको उपासनाद्वारा निर्मल एवं शुद्ध बनाकर उसको प्रणवरूप धनुषपर भलीभाँति चढ़ाना चाहिये। अर्थात् आत्माको प्रणवके उच्चारण एवं उसके अर्थरूप परमात्माके चिन्तनमें सम्यक् प्रकारसे लगाना चाहिये। इसके अनन्तर जैसे धनुषको पूरी शक्तिसे खींचकर बाणको लक्ष्यपर छोड़ा जाता है, जिससे

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वह पूरी तरहसे लक्ष्यको वेध सके, उसी प्रकार यहाँ भावपूर्ण चित्तसे ओंकारका अधिक-से-अधिक लम्बा उच्चारण एवं उसके अर्थका प्रगाढ़ एवं सुदीर्घ कालतक चिन्तन करनेके लिये कहा गया है, जिससे आत्मा निश्चितरूपसे अविनाशी परमात्मामें प्रवेश कर जाय, उसमें तन्मय होकर अविचल स्थिति प्राप्त कर ले। भाव यह है कि ओंकारका प्रेमपूर्वक उच्चारण एवं उसके अर्थरूप परमात्माका प्रगाढ़ चिन्तन ही उनकी प्राप्तिका सर्वोत्तम उपाय है॥ ३ ॥

सम्बन्ध— पूर्वमन्त्रमें कहे हुए रूपकको यहाँ स्पष्ट करते हैं—

प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते।

अप्रमत्तेन वेद्वद्व्यं शरवत्तन्मयो भवेत्॥ ४ ॥

प्रणवः =(यहाँ) ओंकार ही; धनुः =धनुष है; आत्मा =आत्मा; हि =ही; शरः =बाण है (और); ब्रह्म =परब्रह्म परमेश्वर ही; तल्लक्ष्यम् =उसका लक्ष्य; उच्यते =कहा जाता है; अप्रमत्तेन =(वह) प्रमादरहित मनुष्यद्वारा ही; वेद्वद्व्यम् =बीधा जानेयोग्य है (अतः); शरवत् =(उसे बेधकर) बाणकी तरह; तन्मयः =(उस लक्ष्यमें) तन्मय; भवेत् =हो जाना चाहिये॥ ४ ॥

व्याख्या— ऊपर बतलाये हुए रूपकमें परमेश्वरका वाचक प्रणव (ओंकार) ही मानो धनुष है, यह जीवात्मा ही बाण है और परब्रह्म परमेश्वर ही उसके लक्ष्य हैं। तत्परतासे उनकी उपासना करनेवाले प्रमादरहित साधकद्वारा ही वह लक्ष्य बेधा जा सकता है; इसलिये हे सोम्य! तुझे पूर्वोक्तरूपसे उस लक्ष्यको बेधकर बाणकी ही भाँति उसमें तन्मय हो जाना चाहिये॥ ४ ॥

सम्बन्ध— पुनः परमेश्वरके स्वरूपका वर्णन करते हुए प्रमादरहित और विरक्त होकर उसे जाननेके लिये श्रुति कहती है—

यस्मिन् द्यौः पृथिवी चान्तरिक्ष-

मोतं मनः सह प्राणेश्व सर्वैः।

तमेवैकं जानथ आत्मानमन्या

वाचो विमुञ्चथामृतस्यैष सेतुः॥ ५ ॥

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ मुण्डक २ ]

यस्मिन्=जिसमें; द्यौः=स्वर्ग; पृथिवी=पृथिवी; च=और; अन्तरिक्षम्=और उनके बीचका आकाश; च=तथा; सर्वैः प्राणैः सह=समस्त प्राणोंके सहित; मनः=मन; ओतम्=गुँथा हुआ है; तम् एव=उसी; एकम्=एक; आत्मानम्=सबके आत्मरूप परमेश्वरको; जानथ=जानो; अन्याः=दूसरी; वाचः=सब बातोंको; विमुञ्चथ=सर्वथा छोड़ दो; एषः=यही; अमृतस्य=अमृतका; सेतुः=सेतु है ॥५॥

व्याख्या —जिन परब्रह्म परमात्मामें स्वर्ग, पृथ्वी तथा उनके बीचका सम्पूर्ण आकाश एवं समस्त प्राण और इन्द्रियोंके सहित मन-बुद्धिरूप अन्तःकरण सबके-सब ओत-प्रोत हैं; उन्हीं एक सर्वात्मा परमेश्वरको तुम पूर्वोक्त उपायके द्वारा जानो; दूसरी सब बातोंको—ग्राम्यचर्चाको सर्वथा छोड़ दो। वे सब तुम्हारे साधनमें विघ्न हैं; अतः उनसे सर्वथा विरक्त होकर साधनमें तत्पर हो जाओ। यही अमृतका सेतु है, अर्थात् संसार-समुद्रसे पार होकर अमृतस्वरूप परमात्माको प्राप्त करनेके लिये पुलके सदृश है ॥५॥

सम्बन्ध —पुनः परमेश्वरके स्वरूपका वर्णन करते हुए उनकी प्रासिका साधन बताते हैं—

अरा इव रथनाभौ संहता यत्र नाड्यः

स एषोऽन्तश्चरते बहुधा जायमानः।

ओमित्येवं ध्यायथ आत्मानं

स्वस्ति वः पाराय तमसः परस्तात् ॥६॥

रथनाभौ=रथकी नाभिमें (जुड़े हुए); अराः इव=अरोंकी भाँति; यत्र=जिसमें; नाड्यः=समस्त देहव्यापिनी नाड़ियाँ; संहताः=एकत्र स्थित हैं; (उसी हृदयमें) सः=वह; बहुधा=बहुत प्रकारसे; जायमानः=उत्पन्न होनेवाला; एषः=यह (अन्तर्यामी परमेश्वर); अन्तः=मध्यभागमें; चरते=रहता है; [ एनम् ]=इस; आत्मानम्=सर्वात्मा परमात्माका; ओम्=ओम्; इति एवम्=इस नामके द्वारा ही; ध्यायथ=ध्यान करो; तमसः परस्तात्=अज्ञानमय अन्धकारसे अतीत; पाराय=(तथा) भवसागरसे अन्तिम तटरूप पुरुषोत्तमकी प्राप्तिके लिये (साधन करनेमें); वः=तुमलोगोंका; स्वस्ति=कल्याण हो ॥६॥

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व्याख्या—‘जिस प्रकार रथके पहियेके केन्द्रमें अरे लगे रहते हैं, उसी प्रकार शरीरकी समस्त नाड़ियाँ जिस हृदयदेशमें एकत्र स्थित हैं, उसी हृदयमें नाना रूपसे प्रकट होनेवाले परब्रह्म परमात्मा अन्तर्धामीरूपसे रहते हैं। इन सबके आत्मा पुरुषोत्तमका ‘ओम्’ इस नामके उच्चारणके साथ-साथ निरन्तर ध्यान करते रहो। इस प्रकार परमात्माके ‘ओम्’ इस नामका जप और उसके अर्थभूत परमात्माका ध्यान करते रहनेसे तुम उन परमात्माको प्राप्त करनेमें समर्थ हो जाओगे, जो अज्ञानरूप अन्धकारसे सर्वथा अतीत और संसार-समुद्रके दूसरे पार हैं। तुम्हारा कल्याण हो।’ इस प्रकार आचार्य उपर्युक्त विधिसे साधन करनेवाले शिष्योंको आशीर्वाद देते हैं ॥ ६ ॥

सम्बन्ध—पुनः परमेश्वरके स्वरूपका ही वर्णन करते हैं—

यः सर्वज्ञः सर्वविद् यस्यैष महिमा भुवि। दिव्ये ब्रह्मपुरे होष व्योम्नात्मा प्रतिष्ठितः ॥

मनोमयः प्राणशरीरनेता प्रतिष्ठितोऽत्रे हृदयं संनिधाय। तद्विज्ञानेन परिपश्यन्ति धीरा आनन्दरूपममृतं यद् विभाति ॥ ७ ॥

यः सर्वज्ञः=जो सर्वदा जाननेवाला (और); सर्वविद्=सब ओरसे सबको जाननेवाला है; यस्य=जिसकी; भुवि=जगत्में; एषः=यह; महिमा=महिमा है; एषः हि आत्मा=यह प्रसिद्ध सबका आत्मा परमेश्वर; दिव्ये व्योम्नि=दिव्य आकाशरूप; ब्रह्मपुरे=ब्रह्मलोकमें; प्रतिष्ठितः=स्वरूपसे स्थित है; प्राणशरीरनेता=सबके प्राण और शरीरका नेता; मनोमयः=(यह परमात्मा मनमें व्याप्त होनेके कारण) मनोमय है; हृदयं संनिधाय=(यही) हृदय-कमलका आश्रय लेकर; अत्रे=अन्नमय स्थूल शरीरमें; प्रतिष्ठितः=प्रतिष्ठित है; यत्=जो; आनन्दरूपम्=आनन्दस्वरूप; अमृतम्=अविनाशी परब्रह्म; विभाति=सर्वत्र प्रकाशित है; धीराः=बुद्धिमान् मनुष्य; विज्ञानेन=विज्ञानके द्वारा; तत्=उसको; परिपश्यन्ति=भलीभाँति प्रत्यक्ष कर लेते हैं ॥ ७ ॥

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ मुण्डक २ ]

व्याख्या —जो परब्रह्म परमेश्वर सर्वज्ञ—सर्वदा जाननेवाले और सब ओरसे सबको भलीभाँति जाननेवाले हैं, अर्थात् जिनकी ज्ञानशक्ति देश-कालसे बाधित नहीं है, जिनकी यह आश्चर्यमयी महिमा जगत्में प्रकट है, वे सबके आत्मा परमेश्वर परम व्योम नामसे प्रसिद्ध दिव्य आकाशरूप ब्रह्मलोकमें स्वरूपसे स्थित हैं। सम्पूर्ण प्राणियोंके प्राण और शरीरका नियमन करनेवाले ये परमेश्वर मनमें व्याप्त होनेके कारण मनोमय कहलाते हैं और सब प्राणियोंके हृदयकमलका आश्रय लेकर अन्नमय स्थूलशरीरमें प्रतिष्ठित हैं। बुद्धिमान् मनुष्य विज्ञानद्वारा उन परब्रह्मको भलीभाँति प्रत्यक्ष कर लेते हैं जो आनन्दमय अविनाशीरूपसे सर्वत्र प्रकाशित हैं ॥ ७ ॥

सम्बन्ध —अब परमात्माके ज्ञानका फल बताते हैं—

भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे ॥ ८ ॥

तस्मिन् परावरे दृष्टे=कार्य-कारणस्वरूप उस परात्पर पुरुषोत्तमको तत्त्वसे जान लेनेपर; अस्य हृदयग्रन्थिः=इस (जीवात्मा) के हृदयकी गाँठ; भिद्यते=खुल जाती है; सर्वसंशयाः=सम्पूर्ण संशय; छिद्यन्ते=कट जाते हैं; च=और; कर्माणि=समस्त शुभाशुभ कर्म; क्षीयन्ते=नष्ट हो जाते हैं ॥ ८ ॥

व्याख्या —कार्य और कारणस्वरूप उन परात्पर परब्रह्म पुरुषोत्तमको तत्त्वसे जान लेनेपर इस जीवके हृदयकी अवधारूप वह गाँठ खुल जाती है, जिसके कारण इसने इस जड़ शरीरको ही अपना स्वरूप मान रखा है; इतना ही नहीं; इसके समस्त संशय सर्वथा कट जाते हैं और समस्त शुभाशुभ कर्म नष्ट हो जाते हैं। अर्थात् यह जीव सब बन्धनोंसे सर्वथा मुक्त होकर परमानन्दस्वरूप परमेश्वरको प्राप्त हो जाता है ॥ ८ ॥

सम्बन्ध —उन परब्रह्मके स्थान, स्वरूप और उनकी महिमाका वर्णन करते हैं—

हिरण्मये परे कोशे विरजं ब्रह्म निष्कलम् । तच्छुभ्रं ज्योतिषां ज्योतिस्तद्यदात्मविदो विदुः ॥ ९ ॥

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तत्=वह; विरजम्=निर्मल; निष्कलम्=अवयवरहित; ब्रह्म=परब्रह्म; हिरण्मये परे कोशे=प्रकाशमय परम कोशमें—परमधाममें (विराजमान है); तत्=वह; शुभ्रम्=सर्वथा विशुद्ध; ज्योतिषाम्=समस्त ज्योतियोंकी भी; ज्योतिः=ज्योति है; यत्=जिसको; आत्मविदः=आत्मज्ञानी; विदुः=जानते हैं ॥ ९ ॥

व्याख्या —वे निर्मल—निर्विकार और अवयवरहित—अखण्ड परमात्मा प्रकाशमय परमधाममें विराजमान हैं; वे सर्वथा विशुद्ध और समस्त प्रकाशयुक्त पदार्थोंके भी प्रकाशक हैं तथा उन्हें आत्मज्ञानी महात्माजन ही जानते हैं ॥ ९ ॥

न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः। तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥ १० ॥*

तत्र=वहाँ; न=न (तो); सूर्यः=सूर्य; भाति=प्रकाशित होता है; न=न; चन्द्रतारकम्=चन्द्रमा और तारागण ही; न=(तथा) न; इमाः=ये; विद्युतः=बिजलियाँ ही; भान्ति=(वहाँ) चमकती हैं; अयम् अग्निः कुतः=फिर इस अग्निके लिये तो कहना ही क्या है; तम् भान्तम् एव=(क्योंकि) उसके प्रकाशित होनेपर ही; सर्वम्=सब; अनुभाति=उसके पीछे उसीके प्रकाशसे प्रकाशित होते हैं; तस्य=उसीके; भासा=प्रकाशसे; इदम् सर्वम्=यह सम्पूर्ण जगत्; विभाति=प्रकाशित होता है ॥ १० ॥

व्याख्या —उन स्वप्रकाश परमानन्दस्वरूप परब्रह्म परमेश्वरके समीप यह सूर्य नहीं प्रकाशित होता। जिस प्रकार सूर्यका प्रकाश प्रकट होनेपर खद्योतका प्रकाश लुप्त हो जाता है, वैसे ही सूर्यका तेज भी उस असीम तेजके सामने लुप्त हो जाता है। चन्द्रमा, तारागण और बिजली भी वहाँ नहीं चमकते; फिर इस लौकिक अग्निकी तो बात ही क्या है। क्योंकि प्राकृत जगत्में जो कुछ

  • यह मन्त्र कठोपनिषद् (२।२।१५) में और श्वेता० उ० (६।१४) में भी है।

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ मुण्डक २ ]

भी तत्त्व प्रकाशशील हैं, सब उन परब्रह्म परमेश्वरकी प्रकाश-शक्तिके अंशको पाकर ही प्रकाशित हैं। वे अपने प्रकाशके समीप अपना प्रकाश कैसे फैला सकते हैं? सारांश यह कि यह सम्पूर्ण जगत् उन जगदात्मा पुरुषोत्तमके प्रकाशसे अथवा उस प्रकाशके एक शुद्धतम अंशसे प्रकाशित हो रहा है ॥ १० ॥

ब्रह्मैवेदममृतं पुरस्ताद्ब्रह्म पश्चाद्ब्रह्म दक्षिणतश्चोत्तरेण ।

अधश्चोर्ध्वं च प्रसृतं ब्रह्मैवेदं विश्वमिदं वरिष्ठम् ॥ ११ ॥

इदम्=यह; अमृतम्=अमृतस्वरूप; ब्रह्म=परब्रह्म; एव=ही; पुरस्तात्=सामने हैं; ब्रह्म=ब्रह्म ही; पश्चात्=पीछे हैं; ब्रह्म=ब्रह्म ही; दक्षिणतः=दायीं ओर; च=तथा; उत्तरेण=बार्यी ओर; अधः=नीचेकी ओर; च=तथा; ऊर्ध्वम्=ऊपरकी ओर; च=भी; प्रसृतम्=फैला हुआ है; इदम् [ यत् ]=यह जो; विश्वम्=सम्पूर्ण जगत् है; इदम्=यह; वरिष्ठम्=सर्वश्रेष्ठ; ब्रह्म एव=ब्रह्म ही है ॥ ११ ॥

व्याख्या —इस मन्त्रमें परमात्माकी सर्वव्यापकता और सर्वरूपताका प्रतिपादन किया गया है। सारांश यह कि ये अमृतस्वरूप परब्रह्म परमात्मा ही आगे-पीछे, दायें-बायें, बाहर-भीतर, ऊपर-नीचे—सर्वत्र फैले हुए हैं; इस विश्वब्रह्माण्डके रूपमें ये सर्वश्रेष्ठ ब्रह्म ही प्रत्यक्ष दिखायी दे रहे हैं ॥ ११ ॥

॥ द्वितीय खण्ड समाप्त ॥ २ ॥

॥ द्वितीय मुण्डक समाप्त ॥ २ ॥

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तृतीय मुण्डक

प्रथम खण्ड

द्व्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते । तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वन्त्य- नश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ॥ १ ॥ *

सयुजा=एक साथ रहनेवाले (तथा); सखाया=परस्पर सखाभाव रखनेवाले; द्व्वा=दो; सुपर्णा=पक्षी (जीवात्मा और परमात्मा); समानम् वृक्षम् परिषस्वजाते=एक ही वृक्ष (शरीर)-का आश्रय लेकर रहते हैं; तयोः=उन दोनोंमेंसे; अन्यः=एक तो; पिप्पलम्=उस वृक्षके सुख-दुःखरूप कर्मफलोंका; स्वादु=स्वाद ले-लेकर; अन्ति=उपभोग करता है (किंतु); अन्यः=दूसरा; अनश्नन्=न खाता हुआ; अभिचाकशीति=केवल देखता रहता है ॥ १ ॥

व्याख्या—जिस प्रकार गीतामें जगत्का अश्रुस्थ (पीपल) वृक्षके रूपमें वर्णन किया गया है, उसी प्रकार इस मन्त्रमें शरीरको पीपलके वृक्षका और जीवात्मा तथा परमात्माको पक्षियोंका रूप देकर वर्णन किया गया है। इसी तरहका वर्णन कठोपनिषद्में भी गुहामें प्रविष्ट छाया और धूपके नामसे आया है। भाव दोनों जगह प्रायः एक ही है। मन्त्रका सारांश यह है कि यह मनुष्यशरीर मानो एक वृक्ष है। ईश्वर और जीव—ये सदा साथ रहनेवाले दो मित्र पक्षी हैं। ये इस शरीररूपवृक्षमें एक साथ ही हृदयरूप घोंसलेमें निवास करते हैं। इन दोनोंमें एक—जीवात्मा तो उस वृक्षके फलरूप अपने कर्मफलोंको अर्थात् प्रारब्धानुसार प्राप्त हुए सुख-दुःखोंको आसक्ति एवं द्वेषपूर्वक भोगता है और दूसरा—ईश्वर उन कर्मफलोंसे किसी प्रकारका किञ्चित् भी सम्बन्ध न जोड़कर केवल देखता रहता है ॥ १ ॥

  • ऋग् ० १।१६४।२०, अथर्व० ९।१४।२० में भी यह मन्त्र इसी रूपमें आया है।

२६६

ईशादि नौ उपनिषद्

[ मुण्डक ३ ]

समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नो- उनीशया शोचति मुह्यमानः । जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीश- मस्य महिमानमिति वीतशोकः ॥ २ ॥*

समाने वृक्षे=पूर्वोक्त शरीररूपी समान वृक्षपर (रहनेवाला); पुरुषः=जीवात्मा; निमग्नः=(शरीरकी गहरी आसक्तिमें) डूबा हुआ है; अनीशया=असमर्थतारूप दीनताका अनुभव करता हुआ; मुह्यमानः=मोहित होकर; शोचति=शोक करता रहता है; यदा=जब कभी (भगवान्की अहैतुकी दयासे); जुष्टम्=(भक्तोंद्वारा नित्य) सेवित; अन्यम्=अपनेसे भिन्न; ईशम्=परमेश्वरको (और); अस्य महिमानम्=उनकी महिमाको; पश्यति=यह प्रत्यक्ष कर लेता है; इति=तब; वीतशोकः=सर्वथा शोकरहित हो जाता है ॥ २ ॥

व्याख्या—पहले वर्णन किये हुए शरीररूप एक ही वृक्षपर हृदयरूप घोंसलेमें रहनेवाला यह जीवात्मा जबतक अपने साथ रहनेवाले उन परम सुहृद परमेश्वरकी ओर नहीं देखता, शरीरमें ही आसक्त होकर इसीमें निमग्न हुआ रहता है अर्थात् शरीरमें अतिशय ममता करके उसके द्वारा भोगोंके भोगनेमें ही रचा-पचा रहता है तबतक असमर्थतारूप दीनतासे मोहित होकर वह नाना प्रकारके दुःख भोगता रहता है। जब कभी भगवान्की निहैतुकी दयासे अपनेसे भिन्न, नित्य अपने ही समीप रहनेवाले, परम सुहृद, परमप्रिय और भक्तोंद्वारा सेवित ईश्वरको और उनकी आश्चर्यमयी महिमाको, जो जगत्में सर्वत्र भिन्न-भिन्न प्रकारसे प्रकट हो रही है, प्रत्यक्ष कर लेता है, तब वह तत्काल ही सर्वथा शोकरहित हो जाता है ॥ २ ॥

सम्बन्ध—ईश्वरके स्वरूपका वर्णन करते हुए उन्हें जान लेनेका फल बताते हैं—

यदा पश्यः पश्यते रुक्मवर्णं कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम् ।

  • ये दोनों मन्त्र श्वेता० उ० ४।६,७ में भी इसी रूपमें आये हैं।

खण्ड १ ]

मुण्डकोपनिषद्

२६७

तदा विद्वान् पुण्यपापे विधूय निरञ्जनः परमं साम्यमुपैति ॥ ३ ॥

यदा=जब; पश्यः=यह द्रष्टा (जीवात्मा); ईशम्=सबके शासक; ब्रह्मयोनिम्=ब्रह्माके भी आदि कारण; कर्तारम्=सम्पूर्ण जगत्के रचयिता; रुक्मवर्णम्=दिव्य प्रकाशस्वरूप; पुरुषम्=परमपुरुषको; पश्यते=प्रत्यक्ष कर लेता है; तदा=उस समय; पुण्यपापे=पुण्य-पाप दोनोंको; विधूय=भलीभाँति हटाकर; निरञ्जनः=निर्मल हुआ; विद्वान्=वह ज्ञानी महात्मा; परमम्=सर्वोत्तम; साम्यम्=समताको; उपैति=प्राप्त कर लेता है ॥ ३ ॥

व्याख्या—पूर्वोक्त प्रकारसे परमेश्वरकी आश्चर्यमयी महिमाकी ओर दृष्टिपात करके उनके समुख जानेवाला द्रष्टा (जीवात्मा) जब सबके नियन्ता ब्रह्माके भी आदि कारण, सम्पूर्ण जगत्की रचना करनेवाले, दिव्य प्रकाशस्वरूप परमपुरुष परमेश्वरका साक्षात् कर लेता है, उस समय वह अपने समस्त पुण्य-पापरूप कर्मोंका समूल नाश करके उनसे सर्वथा सम्बन्धरहित होकर परम निर्मल हुआ ज्ञानी भक्त सर्वोत्तम समताको प्राप्त हो जाता है। गीताके बारहवें अध्यायमें श्लोक १३ से १९ तक इस समताका कई प्रकारसे वर्णन किया गया है ॥ ३ ॥

प्राणो ह्येष यः सर्वभूतैर्विभाति विजानन् विद्वान् भवते नातिवादी।

आत्मक्रीड आत्मरतिः क्रियावा- नेष ब्रह्मविदां वरिष्ठः ॥ ४ ॥

एषः=यह (परमेश्वर); हि=ही; प्राणः=प्राण है; यः=जो; सर्वभूतेः=सब प्राणियोंके द्वारा; विभाति=प्रकाशित हो रहा है; विजानन्=(इसको) जाननेवाला; विद्वान्=ज्ञानी; अतिवादी=अभिमानपूर्वक बढ-बढ़कर बातें करनेवाला; न भवते=नहीं होता (किंतु वह); क्रियावान्=यथार्थयोग्य भगवत्प्रीत्यर्थ कर्म करता हुआ; आत्मक्रीडः=सबके आत्मरूप अन्तर््यामी परमेश्वरमें क्रीडा करता रहता है (और); आत्मरतिः=सबके आत्मा अन्तर््यामी परमेश्वरमें ही रमण

२६८

ईशादि नौ उपनिषद्

[ मुण्डक ३ ]

करता रहता है; एषः=यह (ज्ञानी भक्त); ब्रह्मविदाम्=ब्रह्मवेताओंमें भी; वरिष्ठः=श्रेष्ठ हैं ॥४॥

व्याख्या —ये सर्वव्यापी परमेश्वर ही सबके प्राण हैं; जिस प्रकार शरीरकी सारी चैष्टाएँ प्राणके द्वारा होती हैं, उसी प्रकार इस विश्वमें भी जो कुछ हो रहा है, परमात्माकी शक्तिके ही हो रहा है। समस्त प्राणियोंमें भी उन्हींका प्रकाश है, वे ही उन प्राणियोंके द्वारा प्रकाशित हो रहे हैं। इस बातको समझनेवाला ज्ञानी भक्त कभी बढ़-बढ़कर बातें नहीं करता; क्योंकि वह जानता है कि उसके अंदर भी उन सर्वव्यापक परमात्माकी ही शक्ति अभिव्यक्त है; फिर वह किस बातपर अभिमान करे। वह तो लोकसंग्रहके लिये भगवदज्ञानुसार अपने वर्ण, आश्रमके अनुकूल कर्म करता हुआ सबके आत्मा अन्तर्यामी भगवान्में ही क्रीडा करता है। (गीता ६।३१) वह सदा भगवान्में ही रमण करता है। ऐसा यह भगवान्का ज्ञानी भक्त ब्रह्मवेताओंमें भी अति श्रेष्ठ है। गीतामें भी सबको वासुदेवरूप देखनेवाले ज्ञानी भक्तको महात्मा और सुदुर्लभ बताया गया है (७।१९) ॥४॥

सम्बन्ध —उन परमात्माकी प्राप्तिके साधन बताते हैं—

सत्येन लभ्यस्तपसा होष आत्मा सम्यग्ज्ञानेन ब्रह्मचर्येण नित्यम्। अन्तःशरीरे ज्योतिर्मयो हि शुभ्रो यं पश्यन्ति यतयः क्षीणदोषाः ॥५॥

एषः=यह; अन्तःशरीरे हि=शरीरके भीतर ही (हृदयमें विराजमान); ज्योतिर्मयः=प्रकाशस्वरूप (और); शुभ्रः=परम विशुद्ध; आत्मा=परमात्मा; हि=निस्संदेह; सत्येन=सत्य-भाषणसे; तपसा=तपसे (और); ब्रह्मचर्येण=ब्रह्मचर्यपूर्वक; सम्यग्ज्ञानेन=यथार्थ ज्ञानसे ही; नित्यम्=सदा; लभ्यः=प्राप्त होनेवाला है; यम्=जिसे; क्षीणदोषाः=सब प्रकारके दोषोंसे रहित हुए; यतयः=यत्नशील साधक ही; पश्यन्ति=देख पाते हैं ॥५॥

व्याख्या —सबके शरीरके भीतर हृदयमें विराजमान परम विशुद्ध प्रकाशमय

खण्ड १ ]

मुण्डकोपनिषद्

२६१

ज्ञानस्वरूप परब्रह्म परमात्मा, जिनको सब प्रकारके दोषोंसे रहित हुए प्रयत्नशील साधक ही जान सकते हैं, वे परमात्मा सदैव सत्य-भाषण, तपश्चर्या, संयम और स्वार्थत्याग तथा ब्रह्मचर्यके पालनसे उत्पन्न यथार्थ ज्ञानद्वारा ही प्राप्त हो सकते हैं। इनसे रहित होकर जो भोगोंमें आसक्त हैं; भोगोंकी प्राप्तिके लिये नाना प्रकारके मिथ्याभाषण करते हैं और आसक्तिवश नियमपूर्वक अपने वीर्यकी रक्षा नहीं कर सकते, वे स्वार्थपरायण अविवेकी मनुष्य उन परमात्माका अनुभव नहीं कर सकते; क्योंकि वे उनको चाहते ही नहीं ॥ ५ ॥

सम्बन्ध—पूर्वोक्त साधनोंमेंसे सत्यकी महिमा बताते हैं—

सत्यमेव | जयति | नानृतं | ---|---|---|--- सत्येन | पन्था | विततो | देवयानः । येनाक्रमन्तृषयो | | ह्यासकामा | यत्र तत् सत्यस्य परमं निधानम् ॥ ६ ॥

सत्यम्=सत्य; एव=ही; जयति=विजयी होता है; अनुतम्=झूठ; न=नहीं; हि=क्योंकि; देवयानः=वह देवयान नामक; पन्थाः=मार्ग; सत्येन=सत्यसे; विततः=परिपूर्ण है; येन=जिससे; आसकामाः=पूर्णकाम; तृषयः= तृषिलोग (वहों); आक्रमन्ति=गमन करते हैं; यत्र=जहाँ; तत्=वह; सत्यस्य=सत्यस्वरूप परब्रह्म परमात्माका; परमम्=उत्कृष्ट; निधानम्=धाम है ॥ ६ ॥

व्याख्या— सत्यकी ही विजय होती है, झूठकी नहीं। अभिप्राय यह है कि परमात्मा सत्यस्वरूप है; अतः उनकी प्राप्तिके लिये मनुष्यमें सत्यकी प्रतिष्ठा होनी चाहिये। परमात्मप्राप्तिके लिये तो सत्य अनिवार्य साधन है ही; जगत्में दूसरे सब कार्योंमें भी अन्ततः सत्यकी ही विजय होती है, झूठकी नहीं। जो लोग मिथ्या-भाषण, दम्भ और कपटसे उन्नतिकी आशा रखते हैं, वे अन्तमें बुरी तरहसे निराश होते हैं। मिथ्या-भाषण और मिथ्या-आचरणोंमें भी जो सत्यका आभास है, जिसके कारण दूसरे लोग उसे किसी अंशमें सत्य मान लेते हैं, उसीसे कुछ क्षणिक लाभ-सा हो जाता है। परंतु उसका परिणाम अच्छा

२७०

ईशादि नौ उपनिषद्

[ मुण्डक ३ ]

नहीं होता। अन्तमें सत्य सत्य ही रहता है और झूठ झूठ ही। इसीसे बुद्धिमान् मनुष्य सत्यभाषण और सदाचारको ही अपनाते हैं, झूठको नहीं; क्योंकि जिनकी भोग-वासना नष्ट हो गयी है, ऐसे पूर्णकाम ऋषिलोग जिस मार्गसे वहाँ पहुँचते हैं, जहाँ इस सत्यके परमाधार परब्रह्म परमात्मा स्थित हैं, वह देवयान-मार्ग अर्थात् उन परमदेव परमात्माको प्राप्त करनेका साधनरूप मार्ग सत्यसे ही परिपूर्ण है, उसमें असत्य-भाषण और दम्भ, कपट आदि असत् आचरणोंके लिये स्थान नहीं है ॥ ६ ॥

सम्बन्ध— उपर्युक्त साधनोंसे प्राप्त होनेवाले परमात्माके स्वरूपका पुनः वर्णन करते हैं—

बृहच्च तद् दिव्यमचिन्त्यरूपं सूक्ष्माच्च तत् सूक्ष्मतरं विभाति। दूरात् सुदूरे तदिहान्तिके च पश्यत्स्त्वैव निहितं गुहायाम् ॥ ७ ॥

तत्=वह परब्रह्म; बृहत्=महान्; दिव्यम्=दिव्य; च=और; अचिन्त्यरूपम्=अचिन्त्यस्वरूप है; च=तथा; तत्=वह; सूक्ष्मात्=सूक्ष्मसे भी; सूक्ष्मतरम्=अत्यन्त सूक्ष्मरूपमें; विभाति=प्रकाशित होता है; तत्=(तथा) वह; दूरात्=दूरसे भी; सुदूरे=अत्यन्त दूर है; [ च ]=और; इह=इस (शरीर) में रहकर; अन्तिके च=अति समीप भी है; इह=यहाँ; पश्यत्सु=देखनेवालोंके भीतर; एव=ही; गुहायाम्=उनके हृदयरूपी गुफामें; निहितम्=स्थित है ॥ ७ ॥

व्याख्या— वे परब्रह्म परमात्मा सबसे महान्, दिव्य—अलौकिक और अचिन्त्यस्वरूप हैं अर्थात् उनका स्वरूप मनके द्वारा चिन्तनमें आनेवाला नहीं है। अतः मनुष्यको श्रद्धापूर्वक परमात्माकी प्राप्तिके पूर्वकथित साधनोंमें लगे रहना चाहिये। वे परमात्मा अचिन्त्य एवं सूक्ष्मसे भी अत्यन्त सूक्ष्म होनेपर भी साधन करते-करते स्वयं अपने स्वरूपको साधकके हृदयमें प्रकाशित कर देते हैं। परमात्मा सर्वत्र परिपूर्ण हैं; ऐसा कोई भी स्थान नहीं, जहाँ वे न हों। अतः

खण्ड १ ]

मुण्डकोपनिषद्

२७१

वे दूसरे भी दूर हैं, अर्थात् जहाँतक हमलोग दूरका अनुभव करते हैं, वहाँ भी वे हैं और निकटसे भी निकट यहाँ अपने भीतर ही हैं। अधिक क्या, देखनेवालोंमें ही उनके हृदयरूप गुफामें छिपे हुए हैं। अतः उन्हें खोजनेके लिये कहीं दूसरी जगह जानेकी आवश्यकता नहीं है ॥७॥

न चक्षुषा गृह्णते नापि वाचा नान्यैर्देवैस्तपसा कर्मणा वा । ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्व- स्ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः ॥८॥

न चक्षुषा=(वह परमात्मा) न तो नेत्रोंसे; न वाचा=न वाणीसे (और); न अन्यैः=न दूसरी; देवैः=इन्द्रियोंसे; अपि=ही; गृह्णते=ग्रहण करनेमें आता है (तथा); तपसा=तपसे; वा=अथवा; कर्मणा=कर्मोंसे भी (वह); [ न गृह्णते ]=ग्रहण नहीं किया जा सकता; तम्=उस; निष्कलम्=अवयवरहित (परमात्मा) को; तु=तो; विशुद्धसत्त्वः=विशुद्ध अन्तःकरणवाला (साधक); ततः=उस विशुद्ध अन्तःकरणसे; ध्यायमानः=(निरन्तर उसका) ध्यान करता हुआ ही; ज्ञानप्रसादेन=ज्ञानकी निर्मलतासे; पश्यते=देख पाता है ॥८॥

व्याख्या —उन परब्रह्मको मनुष्य इन आँखोंसे नहीं देख सकता; इतना ही नहीं, वाणी आदि अन्य इन्द्रियोंद्वारा भी वे पकड़में नहीं आ सकते तथा नाना प्रकारकी तपश्चर्या और कर्मोंके द्वारा भी मनुष्य उन्हें नहीं पा सकता। उन अवयवरहित परम विशुद्ध परमात्माको तो मनुष्य सब भोगोंसे मुख मोड़कर, निःस्पृह होकर विशुद्ध अन्तःकरणके द्वारा निरन्तर एकमात्र उन्हींका ध्यान करते-करते ज्ञानकी निर्मलतासे ही देख सकता है। अतः जो उन परमात्माको पाना चाहे, उसे उचित है कि संसारके भोगोंसे सर्वथा विरक्त होकर उन सबकी कामनाका त्याग करके एकमात्र परब्रह्म परमात्माको ही पानेके लिये उन्हींके चिन्तनमें निमग्न हो जाय ॥८॥

सम्बन्ध —जब वे परब्रह्म परमात्मा सबके हृदयमें रहते हैं, तब सभी जीव उन्हें क्यों नहीं जानते? शुद्ध अन्तःकरणवाला पुरुष ही क्या जानता है? इस जिज्ञासापर कहते हैं—

२७२

ईशादि नौ उपनिषद्

[ मुण्डक ३ ]

एषोऽणुरात्मा चेतसा वेदितव्यो यस्मिन् प्राणः पञ्चधा संविवेश। प्राणैश्चित्तं सर्वमोतं प्रजानां यस्मिन् विशुद्धे विभवत्येष आत्मा ॥ १ ॥

यस्मिन्=जिसमें; पञ्चधा=पाँच भेदोंवाला; प्राणः=प्राण; संविवेश=भलीभाँति प्रविष्ट है (उसी शरीरमें रहनेवाला); एषः=यह; अणुः=सूक्ष्म; आत्मा=आत्मा; चेतसा=मनसे; वेदितव्यः=जाननेमें आनेवाला है; प्रजानाम्=प्राणियोंका (वह); सर्वम्=सम्पूर्ण; चित्तम्=चित्त; प्राणैः=प्राणोंसे; ओतम्=व्याप्त है; यस्मिन् विशुद्धे=जिस अन्तःकरणके विशुद्ध होनेपर; एषः=यह; आत्मा=आत्मा; विभवति=सब प्रकारसे समर्थ होता है ॥ १ ॥

व्याख्या—जिस शरीरमें प्राण, अपान, व्यान, समान और उदान—इन पाँच भेदोंवाला प्राण प्रविष्ट होकर चैष्टायुक्त कर रहा है, उसी शरीरके भीतर हृदयके मध्यभागमें मन्द्राग ज्ञातारूपसे जाननेमें आनेवाला यह सूक्ष्म जीवात्मा भी रहता है। परंतु समस्त प्राणियोंके समस्त अन्तःकरण प्राणोंसे ओत-प्रोत हो रहे हैं, अर्थात् इस प्राण और इन्द्रियोंके तुप्त करनेके लिये उत्पन्न हुई नाना प्रकारकी भोगवासनाओंसे मलिन और क्षुब्ध हो रहे हैं, इस कारण सब लोग परमात्माको नहीं जान पाते। अन्तःकरणके विशुद्ध होनेपर ही यह जीवात्मा सब प्रकारसे समर्थ होता है। अतः यदि भोगोंसे विरक्त होकर यह परमात्माके चिन्तनमें लग जाता है, तब तो परमात्माको प्राप्त कर लेता है; और यदि भोगोंकी कामना करता है तो इच्छित भोगोंको प्राप्त कर लेता है ॥ १ ॥

यं यं लोकं मनसा संविभाति विशुद्धस्तत्त्वः कामयते यांश्च कामान्। तं तं लोकं जयते तांश्च कामां- स्तस्मादात्मज्ञं ह्यर्चयेद् भूतिकामः ॥ १० ॥

विशुद्धस्तत्त्वः=विशुद्ध अन्तःकरणवाला (मनुष्य); यम् यम्=जिस-जिस; लोकम्=लोकको; मनसा=मनसे; संविभाति=चिन्तन करता है; च=तथा; यान्