भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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खण्ड १ ]

मुण्डकोपनिषद्

२७१

वे दूसरे भी दूर हैं, अर्थात् जहाँतक हमलोग दूरका अनुभव करते हैं, वहाँ भी वे हैं और निकटसे भी निकट यहाँ अपने भीतर ही हैं। अधिक क्या, देखनेवालोंमें ही उनके हृदयरूप गुफामें छिपे हुए हैं। अतः उन्हें खोजनेके लिये कहीं दूसरी जगह जानेकी आवश्यकता नहीं है ॥७॥

न चक्षुषा गृह्णते नापि वाचा नान्यैर्देवैस्तपसा कर्मणा वा । ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्व- स्ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः ॥८॥

न चक्षुषा=(वह परमात्मा) न तो नेत्रोंसे; न वाचा=न वाणीसे (और); न अन्यैः=न दूसरी; देवैः=इन्द्रियोंसे; अपि=ही; गृह्णते=ग्रहण करनेमें आता है (तथा); तपसा=तपसे; वा=अथवा; कर्मणा=कर्मोंसे भी (वह); [ न गृह्णते ]=ग्रहण नहीं किया जा सकता; तम्=उस; निष्कलम्=अवयवरहित (परमात्मा) को; तु=तो; विशुद्धसत्त्वः=विशुद्ध अन्तःकरणवाला (साधक); ततः=उस विशुद्ध अन्तःकरणसे; ध्यायमानः=(निरन्तर उसका) ध्यान करता हुआ ही; ज्ञानप्रसादेन=ज्ञानकी निर्मलतासे; पश्यते=देख पाता है ॥८॥

व्याख्या —उन परब्रह्मको मनुष्य इन आँखोंसे नहीं देख सकता; इतना ही नहीं, वाणी आदि अन्य इन्द्रियोंद्वारा भी वे पकड़में नहीं आ सकते तथा नाना प्रकारकी तपश्चर्या और कर्मोंके द्वारा भी मनुष्य उन्हें नहीं पा सकता। उन अवयवरहित परम विशुद्ध परमात्माको तो मनुष्य सब भोगोंसे मुख मोड़कर, निःस्पृह होकर विशुद्ध अन्तःकरणके द्वारा निरन्तर एकमात्र उन्हींका ध्यान करते-करते ज्ञानकी निर्मलतासे ही देख सकता है। अतः जो उन परमात्माको पाना चाहे, उसे उचित है कि संसारके भोगोंसे सर्वथा विरक्त होकर उन सबकी कामनाका त्याग करके एकमात्र परब्रह्म परमात्माको ही पानेके लिये उन्हींके चिन्तनमें निमग्न हो जाय ॥८॥

सम्बन्ध —जब वे परब्रह्म परमात्मा सबके हृदयमें रहते हैं, तब सभी जीव उन्हें क्यों नहीं जानते? शुद्ध अन्तःकरणवाला पुरुष ही क्या जानता है? इस जिज्ञासापर कहते हैं—