ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 272, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें२७०
ईशादि नौ उपनिषद्
[ मुण्डक ३ ]
नहीं होता। अन्तमें सत्य सत्य ही रहता है और झूठ झूठ ही। इसीसे बुद्धिमान् मनुष्य सत्यभाषण और सदाचारको ही अपनाते हैं, झूठको नहीं; क्योंकि जिनकी भोग-वासना नष्ट हो गयी है, ऐसे पूर्णकाम ऋषिलोग जिस मार्गसे वहाँ पहुँचते हैं, जहाँ इस सत्यके परमाधार परब्रह्म परमात्मा स्थित हैं, वह देवयान-मार्ग अर्थात् उन परमदेव परमात्माको प्राप्त करनेका साधनरूप मार्ग सत्यसे ही परिपूर्ण है, उसमें असत्य-भाषण और दम्भ, कपट आदि असत् आचरणोंके लिये स्थान नहीं है ॥ ६ ॥
सम्बन्ध— उपर्युक्त साधनोंसे प्राप्त होनेवाले परमात्माके स्वरूपका पुनः वर्णन करते हैं—
बृहच्च तद् दिव्यमचिन्त्यरूपं सूक्ष्माच्च तत् सूक्ष्मतरं विभाति। दूरात् सुदूरे तदिहान्तिके च पश्यत्स्त्वैव निहितं गुहायाम् ॥ ७ ॥
तत्=वह परब्रह्म; बृहत्=महान्; दिव्यम्=दिव्य; च=और; अचिन्त्यरूपम्=अचिन्त्यस्वरूप है; च=तथा; तत्=वह; सूक्ष्मात्=सूक्ष्मसे भी; सूक्ष्मतरम्=अत्यन्त सूक्ष्मरूपमें; विभाति=प्रकाशित होता है; तत्=(तथा) वह; दूरात्=दूरसे भी; सुदूरे=अत्यन्त दूर है; [ च ]=और; इह=इस (शरीर) में रहकर; अन्तिके च=अति समीप भी है; इह=यहाँ; पश्यत्सु=देखनेवालोंके भीतर; एव=ही; गुहायाम्=उनके हृदयरूपी गुफामें; निहितम्=स्थित है ॥ ७ ॥
व्याख्या— वे परब्रह्म परमात्मा सबसे महान्, दिव्य—अलौकिक और अचिन्त्यस्वरूप हैं अर्थात् उनका स्वरूप मनके द्वारा चिन्तनमें आनेवाला नहीं है। अतः मनुष्यको श्रद्धापूर्वक परमात्माकी प्राप्तिके पूर्वकथित साधनोंमें लगे रहना चाहिये। वे परमात्मा अचिन्त्य एवं सूक्ष्मसे भी अत्यन्त सूक्ष्म होनेपर भी साधन करते-करते स्वयं अपने स्वरूपको साधकके हृदयमें प्रकाशित कर देते हैं। परमात्मा सर्वत्र परिपूर्ण हैं; ऐसा कोई भी स्थान नहीं, जहाँ वे न हों। अतः