भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 271, कुल 548 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 271

खण्ड १ ]

मुण्डकोपनिषद्

२६१

ज्ञानस्वरूप परब्रह्म परमात्मा, जिनको सब प्रकारके दोषोंसे रहित हुए प्रयत्नशील साधक ही जान सकते हैं, वे परमात्मा सदैव सत्य-भाषण, तपश्चर्या, संयम और स्वार्थत्याग तथा ब्रह्मचर्यके पालनसे उत्पन्न यथार्थ ज्ञानद्वारा ही प्राप्त हो सकते हैं। इनसे रहित होकर जो भोगोंमें आसक्त हैं; भोगोंकी प्राप्तिके लिये नाना प्रकारके मिथ्याभाषण करते हैं और आसक्तिवश नियमपूर्वक अपने वीर्यकी रक्षा नहीं कर सकते, वे स्वार्थपरायण अविवेकी मनुष्य उन परमात्माका अनुभव नहीं कर सकते; क्योंकि वे उनको चाहते ही नहीं ॥ ५ ॥

सम्बन्ध—पूर्वोक्त साधनोंमेंसे सत्यकी महिमा बताते हैं—

सत्यमेव | जयति | नानृतं | ---|---|---|--- सत्येन | पन्था | विततो | देवयानः । येनाक्रमन्तृषयो | | ह्यासकामा | यत्र तत् सत्यस्य परमं निधानम् ॥ ६ ॥

सत्यम्=सत्य; एव=ही; जयति=विजयी होता है; अनुतम्=झूठ; न=नहीं; हि=क्योंकि; देवयानः=वह देवयान नामक; पन्थाः=मार्ग; सत्येन=सत्यसे; विततः=परिपूर्ण है; येन=जिससे; आसकामाः=पूर्णकाम; तृषयः= तृषिलोग (वहों); आक्रमन्ति=गमन करते हैं; यत्र=जहाँ; तत्=वह; सत्यस्य=सत्यस्वरूप परब्रह्म परमात्माका; परमम्=उत्कृष्ट; निधानम्=धाम है ॥ ६ ॥

व्याख्या— सत्यकी ही विजय होती है, झूठकी नहीं। अभिप्राय यह है कि परमात्मा सत्यस्वरूप है; अतः उनकी प्राप्तिके लिये मनुष्यमें सत्यकी प्रतिष्ठा होनी चाहिये। परमात्मप्राप्तिके लिये तो सत्य अनिवार्य साधन है ही; जगत्में दूसरे सब कार्योंमें भी अन्ततः सत्यकी ही विजय होती है, झूठकी नहीं। जो लोग मिथ्या-भाषण, दम्भ और कपटसे उन्नतिकी आशा रखते हैं, वे अन्तमें बुरी तरहसे निराश होते हैं। मिथ्या-भाषण और मिथ्या-आचरणोंमें भी जो सत्यका आभास है, जिसके कारण दूसरे लोग उसे किसी अंशमें सत्य मान लेते हैं, उसीसे कुछ क्षणिक लाभ-सा हो जाता है। परंतु उसका परिणाम अच्छा

ईशादि नौ उपनिषद् · पृष्ठ 271, कुल 548 में से · BharatKosha