भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ मुण्डक ३ ]

करता रहता है; एषः=यह (ज्ञानी भक्त); ब्रह्मविदाम्=ब्रह्मवेताओंमें भी; वरिष्ठः=श्रेष्ठ हैं ॥४॥

व्याख्या —ये सर्वव्यापी परमेश्वर ही सबके प्राण हैं; जिस प्रकार शरीरकी सारी चैष्टाएँ प्राणके द्वारा होती हैं, उसी प्रकार इस विश्वमें भी जो कुछ हो रहा है, परमात्माकी शक्तिके ही हो रहा है। समस्त प्राणियोंमें भी उन्हींका प्रकाश है, वे ही उन प्राणियोंके द्वारा प्रकाशित हो रहे हैं। इस बातको समझनेवाला ज्ञानी भक्त कभी बढ़-बढ़कर बातें नहीं करता; क्योंकि वह जानता है कि उसके अंदर भी उन सर्वव्यापक परमात्माकी ही शक्ति अभिव्यक्त है; फिर वह किस बातपर अभिमान करे। वह तो लोकसंग्रहके लिये भगवदज्ञानुसार अपने वर्ण, आश्रमके अनुकूल कर्म करता हुआ सबके आत्मा अन्तर्यामी भगवान्में ही क्रीडा करता है। (गीता ६।३१) वह सदा भगवान्में ही रमण करता है। ऐसा यह भगवान्का ज्ञानी भक्त ब्रह्मवेताओंमें भी अति श्रेष्ठ है। गीतामें भी सबको वासुदेवरूप देखनेवाले ज्ञानी भक्तको महात्मा और सुदुर्लभ बताया गया है (७।१९) ॥४॥

सम्बन्ध —उन परमात्माकी प्राप्तिके साधन बताते हैं—

सत्येन लभ्यस्तपसा होष आत्मा सम्यग्ज्ञानेन ब्रह्मचर्येण नित्यम्। अन्तःशरीरे ज्योतिर्मयो हि शुभ्रो यं पश्यन्ति यतयः क्षीणदोषाः ॥५॥

एषः=यह; अन्तःशरीरे हि=शरीरके भीतर ही (हृदयमें विराजमान); ज्योतिर्मयः=प्रकाशस्वरूप (और); शुभ्रः=परम विशुद्ध; आत्मा=परमात्मा; हि=निस्संदेह; सत्येन=सत्य-भाषणसे; तपसा=तपसे (और); ब्रह्मचर्येण=ब्रह्मचर्यपूर्वक; सम्यग्ज्ञानेन=यथार्थ ज्ञानसे ही; नित्यम्=सदा; लभ्यः=प्राप्त होनेवाला है; यम्=जिसे; क्षीणदोषाः=सब प्रकारके दोषोंसे रहित हुए; यतयः=यत्नशील साधक ही; पश्यन्ति=देख पाते हैं ॥५॥

व्याख्या —सबके शरीरके भीतर हृदयमें विराजमान परम विशुद्ध प्रकाशमय