भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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खण्ड १ ]

मुण्डकोपनिषद्

२६७

तदा विद्वान् पुण्यपापे विधूय निरञ्जनः परमं साम्यमुपैति ॥ ३ ॥

यदा=जब; पश्यः=यह द्रष्टा (जीवात्मा); ईशम्=सबके शासक; ब्रह्मयोनिम्=ब्रह्माके भी आदि कारण; कर्तारम्=सम्पूर्ण जगत्के रचयिता; रुक्मवर्णम्=दिव्य प्रकाशस्वरूप; पुरुषम्=परमपुरुषको; पश्यते=प्रत्यक्ष कर लेता है; तदा=उस समय; पुण्यपापे=पुण्य-पाप दोनोंको; विधूय=भलीभाँति हटाकर; निरञ्जनः=निर्मल हुआ; विद्वान्=वह ज्ञानी महात्मा; परमम्=सर्वोत्तम; साम्यम्=समताको; उपैति=प्राप्त कर लेता है ॥ ३ ॥

व्याख्या—पूर्वोक्त प्रकारसे परमेश्वरकी आश्चर्यमयी महिमाकी ओर दृष्टिपात करके उनके समुख जानेवाला द्रष्टा (जीवात्मा) जब सबके नियन्ता ब्रह्माके भी आदि कारण, सम्पूर्ण जगत्की रचना करनेवाले, दिव्य प्रकाशस्वरूप परमपुरुष परमेश्वरका साक्षात् कर लेता है, उस समय वह अपने समस्त पुण्य-पापरूप कर्मोंका समूल नाश करके उनसे सर्वथा सम्बन्धरहित होकर परम निर्मल हुआ ज्ञानी भक्त सर्वोत्तम समताको प्राप्त हो जाता है। गीताके बारहवें अध्यायमें श्लोक १३ से १९ तक इस समताका कई प्रकारसे वर्णन किया गया है ॥ ३ ॥

प्राणो ह्येष यः सर्वभूतैर्विभाति विजानन् विद्वान् भवते नातिवादी।

आत्मक्रीड आत्मरतिः क्रियावा- नेष ब्रह्मविदां वरिष्ठः ॥ ४ ॥

एषः=यह (परमेश्वर); हि=ही; प्राणः=प्राण है; यः=जो; सर्वभूतेः=सब प्राणियोंके द्वारा; विभाति=प्रकाशित हो रहा है; विजानन्=(इसको) जाननेवाला; विद्वान्=ज्ञानी; अतिवादी=अभिमानपूर्वक बढ-बढ़कर बातें करनेवाला; न भवते=नहीं होता (किंतु वह); क्रियावान्=यथार्थयोग्य भगवत्प्रीत्यर्थ कर्म करता हुआ; आत्मक्रीडः=सबके आत्मरूप अन्तर््यामी परमेश्वरमें क्रीडा करता रहता है (और); आत्मरतिः=सबके आत्मा अन्तर््यामी परमेश्वरमें ही रमण