भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ मुण्डक ३ ]

एषोऽणुरात्मा चेतसा वेदितव्यो यस्मिन् प्राणः पञ्चधा संविवेश। प्राणैश्चित्तं सर्वमोतं प्रजानां यस्मिन् विशुद्धे विभवत्येष आत्मा ॥ १ ॥

यस्मिन्=जिसमें; पञ्चधा=पाँच भेदोंवाला; प्राणः=प्राण; संविवेश=भलीभाँति प्रविष्ट है (उसी शरीरमें रहनेवाला); एषः=यह; अणुः=सूक्ष्म; आत्मा=आत्मा; चेतसा=मनसे; वेदितव्यः=जाननेमें आनेवाला है; प्रजानाम्=प्राणियोंका (वह); सर्वम्=सम्पूर्ण; चित्तम्=चित्त; प्राणैः=प्राणोंसे; ओतम्=व्याप्त है; यस्मिन् विशुद्धे=जिस अन्तःकरणके विशुद्ध होनेपर; एषः=यह; आत्मा=आत्मा; विभवति=सब प्रकारसे समर्थ होता है ॥ १ ॥

व्याख्या—जिस शरीरमें प्राण, अपान, व्यान, समान और उदान—इन पाँच भेदोंवाला प्राण प्रविष्ट होकर चैष्टायुक्त कर रहा है, उसी शरीरके भीतर हृदयके मध्यभागमें मन्द्राग ज्ञातारूपसे जाननेमें आनेवाला यह सूक्ष्म जीवात्मा भी रहता है। परंतु समस्त प्राणियोंके समस्त अन्तःकरण प्राणोंसे ओत-प्रोत हो रहे हैं, अर्थात् इस प्राण और इन्द्रियोंके तुप्त करनेके लिये उत्पन्न हुई नाना प्रकारकी भोगवासनाओंसे मलिन और क्षुब्ध हो रहे हैं, इस कारण सब लोग परमात्माको नहीं जान पाते। अन्तःकरणके विशुद्ध होनेपर ही यह जीवात्मा सब प्रकारसे समर्थ होता है। अतः यदि भोगोंसे विरक्त होकर यह परमात्माके चिन्तनमें लग जाता है, तब तो परमात्माको प्राप्त कर लेता है; और यदि भोगोंकी कामना करता है तो इच्छित भोगोंको प्राप्त कर लेता है ॥ १ ॥

यं यं लोकं मनसा संविभाति विशुद्धस्तत्त्वः कामयते यांश्च कामान्। तं तं लोकं जयते तांश्च कामां- स्तस्मादात्मज्ञं ह्यर्चयेद् भूतिकामः ॥ १० ॥

विशुद्धस्तत्त्वः=विशुद्ध अन्तःकरणवाला (मनुष्य); यम् यम्=जिस-जिस; लोकम्=लोकको; मनसा=मनसे; संविभाति=चिन्तन करता है; च=तथा; यान्