ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 275, कुल 548 में से
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मुण्डकोपनिषद्
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कामान् कामयते=जिन भोगोंकी कामना करता है; तम् तम्=उन-उन; लोकम्=लोकोंको; जयते=जीत लेता है; च=और; तान् कामान्=उन (इच्छित) भोगोंको भी प्राप्त कर लेता है; तस्मात् हि=इसीलिये; भूतिकामः=ऐश्वर्यकी कामनावाला मनुष्य; आत्मज्ञम्=शरीरसे भिन्न आत्माको जाननेवाले महात्माकी; अर्चयेत्=सेवा-पूजा करे ॥ १० ॥
व्याख्या —विशुद्ध अन्तःकरणवाला मनुष्य यदि भोगोंसे सर्वथा विरक्त होकर उस निर्मल अन्तःकरणद्वारा निरन्तर परब्रह्म परमेश्वरका ध्यान करता है—तब तो उन्हें प्राप्त कर लेता है यह बात आठवें मन्त्रमें कही जा चुकी है; परंतु यदि वह सर्वथा निष्काम नहीं होता तो जिस-जिस लोकका मनसे चिन्तन करता है तथा जिन-जिन भोगोंको चाहता है, उन-उन लोकोंको ही जीतता है—उन्हीं लोकोंमें जाता है तथा उन-उन भोगोंको ही प्राप्त करता है। इसलिये ऐश्वर्यकी कामनावाले मनुष्यको चाहिये कि शरीरसे भिन्न आत्माको जाननेवाले विशुद्ध अन्तःकरणयुक्त विवेकी पुरुषकी सेवा-पूजा (आदर-सत्कार) करे; क्योंकि वह अपने लिये और दूसरोंके लिये भी जो-जो कामना करता है, वह पूर्ण हो जाती है ॥ १० ॥
॥ प्रथम खण्ड समाप्त ॥ १ ॥
द्वितीय खण्ड
सम्बन्ध —पूर्व प्रकरणमें विशुद्ध अन्तःकरणवाले साधककी सामर्थ्यका वर्णन करनेके लिये प्रसङ्गवश कामनाओंकी पूर्तिकी बात आ गयी थी; अतः निष्कामभावकी प्रशंसा और सकामभावकी निन्दा करते हुए पुनः प्रकरण आरम्भ करते हैं—
स वेदैतत् परमं ब्रह्म धाम यत्र विश्वं निहितं भाति शुभ्रम्। उपासते पुरुषं ये ह्यकामा- स्ते शुक्रमेतदतिवर्तन्ति धीराः ॥ १ ॥