ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ मुण्डक २ ]
भी तत्त्व प्रकाशशील हैं, सब उन परब्रह्म परमेश्वरकी प्रकाश-शक्तिके अंशको पाकर ही प्रकाशित हैं। वे अपने प्रकाशके समीप अपना प्रकाश कैसे फैला सकते हैं? सारांश यह कि यह सम्पूर्ण जगत् उन जगदात्मा पुरुषोत्तमके प्रकाशसे अथवा उस प्रकाशके एक शुद्धतम अंशसे प्रकाशित हो रहा है ॥ १० ॥
ब्रह्मैवेदममृतं पुरस्ताद्ब्रह्म पश्चाद्ब्रह्म दक्षिणतश्चोत्तरेण ।
अधश्चोर्ध्वं च प्रसृतं ब्रह्मैवेदं विश्वमिदं वरिष्ठम् ॥ ११ ॥
इदम्=यह; अमृतम्=अमृतस्वरूप; ब्रह्म=परब्रह्म; एव=ही; पुरस्तात्=सामने हैं; ब्रह्म=ब्रह्म ही; पश्चात्=पीछे हैं; ब्रह्म=ब्रह्म ही; दक्षिणतः=दायीं ओर; च=तथा; उत्तरेण=बार्यी ओर; अधः=नीचेकी ओर; च=तथा; ऊर्ध्वम्=ऊपरकी ओर; च=भी; प्रसृतम्=फैला हुआ है; इदम् [ यत् ]=यह जो; विश्वम्=सम्पूर्ण जगत् है; इदम्=यह; वरिष्ठम्=सर्वश्रेष्ठ; ब्रह्म एव=ब्रह्म ही है ॥ ११ ॥
व्याख्या —इस मन्त्रमें परमात्माकी सर्वव्यापकता और सर्वरूपताका प्रतिपादन किया गया है। सारांश यह कि ये अमृतस्वरूप परब्रह्म परमात्मा ही आगे-पीछे, दायें-बायें, बाहर-भीतर, ऊपर-नीचे—सर्वत्र फैले हुए हैं; इस विश्वब्रह्माण्डके रूपमें ये सर्वश्रेष्ठ ब्रह्म ही प्रत्यक्ष दिखायी दे रहे हैं ॥ ११ ॥
॥ द्वितीय खण्ड समाप्त ॥ २ ॥
॥ द्वितीय मुण्डक समाप्त ॥ २ ॥
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