ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 265, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड २]
मुण्डकोपनिषद्
२६३
तत्=वह; विरजम्=निर्मल; निष्कलम्=अवयवरहित; ब्रह्म=परब्रह्म; हिरण्मये परे कोशे=प्रकाशमय परम कोशमें—परमधाममें (विराजमान है); तत्=वह; शुभ्रम्=सर्वथा विशुद्ध; ज्योतिषाम्=समस्त ज्योतियोंकी भी; ज्योतिः=ज्योति है; यत्=जिसको; आत्मविदः=आत्मज्ञानी; विदुः=जानते हैं ॥ ९ ॥
व्याख्या —वे निर्मल—निर्विकार और अवयवरहित—अखण्ड परमात्मा प्रकाशमय परमधाममें विराजमान हैं; वे सर्वथा विशुद्ध और समस्त प्रकाशयुक्त पदार्थोंके भी प्रकाशक हैं तथा उन्हें आत्मज्ञानी महात्माजन ही जानते हैं ॥ ९ ॥
न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः। तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥ १० ॥*
तत्र=वहाँ; न=न (तो); सूर्यः=सूर्य; भाति=प्रकाशित होता है; न=न; चन्द्रतारकम्=चन्द्रमा और तारागण ही; न=(तथा) न; इमाः=ये; विद्युतः=बिजलियाँ ही; भान्ति=(वहाँ) चमकती हैं; अयम् अग्निः कुतः=फिर इस अग्निके लिये तो कहना ही क्या है; तम् भान्तम् एव=(क्योंकि) उसके प्रकाशित होनेपर ही; सर्वम्=सब; अनुभाति=उसके पीछे उसीके प्रकाशसे प्रकाशित होते हैं; तस्य=उसीके; भासा=प्रकाशसे; इदम् सर्वम्=यह सम्पूर्ण जगत्; विभाति=प्रकाशित होता है ॥ १० ॥
व्याख्या —उन स्वप्रकाश परमानन्दस्वरूप परब्रह्म परमेश्वरके समीप यह सूर्य नहीं प्रकाशित होता। जिस प्रकार सूर्यका प्रकाश प्रकट होनेपर खद्योतका प्रकाश लुप्त हो जाता है, वैसे ही सूर्यका तेज भी उस असीम तेजके सामने लुप्त हो जाता है। चन्द्रमा, तारागण और बिजली भी वहाँ नहीं चमकते; फिर इस लौकिक अग्निकी तो बात ही क्या है। क्योंकि प्राकृत जगत्में जो कुछ
- यह मन्त्र कठोपनिषद् (२।२।१५) में और श्वेता० उ० (६।१४) में भी है।