ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
खण्ड २]
मुण्डकोपनिषद्
२६३
तत्=वह; विरजम्=निर्मल; निष्कलम्=अवयवरहित; ब्रह्म=परब्रह्म; हिरण्मये परे कोशे=प्रकाशमय परम कोशमें—परमधाममें (विराजमान है); तत्=वह; शुभ्रम्=सर्वथा विशुद्ध; ज्योतिषाम्=समस्त ज्योतियोंकी भी; ज्योतिः=ज्योति है; यत्=जिसको; आत्मविदः=आत्मज्ञानी; विदुः=जानते हैं ॥ ९ ॥
व्याख्या —वे निर्मल—निर्विकार और अवयवरहित—अखण्ड परमात्मा प्रकाशमय परमधाममें विराजमान हैं; वे सर्वथा विशुद्ध और समस्त प्रकाशयुक्त पदार्थोंके भी प्रकाशक हैं तथा उन्हें आत्मज्ञानी महात्माजन ही जानते हैं ॥ ९ ॥
न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः। तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥ १० ॥*
तत्र=वहाँ; न=न (तो); सूर्यः=सूर्य; भाति=प्रकाशित होता है; न=न; चन्द्रतारकम्=चन्द्रमा और तारागण ही; न=(तथा) न; इमाः=ये; विद्युतः=बिजलियाँ ही; भान्ति=(वहाँ) चमकती हैं; अयम् अग्निः कुतः=फिर इस अग्निके लिये तो कहना ही क्या है; तम् भान्तम् एव=(क्योंकि) उसके प्रकाशित होनेपर ही; सर्वम्=सब; अनुभाति=उसके पीछे उसीके प्रकाशसे प्रकाशित होते हैं; तस्य=उसीके; भासा=प्रकाशसे; इदम् सर्वम्=यह सम्पूर्ण जगत्; विभाति=प्रकाशित होता है ॥ १० ॥
व्याख्या —उन स्वप्रकाश परमानन्दस्वरूप परब्रह्म परमेश्वरके समीप यह सूर्य नहीं प्रकाशित होता। जिस प्रकार सूर्यका प्रकाश प्रकट होनेपर खद्योतका प्रकाश लुप्त हो जाता है, वैसे ही सूर्यका तेज भी उस असीम तेजके सामने लुप्त हो जाता है। चन्द्रमा, तारागण और बिजली भी वहाँ नहीं चमकते; फिर इस लौकिक अग्निकी तो बात ही क्या है। क्योंकि प्राकृत जगत्में जो कुछ
- यह मन्त्र कठोपनिषद् (२।२।१५) में और श्वेता० उ० (६।१४) में भी है।
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ मुण्डक २ ]
भी तत्त्व प्रकाशशील हैं, सब उन परब्रह्म परमेश्वरकी प्रकाश-शक्तिके अंशको पाकर ही प्रकाशित हैं। वे अपने प्रकाशके समीप अपना प्रकाश कैसे फैला सकते हैं? सारांश यह कि यह सम्पूर्ण जगत् उन जगदात्मा पुरुषोत्तमके प्रकाशसे अथवा उस प्रकाशके एक शुद्धतम अंशसे प्रकाशित हो रहा है ॥ १० ॥
ब्रह्मैवेदममृतं पुरस्ताद्ब्रह्म पश्चाद्ब्रह्म दक्षिणतश्चोत्तरेण ।
अधश्चोर्ध्वं च प्रसृतं ब्रह्मैवेदं विश्वमिदं वरिष्ठम् ॥ ११ ॥
इदम्=यह; अमृतम्=अमृतस्वरूप; ब्रह्म=परब्रह्म; एव=ही; पुरस्तात्=सामने हैं; ब्रह्म=ब्रह्म ही; पश्चात्=पीछे हैं; ब्रह्म=ब्रह्म ही; दक्षिणतः=दायीं ओर; च=तथा; उत्तरेण=बार्यी ओर; अधः=नीचेकी ओर; च=तथा; ऊर्ध्वम्=ऊपरकी ओर; च=भी; प्रसृतम्=फैला हुआ है; इदम् [ यत् ]=यह जो; विश्वम्=सम्पूर्ण जगत् है; इदम्=यह; वरिष्ठम्=सर्वश्रेष्ठ; ब्रह्म एव=ब्रह्म ही है ॥ ११ ॥
व्याख्या —इस मन्त्रमें परमात्माकी सर्वव्यापकता और सर्वरूपताका प्रतिपादन किया गया है। सारांश यह कि ये अमृतस्वरूप परब्रह्म परमात्मा ही आगे-पीछे, दायें-बायें, बाहर-भीतर, ऊपर-नीचे—सर्वत्र फैले हुए हैं; इस विश्वब्रह्माण्डके रूपमें ये सर्वश्रेष्ठ ब्रह्म ही प्रत्यक्ष दिखायी दे रहे हैं ॥ ११ ॥
॥ द्वितीय खण्ड समाप्त ॥ २ ॥
॥ द्वितीय मुण्डक समाप्त ॥ २ ॥
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तृतीय मुण्डक
प्रथम खण्ड
द्व्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते । तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वन्त्य- नश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ॥ १ ॥ *
सयुजा=एक साथ रहनेवाले (तथा); सखाया=परस्पर सखाभाव रखनेवाले; द्व्वा=दो; सुपर्णा=पक्षी (जीवात्मा और परमात्मा); समानम् वृक्षम् परिषस्वजाते=एक ही वृक्ष (शरीर)-का आश्रय लेकर रहते हैं; तयोः=उन दोनोंमेंसे; अन्यः=एक तो; पिप्पलम्=उस वृक्षके सुख-दुःखरूप कर्मफलोंका; स्वादु=स्वाद ले-लेकर; अन्ति=उपभोग करता है (किंतु); अन्यः=दूसरा; अनश्नन्=न खाता हुआ; अभिचाकशीति=केवल देखता रहता है ॥ १ ॥
व्याख्या—जिस प्रकार गीतामें जगत्का अश्रुस्थ (पीपल) वृक्षके रूपमें वर्णन किया गया है, उसी प्रकार इस मन्त्रमें शरीरको पीपलके वृक्षका और जीवात्मा तथा परमात्माको पक्षियोंका रूप देकर वर्णन किया गया है। इसी तरहका वर्णन कठोपनिषद्में भी गुहामें प्रविष्ट छाया और धूपके नामसे आया है। भाव दोनों जगह प्रायः एक ही है। मन्त्रका सारांश यह है कि यह मनुष्यशरीर मानो एक वृक्ष है। ईश्वर और जीव—ये सदा साथ रहनेवाले दो मित्र पक्षी हैं। ये इस शरीररूपवृक्षमें एक साथ ही हृदयरूप घोंसलेमें निवास करते हैं। इन दोनोंमें एक—जीवात्मा तो उस वृक्षके फलरूप अपने कर्मफलोंको अर्थात् प्रारब्धानुसार प्राप्त हुए सुख-दुःखोंको आसक्ति एवं द्वेषपूर्वक भोगता है और दूसरा—ईश्वर उन कर्मफलोंसे किसी प्रकारका किञ्चित् भी सम्बन्ध न जोड़कर केवल देखता रहता है ॥ १ ॥
- ऋग् ० १।१६४।२०, अथर्व० ९।१४।२० में भी यह मन्त्र इसी रूपमें आया है।
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ मुण्डक ३ ]
समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नो- उनीशया शोचति मुह्यमानः । जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीश- मस्य महिमानमिति वीतशोकः ॥ २ ॥*
समाने वृक्षे=पूर्वोक्त शरीररूपी समान वृक्षपर (रहनेवाला); पुरुषः=जीवात्मा; निमग्नः=(शरीरकी गहरी आसक्तिमें) डूबा हुआ है; अनीशया=असमर्थतारूप दीनताका अनुभव करता हुआ; मुह्यमानः=मोहित होकर; शोचति=शोक करता रहता है; यदा=जब कभी (भगवान्की अहैतुकी दयासे); जुष्टम्=(भक्तोंद्वारा नित्य) सेवित; अन्यम्=अपनेसे भिन्न; ईशम्=परमेश्वरको (और); अस्य महिमानम्=उनकी महिमाको; पश्यति=यह प्रत्यक्ष कर लेता है; इति=तब; वीतशोकः=सर्वथा शोकरहित हो जाता है ॥ २ ॥
व्याख्या—पहले वर्णन किये हुए शरीररूप एक ही वृक्षपर हृदयरूप घोंसलेमें रहनेवाला यह जीवात्मा जबतक अपने साथ रहनेवाले उन परम सुहृद परमेश्वरकी ओर नहीं देखता, शरीरमें ही आसक्त होकर इसीमें निमग्न हुआ रहता है अर्थात् शरीरमें अतिशय ममता करके उसके द्वारा भोगोंके भोगनेमें ही रचा-पचा रहता है तबतक असमर्थतारूप दीनतासे मोहित होकर वह नाना प्रकारके दुःख भोगता रहता है। जब कभी भगवान्की निहैतुकी दयासे अपनेसे भिन्न, नित्य अपने ही समीप रहनेवाले, परम सुहृद, परमप्रिय और भक्तोंद्वारा सेवित ईश्वरको और उनकी आश्चर्यमयी महिमाको, जो जगत्में सर्वत्र भिन्न-भिन्न प्रकारसे प्रकट हो रही है, प्रत्यक्ष कर लेता है, तब वह तत्काल ही सर्वथा शोकरहित हो जाता है ॥ २ ॥
सम्बन्ध—ईश्वरके स्वरूपका वर्णन करते हुए उन्हें जान लेनेका फल बताते हैं—
यदा पश्यः पश्यते रुक्मवर्णं कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम् ।
- ये दोनों मन्त्र श्वेता० उ० ४।६,७ में भी इसी रूपमें आये हैं।
खण्ड १ ]
मुण्डकोपनिषद्
२६७
तदा विद्वान् पुण्यपापे विधूय निरञ्जनः परमं साम्यमुपैति ॥ ३ ॥
यदा=जब; पश्यः=यह द्रष्टा (जीवात्मा); ईशम्=सबके शासक; ब्रह्मयोनिम्=ब्रह्माके भी आदि कारण; कर्तारम्=सम्पूर्ण जगत्के रचयिता; रुक्मवर्णम्=दिव्य प्रकाशस्वरूप; पुरुषम्=परमपुरुषको; पश्यते=प्रत्यक्ष कर लेता है; तदा=उस समय; पुण्यपापे=पुण्य-पाप दोनोंको; विधूय=भलीभाँति हटाकर; निरञ्जनः=निर्मल हुआ; विद्वान्=वह ज्ञानी महात्मा; परमम्=सर्वोत्तम; साम्यम्=समताको; उपैति=प्राप्त कर लेता है ॥ ३ ॥
व्याख्या—पूर्वोक्त प्रकारसे परमेश्वरकी आश्चर्यमयी महिमाकी ओर दृष्टिपात करके उनके समुख जानेवाला द्रष्टा (जीवात्मा) जब सबके नियन्ता ब्रह्माके भी आदि कारण, सम्पूर्ण जगत्की रचना करनेवाले, दिव्य प्रकाशस्वरूप परमपुरुष परमेश्वरका साक्षात् कर लेता है, उस समय वह अपने समस्त पुण्य-पापरूप कर्मोंका समूल नाश करके उनसे सर्वथा सम्बन्धरहित होकर परम निर्मल हुआ ज्ञानी भक्त सर्वोत्तम समताको प्राप्त हो जाता है। गीताके बारहवें अध्यायमें श्लोक १३ से १९ तक इस समताका कई प्रकारसे वर्णन किया गया है ॥ ३ ॥
प्राणो ह्येष यः सर्वभूतैर्विभाति विजानन् विद्वान् भवते नातिवादी।
आत्मक्रीड आत्मरतिः क्रियावा- नेष ब्रह्मविदां वरिष्ठः ॥ ४ ॥
एषः=यह (परमेश्वर); हि=ही; प्राणः=प्राण है; यः=जो; सर्वभूतेः=सब प्राणियोंके द्वारा; विभाति=प्रकाशित हो रहा है; विजानन्=(इसको) जाननेवाला; विद्वान्=ज्ञानी; अतिवादी=अभिमानपूर्वक बढ-बढ़कर बातें करनेवाला; न भवते=नहीं होता (किंतु वह); क्रियावान्=यथार्थयोग्य भगवत्प्रीत्यर्थ कर्म करता हुआ; आत्मक्रीडः=सबके आत्मरूप अन्तर््यामी परमेश्वरमें क्रीडा करता रहता है (और); आत्मरतिः=सबके आत्मा अन्तर््यामी परमेश्वरमें ही रमण
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ मुण्डक ३ ]
करता रहता है; एषः=यह (ज्ञानी भक्त); ब्रह्मविदाम्=ब्रह्मवेताओंमें भी; वरिष्ठः=श्रेष्ठ हैं ॥४॥
व्याख्या —ये सर्वव्यापी परमेश्वर ही सबके प्राण हैं; जिस प्रकार शरीरकी सारी चैष्टाएँ प्राणके द्वारा होती हैं, उसी प्रकार इस विश्वमें भी जो कुछ हो रहा है, परमात्माकी शक्तिके ही हो रहा है। समस्त प्राणियोंमें भी उन्हींका प्रकाश है, वे ही उन प्राणियोंके द्वारा प्रकाशित हो रहे हैं। इस बातको समझनेवाला ज्ञानी भक्त कभी बढ़-बढ़कर बातें नहीं करता; क्योंकि वह जानता है कि उसके अंदर भी उन सर्वव्यापक परमात्माकी ही शक्ति अभिव्यक्त है; फिर वह किस बातपर अभिमान करे। वह तो लोकसंग्रहके लिये भगवदज्ञानुसार अपने वर्ण, आश्रमके अनुकूल कर्म करता हुआ सबके आत्मा अन्तर्यामी भगवान्में ही क्रीडा करता है। (गीता ६।३१) वह सदा भगवान्में ही रमण करता है। ऐसा यह भगवान्का ज्ञानी भक्त ब्रह्मवेताओंमें भी अति श्रेष्ठ है। गीतामें भी सबको वासुदेवरूप देखनेवाले ज्ञानी भक्तको महात्मा और सुदुर्लभ बताया गया है (७।१९) ॥४॥
सम्बन्ध —उन परमात्माकी प्राप्तिके साधन बताते हैं—
सत्येन लभ्यस्तपसा होष आत्मा सम्यग्ज्ञानेन ब्रह्मचर्येण नित्यम्। अन्तःशरीरे ज्योतिर्मयो हि शुभ्रो यं पश्यन्ति यतयः क्षीणदोषाः ॥५॥
एषः=यह; अन्तःशरीरे हि=शरीरके भीतर ही (हृदयमें विराजमान); ज्योतिर्मयः=प्रकाशस्वरूप (और); शुभ्रः=परम विशुद्ध; आत्मा=परमात्मा; हि=निस्संदेह; सत्येन=सत्य-भाषणसे; तपसा=तपसे (और); ब्रह्मचर्येण=ब्रह्मचर्यपूर्वक; सम्यग्ज्ञानेन=यथार्थ ज्ञानसे ही; नित्यम्=सदा; लभ्यः=प्राप्त होनेवाला है; यम्=जिसे; क्षीणदोषाः=सब प्रकारके दोषोंसे रहित हुए; यतयः=यत्नशील साधक ही; पश्यन्ति=देख पाते हैं ॥५॥
व्याख्या —सबके शरीरके भीतर हृदयमें विराजमान परम विशुद्ध प्रकाशमय
खण्ड १ ]
मुण्डकोपनिषद्
२६१
ज्ञानस्वरूप परब्रह्म परमात्मा, जिनको सब प्रकारके दोषोंसे रहित हुए प्रयत्नशील साधक ही जान सकते हैं, वे परमात्मा सदैव सत्य-भाषण, तपश्चर्या, संयम और स्वार्थत्याग तथा ब्रह्मचर्यके पालनसे उत्पन्न यथार्थ ज्ञानद्वारा ही प्राप्त हो सकते हैं। इनसे रहित होकर जो भोगोंमें आसक्त हैं; भोगोंकी प्राप्तिके लिये नाना प्रकारके मिथ्याभाषण करते हैं और आसक्तिवश नियमपूर्वक अपने वीर्यकी रक्षा नहीं कर सकते, वे स्वार्थपरायण अविवेकी मनुष्य उन परमात्माका अनुभव नहीं कर सकते; क्योंकि वे उनको चाहते ही नहीं ॥ ५ ॥
सम्बन्ध—पूर्वोक्त साधनोंमेंसे सत्यकी महिमा बताते हैं—
सत्यमेव | जयति | नानृतं | ---|---|---|--- सत्येन | पन्था | विततो | देवयानः । येनाक्रमन्तृषयो | | ह्यासकामा | यत्र तत् सत्यस्य परमं निधानम् ॥ ६ ॥
सत्यम्=सत्य; एव=ही; जयति=विजयी होता है; अनुतम्=झूठ; न=नहीं; हि=क्योंकि; देवयानः=वह देवयान नामक; पन्थाः=मार्ग; सत्येन=सत्यसे; विततः=परिपूर्ण है; येन=जिससे; आसकामाः=पूर्णकाम; तृषयः= तृषिलोग (वहों); आक्रमन्ति=गमन करते हैं; यत्र=जहाँ; तत्=वह; सत्यस्य=सत्यस्वरूप परब्रह्म परमात्माका; परमम्=उत्कृष्ट; निधानम्=धाम है ॥ ६ ॥
व्याख्या— सत्यकी ही विजय होती है, झूठकी नहीं। अभिप्राय यह है कि परमात्मा सत्यस्वरूप है; अतः उनकी प्राप्तिके लिये मनुष्यमें सत्यकी प्रतिष्ठा होनी चाहिये। परमात्मप्राप्तिके लिये तो सत्य अनिवार्य साधन है ही; जगत्में दूसरे सब कार्योंमें भी अन्ततः सत्यकी ही विजय होती है, झूठकी नहीं। जो लोग मिथ्या-भाषण, दम्भ और कपटसे उन्नतिकी आशा रखते हैं, वे अन्तमें बुरी तरहसे निराश होते हैं। मिथ्या-भाषण और मिथ्या-आचरणोंमें भी जो सत्यका आभास है, जिसके कारण दूसरे लोग उसे किसी अंशमें सत्य मान लेते हैं, उसीसे कुछ क्षणिक लाभ-सा हो जाता है। परंतु उसका परिणाम अच्छा
२७०
ईशादि नौ उपनिषद्
[ मुण्डक ३ ]
नहीं होता। अन्तमें सत्य सत्य ही रहता है और झूठ झूठ ही। इसीसे बुद्धिमान् मनुष्य सत्यभाषण और सदाचारको ही अपनाते हैं, झूठको नहीं; क्योंकि जिनकी भोग-वासना नष्ट हो गयी है, ऐसे पूर्णकाम ऋषिलोग जिस मार्गसे वहाँ पहुँचते हैं, जहाँ इस सत्यके परमाधार परब्रह्म परमात्मा स्थित हैं, वह देवयान-मार्ग अर्थात् उन परमदेव परमात्माको प्राप्त करनेका साधनरूप मार्ग सत्यसे ही परिपूर्ण है, उसमें असत्य-भाषण और दम्भ, कपट आदि असत् आचरणोंके लिये स्थान नहीं है ॥ ६ ॥
सम्बन्ध— उपर्युक्त साधनोंसे प्राप्त होनेवाले परमात्माके स्वरूपका पुनः वर्णन करते हैं—
बृहच्च तद् दिव्यमचिन्त्यरूपं सूक्ष्माच्च तत् सूक्ष्मतरं विभाति। दूरात् सुदूरे तदिहान्तिके च पश्यत्स्त्वैव निहितं गुहायाम् ॥ ७ ॥
तत्=वह परब्रह्म; बृहत्=महान्; दिव्यम्=दिव्य; च=और; अचिन्त्यरूपम्=अचिन्त्यस्वरूप है; च=तथा; तत्=वह; सूक्ष्मात्=सूक्ष्मसे भी; सूक्ष्मतरम्=अत्यन्त सूक्ष्मरूपमें; विभाति=प्रकाशित होता है; तत्=(तथा) वह; दूरात्=दूरसे भी; सुदूरे=अत्यन्त दूर है; [ च ]=और; इह=इस (शरीर) में रहकर; अन्तिके च=अति समीप भी है; इह=यहाँ; पश्यत्सु=देखनेवालोंके भीतर; एव=ही; गुहायाम्=उनके हृदयरूपी गुफामें; निहितम्=स्थित है ॥ ७ ॥
व्याख्या— वे परब्रह्म परमात्मा सबसे महान्, दिव्य—अलौकिक और अचिन्त्यस्वरूप हैं अर्थात् उनका स्वरूप मनके द्वारा चिन्तनमें आनेवाला नहीं है। अतः मनुष्यको श्रद्धापूर्वक परमात्माकी प्राप्तिके पूर्वकथित साधनोंमें लगे रहना चाहिये। वे परमात्मा अचिन्त्य एवं सूक्ष्मसे भी अत्यन्त सूक्ष्म होनेपर भी साधन करते-करते स्वयं अपने स्वरूपको साधकके हृदयमें प्रकाशित कर देते हैं। परमात्मा सर्वत्र परिपूर्ण हैं; ऐसा कोई भी स्थान नहीं, जहाँ वे न हों। अतः
खण्ड १ ]
मुण्डकोपनिषद्
२७१
वे दूसरे भी दूर हैं, अर्थात् जहाँतक हमलोग दूरका अनुभव करते हैं, वहाँ भी वे हैं और निकटसे भी निकट यहाँ अपने भीतर ही हैं। अधिक क्या, देखनेवालोंमें ही उनके हृदयरूप गुफामें छिपे हुए हैं। अतः उन्हें खोजनेके लिये कहीं दूसरी जगह जानेकी आवश्यकता नहीं है ॥७॥
न चक्षुषा गृह्णते नापि वाचा नान्यैर्देवैस्तपसा कर्मणा वा । ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्व- स्ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः ॥८॥
न चक्षुषा=(वह परमात्मा) न तो नेत्रोंसे; न वाचा=न वाणीसे (और); न अन्यैः=न दूसरी; देवैः=इन्द्रियोंसे; अपि=ही; गृह्णते=ग्रहण करनेमें आता है (तथा); तपसा=तपसे; वा=अथवा; कर्मणा=कर्मोंसे भी (वह); [ न गृह्णते ]=ग्रहण नहीं किया जा सकता; तम्=उस; निष्कलम्=अवयवरहित (परमात्मा) को; तु=तो; विशुद्धसत्त्वः=विशुद्ध अन्तःकरणवाला (साधक); ततः=उस विशुद्ध अन्तःकरणसे; ध्यायमानः=(निरन्तर उसका) ध्यान करता हुआ ही; ज्ञानप्रसादेन=ज्ञानकी निर्मलतासे; पश्यते=देख पाता है ॥८॥
व्याख्या —उन परब्रह्मको मनुष्य इन आँखोंसे नहीं देख सकता; इतना ही नहीं, वाणी आदि अन्य इन्द्रियोंद्वारा भी वे पकड़में नहीं आ सकते तथा नाना प्रकारकी तपश्चर्या और कर्मोंके द्वारा भी मनुष्य उन्हें नहीं पा सकता। उन अवयवरहित परम विशुद्ध परमात्माको तो मनुष्य सब भोगोंसे मुख मोड़कर, निःस्पृह होकर विशुद्ध अन्तःकरणके द्वारा निरन्तर एकमात्र उन्हींका ध्यान करते-करते ज्ञानकी निर्मलतासे ही देख सकता है। अतः जो उन परमात्माको पाना चाहे, उसे उचित है कि संसारके भोगोंसे सर्वथा विरक्त होकर उन सबकी कामनाका त्याग करके एकमात्र परब्रह्म परमात्माको ही पानेके लिये उन्हींके चिन्तनमें निमग्न हो जाय ॥८॥
सम्बन्ध —जब वे परब्रह्म परमात्मा सबके हृदयमें रहते हैं, तब सभी जीव उन्हें क्यों नहीं जानते? शुद्ध अन्तःकरणवाला पुरुष ही क्या जानता है? इस जिज्ञासापर कहते हैं—
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ मुण्डक ३ ]
एषोऽणुरात्मा चेतसा वेदितव्यो यस्मिन् प्राणः पञ्चधा संविवेश। प्राणैश्चित्तं सर्वमोतं प्रजानां यस्मिन् विशुद्धे विभवत्येष आत्मा ॥ १ ॥
यस्मिन्=जिसमें; पञ्चधा=पाँच भेदोंवाला; प्राणः=प्राण; संविवेश=भलीभाँति प्रविष्ट है (उसी शरीरमें रहनेवाला); एषः=यह; अणुः=सूक्ष्म; आत्मा=आत्मा; चेतसा=मनसे; वेदितव्यः=जाननेमें आनेवाला है; प्रजानाम्=प्राणियोंका (वह); सर्वम्=सम्पूर्ण; चित्तम्=चित्त; प्राणैः=प्राणोंसे; ओतम्=व्याप्त है; यस्मिन् विशुद्धे=जिस अन्तःकरणके विशुद्ध होनेपर; एषः=यह; आत्मा=आत्मा; विभवति=सब प्रकारसे समर्थ होता है ॥ १ ॥
व्याख्या—जिस शरीरमें प्राण, अपान, व्यान, समान और उदान—इन पाँच भेदोंवाला प्राण प्रविष्ट होकर चैष्टायुक्त कर रहा है, उसी शरीरके भीतर हृदयके मध्यभागमें मन्द्राग ज्ञातारूपसे जाननेमें आनेवाला यह सूक्ष्म जीवात्मा भी रहता है। परंतु समस्त प्राणियोंके समस्त अन्तःकरण प्राणोंसे ओत-प्रोत हो रहे हैं, अर्थात् इस प्राण और इन्द्रियोंके तुप्त करनेके लिये उत्पन्न हुई नाना प्रकारकी भोगवासनाओंसे मलिन और क्षुब्ध हो रहे हैं, इस कारण सब लोग परमात्माको नहीं जान पाते। अन्तःकरणके विशुद्ध होनेपर ही यह जीवात्मा सब प्रकारसे समर्थ होता है। अतः यदि भोगोंसे विरक्त होकर यह परमात्माके चिन्तनमें लग जाता है, तब तो परमात्माको प्राप्त कर लेता है; और यदि भोगोंकी कामना करता है तो इच्छित भोगोंको प्राप्त कर लेता है ॥ १ ॥
यं यं लोकं मनसा संविभाति विशुद्धस्तत्त्वः कामयते यांश्च कामान्। तं तं लोकं जयते तांश्च कामां- स्तस्मादात्मज्ञं ह्यर्चयेद् भूतिकामः ॥ १० ॥
विशुद्धस्तत्त्वः=विशुद्ध अन्तःकरणवाला (मनुष्य); यम् यम्=जिस-जिस; लोकम्=लोकको; मनसा=मनसे; संविभाति=चिन्तन करता है; च=तथा; यान्
खण्ड २ ]
मुण्डकोपनिषद्
२७३
कामान् कामयते=जिन भोगोंकी कामना करता है; तम् तम्=उन-उन; लोकम्=लोकोंको; जयते=जीत लेता है; च=और; तान् कामान्=उन (इच्छित) भोगोंको भी प्राप्त कर लेता है; तस्मात् हि=इसीलिये; भूतिकामः=ऐश्वर्यकी कामनावाला मनुष्य; आत्मज्ञम्=शरीरसे भिन्न आत्माको जाननेवाले महात्माकी; अर्चयेत्=सेवा-पूजा करे ॥ १० ॥
व्याख्या —विशुद्ध अन्तःकरणवाला मनुष्य यदि भोगोंसे सर्वथा विरक्त होकर उस निर्मल अन्तःकरणद्वारा निरन्तर परब्रह्म परमेश्वरका ध्यान करता है—तब तो उन्हें प्राप्त कर लेता है यह बात आठवें मन्त्रमें कही जा चुकी है; परंतु यदि वह सर्वथा निष्काम नहीं होता तो जिस-जिस लोकका मनसे चिन्तन करता है तथा जिन-जिन भोगोंको चाहता है, उन-उन लोकोंको ही जीतता है—उन्हीं लोकोंमें जाता है तथा उन-उन भोगोंको ही प्राप्त करता है। इसलिये ऐश्वर्यकी कामनावाले मनुष्यको चाहिये कि शरीरसे भिन्न आत्माको जाननेवाले विशुद्ध अन्तःकरणयुक्त विवेकी पुरुषकी सेवा-पूजा (आदर-सत्कार) करे; क्योंकि वह अपने लिये और दूसरोंके लिये भी जो-जो कामना करता है, वह पूर्ण हो जाती है ॥ १० ॥
॥ प्रथम खण्ड समाप्त ॥ १ ॥
द्वितीय खण्ड
सम्बन्ध —पूर्व प्रकरणमें विशुद्ध अन्तःकरणवाले साधककी सामर्थ्यका वर्णन करनेके लिये प्रसङ्गवश कामनाओंकी पूर्तिकी बात आ गयी थी; अतः निष्कामभावकी प्रशंसा और सकामभावकी निन्दा करते हुए पुनः प्रकरण आरम्भ करते हैं—
स वेदैतत् परमं ब्रह्म धाम यत्र विश्वं निहितं भाति शुभ्रम्। उपासते पुरुषं ये ह्यकामा- स्ते शुक्रमेतदतिवर्तन्ति धीराः ॥ १ ॥
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ मुण्डक ३ ]
सः=वह (निष्कामभाववाला पुरुष); एतत्=इस; परमम्=परम; शुभ्रम्=विशुद्ध (प्रकाशमान); ब्रह्म धाम=ब्रह्मधामको; वेद=जान लेता है; यत्र=जिसमें; विश्रम्=सम्पूर्ण जगत्; निहितम्=स्थित हुआ; भाति=प्रतीत होता है; ये हि=जो भी कोई; अकामाः=निष्काम साधक; पुरुषम् उपासते=परमपुरुषकी उपासना करते हैं; ते=वे; धीराः=बुद्धिमान्; शुक्रम=रजोवीर्यमय; एतत्=इस शरीरको; अतिवर्तन्ति=अतिक्रमण कर जाते हैं ॥ १ ॥
व्याख्या —थोड़ा-सा विचार करनेपर प्रत्येक बुद्धिमान् मनुष्यकी समझमें यह बात आ जाती है कि इस प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाले जगत्के रचयिता और परमाधार कोई एक परमेश्वर अवश्य हैं। इस प्रकार जिनमें यह सम्पूर्ण जगत् स्थित हुआ प्रतीत होता है, उन परम विशुद्ध प्रकाशमय धामस्वरूप परब्रह्मपरमात्माको समस्त भोगोंकी कामनाका त्याग करके निरन्तर उनका ध्यान करनेवाला साधक जान लेता है। यह बात निश्चित है कि जो मनुष्य उन परम पुरुष परमात्माकी उपासना करते हैं और एकमात्र उन्हींको चाहते हैं, वे सर्वथा पूर्ण निष्काम होकर रहते हैं। किसी प्रकारके भोगोंमें उनका मन नहीं अटकता, अतः वे इस रजोवीर्यमय शरीरको लाँघ जाते हैं। उनका पुनर्जन्म नहीं होता। इसीलिये उन्हें बुद्धिमान् कहा गया है; क्योंकि जो सार वस्तुके लिये असारको त्याग दे वही बुद्धिमान् है ॥ १ ॥
सम्बन्ध —अब सकाम पुरुषकी निन्दा करते हुए ऊपर कही हुई बातको स्पष्ट करते हैं—
कामान् यः कामयते मन्यमानः स कामभिर्जायते तत्र तत्र । पर्याप्तकामस्य कृतात्मनस्त्वि- हैव सर्वे प्रविलीयन्ति कामाः ॥ २ ॥
यः=जो; कामान्=भोगोंको; मन्यमानः=आदर देनेवाला मानव; कामयते=(उनकी) कामना करता है; सः=वह; कामभिः=उन कामनाओंके कारण; तत्र तत्र=उन-उन स्थानोंमें; जायते=उत्पन्न होता है (जहाँ वे उपलब्ध हो सकें); तु=परंतु; पर्याप्तकामस्य=जो पूर्णकाम हो चुका है, उस; कृतात्मनः=विशुद्ध अन्तःकरणवाले
खण्ड २]
मुण्डकोपनिषद्
२७५
पुरुषकी; सर्वे=सम्पूर्ण; कामाः=कामनाएँ; इह एव=यहीं; प्रविलीयन्ति=सर्वथा विलीन हो जाती हैं॥ २॥
व्याख्या —जो भोगोंको आदर देनेवाला है, जिसकी दृष्टिमें इस लोक और परलोकके भोग सुखके हेतु हैं, वही भोगोंकी कामना करता है और नाना प्रकारकी कामनाओंके कारण ही जहाँ-जहाँ भोग उपलब्ध हो सकते हैं, वहाँ-वहाँ कर्मानुसार उत्पन्न होता है; परंतु जो भगवान्को चाहनेवाले भगवान्के प्रेमी भक्त पूर्णकाम हो गये हैं, इस जगत्के भोगोंसे ऊब गये हैं, उन विशुद्ध अन्तःकरणवाले भक्तोंकी समस्त कामनाएँ इस शरीरमें ही विलीन हो जाती हैं। स्वप्नमें भी उनकी दृष्टि भोगोंकी ओर नहीं जाती। फलतः उन्हें शरीर छोड़नेपर नवीन जन्म नहीं धारण करना पड़ता। वे भगवान्को पाकर जन्म-मृत्युके बन्धनसे सदाके लिये छूट जाते हैं॥ २॥
सम्बन्ध —पहले दो मन्त्रोंमें भगवान्के परम दुलारे जिन प्रेमी भक्तोंका वर्णन किया गया है, उन्हींको वे सर्वात्मा परब्रह्म पुरुषोत्तम दर्शन देते हैं—यह बात अब अगले मन्त्रमें कहते हैं—
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन। यमेवैष वृणुते तेन लभ्य- स्तस्यैष आत्मा विवृणुते तन्मु स्वाम्॥ ३॥*
अयम्=यह; आत्मा=परब्रह्म परमात्मा; न प्रवचनेन=न तो प्रवचनसे; न मेधया=न बुद्धिसे (और); न बहुना श्रुतेन=न बहुत सुननेसे ही; लभ्यः=प्राप्त हो सकता है; एषः=यह; यम्=जिसको; वृणुते=स्वीकार कर लेता है; तेन एव=उसके द्वारा ही; लभ्यः=प्राप्त किया जा सकता है (क्योंकि); एषः=यह; आत्मा=परमात्मा; तस्य=उसके लिये; स्वाम् तनुम्=अपने यथार्थ स्वरूपको; विवृणुते=प्रकट कर देता है॥ ३॥
व्याख्या —इस मन्त्रमें यह बात समझायी गयी है कि वे परमात्मा न तो उनको मिलते हैं, जो शास्त्रोंको पढ़-सुनकर लच्छेदार भाषामें परमात्म-तत्त्वका
- यह मन्त्र कठोपनिषद्में भी इसी प्रकार है (१।२।२३)।
२७६
ईशादि नौ उपनिषद्
[ मुण्डक ३ ]
नाना प्रकारसे वर्णन करते हैं, न उन तर्कशील बुद्धिमान् मनुष्योंको ही मिलते हैं जो बुद्धिके अभिमानमें प्रमत्त हुए तर्कके द्वारा विवेचन करके उन्हें समझनेकी चेष्टा करते हैं और न उन्हींको मिलते हैं, जो परमात्माके विषयमें बहुत कुछ सुनते रहते हैं। वे तो उसीको प्राप्त होते हैं, जिसको वे स्वयं स्वीकार कर लेते हैं और वे स्वीकार उसीको करते हैं, जिसको उनके लिये उत्कट इच्छा होती है, जो उनके बिना रह नहीं सकता। जो अपनी बुद्धि या साधनपर भरोसा न करके केवल उनकी कृपाकी ही प्रतीक्षा करता रहता है, ऐसे कृपा-निर्भर साधकपर परमात्मा कृपा करते हैं और योगमायाका परदा हटाकर उसके सामने अपना स्वरूप प्रकट कर देते हैं ॥ ३ ॥
नायमात्मा बलहीनेन लभ्यो न च प्रमादात्तपसो वाप्यलिङ्गात् । एतैरुपायैर्यतते यस्तु विद्वान्- स्तस्यैष आत्मा विशते ब्रह्मधाम ॥ ४ ॥
अयम्=यह; आत्मा=परमात्मा; बलहीनेन=बलहीन मनुष्यद्वारा; न लभ्यः=नहीं प्राप्त किया जा सकता; च=तथा; प्रमादात्=प्रमादसे; वा=अथवा; अलिङ्गात्=लक्षणरहित; तपसः=तपसे; अपि=भी; न [ लभ्यः ]=नहीं प्राप्त किया जा सकता; तु=किंतु; यः=जो; विद्वान्=बुद्धिमान् साधक; एतैः=इन; उपायैः=उपायोंके द्वारा; यतते=प्रयत्न करता है; तस्य=उसका; एषः=यह; आत्मा=आत्मा; ब्रह्मधाम=ब्रह्मधाममें; विशते=प्रविष्ट हो जाता है ॥ ४ ॥
व्याख्या—इस प्रकरणमें बताये हुए सबके आत्मारूप परब्रह्म परमेश्वर उपासनारूप बलसे रहित मनुष्यद्वारा नहीं प्राप्त किये जा सकते। समस्त भोगोंकी आशा छोड़कर एकमात्र परमात्माकी ही उत्कट अभिलाषा रखते हुए निरन्तर विशुद्धभावसे अपने इष्टदेवका चिन्तन करना—यही उपासनारूपी बलका संचय करना है। ऐसे बलसे रहित पुरुषको वे नहीं मिलते। इसी प्रकार कर्तव्यत्यागरूप प्रमादसे भी नहीं मिलते तथा सात्त्विक लक्षणोंसे रहित संयमरूप तपसे भी किसी साधकद्वारा नहीं प्राप्त किये जा सकते। किंतु जो बुद्धिमान् साधक इन पूर्वोक्त उपायोंसे प्रयत्न करता है, अर्थात् प्रमादरहित होकर उत्कट अभिलाषाके साथ
खण्ड २ ]
मुण्डकोपनिषद्
२७७
निरन्तर उन परमेश्वरकी उपासना करता है, उसका आत्मा परब्रह्म परमात्माके स्वरूपमें प्रविष्ट हो जाता है ॥४॥
सम्बन्ध— उपर्युक्त प्रकारसे परमात्माको प्राप्त हुए महापुरुषोंके महत्त्वका वर्णन करते हैं—
| सम्प्राप्यैनमृषयो | ज्ञानतूसाः |
|---|---|
| कृतात्मानो | वीतरागाः प्रशान्ताः । |
| ते सर्वगं सर्वतः | प्राप्य धीरा |
| युक्तात्मानः | सर्वमेवाविशन्ति ॥ ५ ॥ |
वीतरागाः=सर्वथा आसक्तिरहित; कृतात्मानः=(और) विशुद्ध अन्तःकरणवाले; ऋषयः=ऋषिलोग; एनम्=इस परमात्माको; सम्प्राप्य=पूर्णतया प्राप्त होकर; ज्ञानतूसाः=ज्ञानसे तृप्त (एवं); प्रशान्ताः=परम शान्त (हो जाते हैं); युक्तात्मानः=अपने-आपको परमात्मामें संयुक्त कर देनेवाले; ते=वे; धीराः=ज्ञानीजन; सर्वगम्=सर्वव्यापी परमात्माको; सर्वतः=सब ओरसे; प्राप्य=प्राप्त करके; सर्वम् एव=सर्वरूप परमात्मामें ही; आविशन्ति=प्रविष्ट हो जाते हैं ॥५॥
व्याख्या— वे विशुद्ध अन्तःकरणवाले सर्वथा आसक्तिरहित महर्षिगण उपर्युक्त प्रकारसे इन परब्रह्म परमात्माको भलीभाँति प्राप्त होकर ज्ञानसे तृप्त हो जाते हैं। उन्हें किसी प्रकारके अभावका बोध नहीं होता, वे पूर्णकाम—परम शान्त हो जाते हैं। वे अपने-आपको परमात्मामें लगा देनेवाले ज्ञानीजन सर्वव्यापी परमात्माको सब ओरसे प्राप्त करके सर्वरूप परमात्मामें ही पूर्णतया प्रविष्ट हो जाते हैं ॥५॥
सम्बन्ध— इस प्रकार परमात्माको प्राप्त हुए महापुरुषोंकी महिमाका वर्णन करके अब ब्रह्मलोकमें जानेवाले महापुरुषोंकी मुक्तिका वर्णन करते हैं—
वेदान्तविज्ञानमुनिश्चिन्तार्थाः | ---|--- संन्यासयोगाद् | यतयः शुद्धसत्त्वाः । ते ब्रह्मलोकेषु | परान्तकाले परामृताः | परिमुच्यन्ति सर्वे ॥ ६ ॥
२७८
ईशादि नौ उपनिषद्
[ मुण्डक ३ ]
[ ये ] वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थः=जिन्होंने वेदान्त (उपनिषद्) शास्त्रके विज्ञानद्वारा उसके अर्थभूत परमात्माको पूर्ण निश्चयपूर्वक जान लिया है (तथा); संन्यासयोगात्=कर्मफल और आसक्तिके त्यागरूप योगसे; शुद्धसत्त्वाः=जिनका अन्तःकरण शुद्ध हो गया है; ते=वे; सर्वैः=समस्त; यतयः=प्रयत्नशील साधकगण; परान्तकाले=मरणकालमें (शरीर त्यागकर); ब्रह्मलोकेषु=ब्रह्मलोकमें (जाते हैं और वहाँ); परामृताः=परम अमृतस्वरूप होकर; परिमुच्यन्ति=सर्वथा मुक्त हो जाते हैं ॥ ६ ॥
व्याख्या —जिन्होंने वेदान्तशास्त्रके सम्यक् ज्ञानद्वारा उसके अर्थस्वरूप परमात्माको भलीभाँति निश्चयपूर्वक जान लिया है तथा कर्मफल और कर्मासक्तिके त्यागरूप योगसे जिनका अन्तःकरण सर्वथा शुद्ध हो गया है, ऐसे सभी प्रयत्नशील साधक मरणकालमें शरीरका त्याग करके परब्रह्म परमात्माके परम धाममें जाते हैं और वहाँ परम अमृतस्वरूप होकर संसारबन्धनसे सदाके लिये सर्वथा मुक्त हो जाते हैं ॥ ६ ॥
सम्बन्ध —जिनको परब्रह्म परमात्माकी प्राप्ति इसी शरीरमें हो जाती है, उनकी अन्तकालमें कैसी स्थिति होती है—इस जिज्ञासापर कहते हैं—
| गताः | कलाः | पञ्चदश | प्रतिष्ठा |
|---|---|---|---|
| देवाश्च | सर्वे | प्रतिदेवतासु। | |
| कर्माणि | विज्ञानमयश्च | आत्मा | |
| परेऽव्यये | सर्वे | एकीभवन्ति ॥ ७ ॥ |
पञ्चदश=पंद्रह; कलाः=कलाएँ; च=और; सर्वे=सम्पूर्ण; देवाः=देवता अर्थात् इन्द्रियाँ; प्रतिदेवतासु=अपने-अपने अभिमानी देवताओंमें; गताः=जाकर; प्रतिष्ठाः=स्थित हो जाते हैं; कर्माणि=(फिर) समस्त कर्म; च=और; विज्ञानमयः=विज्ञानमय; आत्मा=जीवात्मा; सर्वे=ये सब-के-सब; परे अव्यये=परम अविनाशी परब्रह्ममें; एकीभवन्ति=एक हो जाते हैं ॥ ७ ॥
व्याख्या —उस महापुरुषका जब देहपात होता है, उस समय पंद्रह कलाएँ*
- पंद्रह कलाएँ ये हैं—श्रद्धा, आकाशादि पञ्च महाभूत, इन्द्रिय, मन, अन्न, वीर्य, तप, मन्त्र, कर्म, लोक तथा नाम। (देखिये प्रश्नोपनिषद् ६।४)
खण्ड २ ]
मुण्डकोपनिषद्
२७९
और मनसहित सब इन्द्रियोंके देवता—ये सब अपने-अपने अभिमानी समष्टि देवताओंमें जाकर स्थित हो जाते हैं। उनके साथ उस जीवन्मुक्तका कोई सम्बन्ध नहीं रहता। उसके बाद उसके समस्त कर्म और विज्ञानमय जीवात्मा—सब-के-सब परम अविनाशी परब्रह्ममें लीन हो जाते हैं ॥७॥
सम्बन्ध— किस प्रकार लीन हो जाते हैं? इस जिज्ञासापर कहते हैं—
यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रे- उस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय। तथा विद्वान् नामरूपाद् विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥८॥
यथा=जिस प्रकार; स्यन्दमानाः=बहती हुई; नद्यः=नदियाँ, नामरूपे=नाम-रूपको; विहाय=छोड़कर; समुद्रे=समुद्रमें; अस्तम् गच्छन्ति=विलीन हो जाती हैं; तथा=वैसे ही; विद्वान्=ज्ञानी महात्मा; नामरूपात्=नाम-रूपसे; विमुक्तः=रहित होकर; परात् परम्=उत्तम-से-उत्तम; दिव्यम्=दिव्य; पुरुषम्=परम पुरुष परमात्माको; उपैति=प्राप्त हो जाता है ॥८॥
व्याख्या— जिस प्रकार बहती हुई नदियाँ अपना-अपना नाम-रूप छोड़कर समुद्रमें विलीन हो जाती हैं, वैसे ही ज्ञानी महापुरुष नाम-रूपसे रहित होकर परात्पर दिव्य पुरुष परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो जाता है— सर्वतोभावसे उन्हींमें विलीन हो जाता है ॥८॥
स यो ह वै तत्परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति नास्याब्रह्मवित्कुले भवति। तरति शोकं तरति पाप्मानं गुहाग्रन्थिभ्यो विमुक्तोऽमृतो भवति ॥९॥
ह=निश्चय ही; यः वै=जो कोई भी; तत्=उस; परम् ब्रह्म=परमब्रह्म परमात्माको; वेद=जान लेता है; सः=वह महात्मा; ब्रह्म एव=ब्रह्म ही; भवति=हो जाता है; अस्य=इसके; कुले=कुलमें; अब्रह्मवित्=ब्रह्मको न जानेवाला; न भवति=नहीं होता; शोकम् तरति=(वह) शोकसे पार हो जाता है; पाप्मानम्
२८०
ईशादि नौ उपनिषद्
[ मुण्डक ३ ]
तरति=पापसमुदायसे तर जाता है; गुहाग्रन्थिभ्यः=हृदयकी गाँठोंसे; विमुक्तः=सर्वथा छूटकर; अमृतः=अमर; भवति=हो जाता है ॥ ९ ॥
व्याख्या —यह बिलकुल सच्ची बात है कि जो कोई भी उस परब्रह्म परमात्माको जान लेता है, वह ब्रह्म ही हो जाता है। उसके कुलमें अर्थात् उसकी संतानोंमें कोई भी मनुष्य ब्रह्मको न जाननेवाला नहीं होता। वह सब प्रकारके शोक और चिन्ताओंसे सर्वथा पार हो जाता है, सम्पूर्ण पापसमुदायसे सर्वथा तर जाता है, हृदयमें स्थित सब प्रकारके संशय, विपर्यय, देहाभिमान, विषयासक्ति आदि ग्रन्थियोंसे सर्वथा छूटकर अमर हो जाता है। जन्म-मृत्युसे रहित हो जाता है ॥ ९ ॥
सम्बन्ध —इस ब्रह्मविद्याके अधिकारीका वर्णन करते हैं—
तदेतद्वाभ्युक्तम्—
क्रियावन्तः श्रोत्रिया ब्रह्मनिष्ठाः स्वयं जुह्वत एकर्षि श्रद्धयन्तः।
तेषामेवैतां ब्रह्मविद्यां वदेत शिरोव्रतं विधिवैद्यैस्तु चीर्णम् ॥ १० ॥
तत् =उस ब्रह्मविद्याके विषयमें; एतत् =यह बात; ऋचा अभ्युक्तम् =ऋचाद्वारा कही गयी है; क्रियावन्तः =जो निष्कामभावसे कर्म करनेवाले; श्रोत्रियाः =वेदके अर्थके ज्ञाता (तथा); ब्रह्मनिष्ठाः =ब्रह्मके उपासक हैं (और); श्रद्धयन्तः =श्रद्धा रखते हुए; स्वयम् =स्वयं; एकर्षिम् =एकर्षि' नामवाले प्रज्वलित अग्निमें; जुह्वते =नियमानुसार हवन करते हैं; तु =तथा; वैः =जिन्होंने; विधिवत् =विधिपूर्वक; शिरोव्रतम् =सर्वश्रेष्ठ व्रतका; चीर्णम् =पालन किया है; तेषाम् एव =उन्हींको; एताम् =यह; ब्रह्मविद्याम् =ब्रह्मविद्या; वदेत =बतलानी चाहिये ॥ १० ॥
व्याख्या —जिसका इस उपनिषदमें वर्णन हुआ है, उस ब्रह्मविद्याके विषयमें यह बात ऋचा द्वारा कही गयी है कि जो अपने-अपने वर्ण, आश्रम और परिस्थितिके अनुसार निष्कामभावसे यथायोग्य कर्म करनेवाले, वेदके यथार्थ अभिप्रायको समझनेवाले, परब्रह्म परमात्माकी उपासना करनेवाले और उनके जिज्ञासु हैं, जो स्वयं 'एकर्षि' नामसे प्रसिद्ध प्रज्वलित अग्निमें शास्त्र-विधिके अनुसार श्रद्धापूर्वक हवन करते हैं तथा जिन्होंने विधिपूर्वक ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन किया है, उन्हींको यह ब्रह्मविद्या बतलानी चाहिये ॥ १० ॥
खण्ड २]
मुण्डकोपनिषद्
२८१
तदेतत् सत्यमृषिरङ्गिराः पुरोवाच नैतद्वचीर्णव्रतोऽधीते। नमः परमऋषिभ्यो नमः परमऋषिभ्यः ॥ ११ ॥
तत्=उसी; एतत्=इस; सत्यम्=सत्यको अर्थात् यथार्थ विद्याको; पुरा=पहले; अङ्गिराः ऋषिः=अङ्गिरा ऋषिने; उवाच=कहा था; अचीर्णव्रतः=जिसने ब्रह्मचर्यव्रतका पालन नहीं किया है; एतत्=(वह) इसे; न=नहीं; अधीते=पढ़ सकता; परमऋषिभ्यः नमः=परम ऋषियोंको नमस्कार है; परमऋषिभ्यः नमः=परम ऋषियोंको नमस्कार है ॥ ११ ॥
व्याख्या—उस ब्रह्मविद्यारूप इस सत्यका पहले महर्षि अङ्गिराने उपर्युक्त प्रकारसे शौनक ऋषिको उपदेश दिया था। जिसने विधिपूर्वक ब्रह्मचर्यव्रतका पालन नहीं किया हो, वह इसे नहीं पढ़ पाता अर्थात् इसका गूढ़ अभिप्राय नहीं समझ सकता। परम ऋषियोंको नमस्कार है, परम ऋषियोंको नमस्कार है, इस प्रकार दो बार ऋषियोंको नमस्कार करके ग्रन्थसमाप्तिकी सूचना दी गयी है ॥ ११ ॥
॥ द्वितीय खण्ड समाप्त ॥ २ ॥
॥ तृतीय मुण्डक समाप्त ॥ ३ ॥
॥ अथर्ववेदीय मुण्डकोपनिषद् समाप्त ॥
शान्तिपाठ
ॐ भद्रं कर्णोभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्जत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाः सस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्ताक्ष्यौ अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥
ॐ शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!!
इसका अर्थ इसी उपनिषद्के प्रारम्भमें दिया जा चुका है।
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
माण्डूक्योपनिषद्
शान्तिपाठ
ॐ भद्रं कर्णोभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षर्भिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाः सस्तनूभिव्यंशेम देवहितं यदायुः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्ताक्ष्यो अरिष्टुनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥
ॐ शान्तिः!! शान्तिः!! शान्तिः!!!
देवाः=हे देवगण!; [ वयम् ] यजत्राः [ सन्तः ]=हम भगवान्का यजन (आराधन) करते हुए; कर्णोभिः=कानोंसे; भद्रम्=कल्याणमय वचन; शृणुयाम=सुनें; अक्षर्भिः=नैत्रोंसे; भद्रम्=कल्याण (ही); पश्येम=देखें; स्थिरैः=सुदृढ़; अङ्गैः=अङ्गों; तनूभिः=एवं शरीरोंसे; तुष्टुवांसः [ वयम् ]=भगवान्की स्तुति करते हुए हमलोग; यत्=जो; आयुः=आयु; देवहितम्=आराध्यदेव परमात्माके काम आ सके; [ तत् ]=उसका; व्यशेम=उपभोग करें; वृद्धश्रवाः=सब ओर फैले हुए सुयशवाले; इन्द्रः=इन्द्र; नः=हमारे लिये; स्वस्ति दधातु=कल्याणका पोषण करें; विश्ववेदाः=सम्पूर्ण विश्वका ज्ञान रखनेवाले; पूषा=पूषा; नः=हमारे लिये; स्वस्ति [ दधातु ]=कल्याणका पोषण करें; अरिष्टुनेमिः=अरिष्टोंको मिटानेके लिये चक्रसदृश शक्तिशाली; ताक्ष्यो=गरुड़देव; नः=हमारे लिये; स्वस्ति [ दधातु ]=कल्याणका पोषण करें; (तथा) बृहस्पतिः=(बुद्धिके स्वामी) बृहस्पति भी; नः=हमारे लिये; स्वस्ति [ दधातु ]=कल्याणकी पुष्टि करें; ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः=परमात्मन्! हमारे त्रिविध तापकी शान्ति हो।
व्याख्या —गुरुके यहाँ अध्ययन करनेवाले शिष्य अपने गुरु, सहपाठी तथा मानवमात्रका कल्याण-चिन्तन करते हुए देवताओंसे प्रार्थना करते हैं कि