भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ मुण्डक ३ ]

[ ये ] वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थः=जिन्होंने वेदान्त (उपनिषद्) शास्त्रके विज्ञानद्वारा उसके अर्थभूत परमात्माको पूर्ण निश्चयपूर्वक जान लिया है (तथा); संन्यासयोगात्=कर्मफल और आसक्तिके त्यागरूप योगसे; शुद्धसत्त्वाः=जिनका अन्तःकरण शुद्ध हो गया है; ते=वे; सर्वैः=समस्त; यतयः=प्रयत्नशील साधकगण; परान्तकाले=मरणकालमें (शरीर त्यागकर); ब्रह्मलोकेषु=ब्रह्मलोकमें (जाते हैं और वहाँ); परामृताः=परम अमृतस्वरूप होकर; परिमुच्यन्ति=सर्वथा मुक्त हो जाते हैं ॥ ६ ॥

व्याख्या —जिन्होंने वेदान्तशास्त्रके सम्यक् ज्ञानद्वारा उसके अर्थस्वरूप परमात्माको भलीभाँति निश्चयपूर्वक जान लिया है तथा कर्मफल और कर्मासक्तिके त्यागरूप योगसे जिनका अन्तःकरण सर्वथा शुद्ध हो गया है, ऐसे सभी प्रयत्नशील साधक मरणकालमें शरीरका त्याग करके परब्रह्म परमात्माके परम धाममें जाते हैं और वहाँ परम अमृतस्वरूप होकर संसारबन्धनसे सदाके लिये सर्वथा मुक्त हो जाते हैं ॥ ६ ॥

सम्बन्ध —जिनको परब्रह्म परमात्माकी प्राप्ति इसी शरीरमें हो जाती है, उनकी अन्तकालमें कैसी स्थिति होती है—इस जिज्ञासापर कहते हैं—

गताःकलाःपञ्चदशप्रतिष्ठा
देवाश्चसर्वेप्रतिदेवतासु।
कर्माणिविज्ञानमयश्चआत्मा
परेऽव्ययेसर्वेएकीभवन्ति ॥ ७ ॥

पञ्चदश=पंद्रह; कलाः=कलाएँ; च=और; सर्वे=सम्पूर्ण; देवाः=देवता अर्थात् इन्द्रियाँ; प्रतिदेवतासु=अपने-अपने अभिमानी देवताओंमें; गताः=जाकर; प्रतिष्ठाः=स्थित हो जाते हैं; कर्माणि=(फिर) समस्त कर्म; च=और; विज्ञानमयः=विज्ञानमय; आत्मा=जीवात्मा; सर्वे=ये सब-के-सब; परे अव्यये=परम अविनाशी परब्रह्ममें; एकीभवन्ति=एक हो जाते हैं ॥ ७ ॥

व्याख्या —उस महापुरुषका जब देहपात होता है, उस समय पंद्रह कलाएँ*

  • पंद्रह कलाएँ ये हैं—श्रद्धा, आकाशादि पञ्च महाभूत, इन्द्रिय, मन, अन्न, वीर्य, तप, मन्त्र, कर्म, लोक तथा नाम। (देखिये प्रश्नोपनिषद् ६।४)