भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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खण्ड २ ]

मुण्डकोपनिषद्

२७९

और मनसहित सब इन्द्रियोंके देवता—ये सब अपने-अपने अभिमानी समष्टि देवताओंमें जाकर स्थित हो जाते हैं। उनके साथ उस जीवन्मुक्तका कोई सम्बन्ध नहीं रहता। उसके बाद उसके समस्त कर्म और विज्ञानमय जीवात्मा—सब-के-सब परम अविनाशी परब्रह्ममें लीन हो जाते हैं ॥७॥

सम्बन्ध— किस प्रकार लीन हो जाते हैं? इस जिज्ञासापर कहते हैं—

यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रे- उस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय। तथा विद्वान् नामरूपाद् विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥८॥

यथा=जिस प्रकार; स्यन्दमानाः=बहती हुई; नद्यः=नदियाँ, नामरूपे=नाम-रूपको; विहाय=छोड़कर; समुद्रे=समुद्रमें; अस्तम् गच्छन्ति=विलीन हो जाती हैं; तथा=वैसे ही; विद्वान्=ज्ञानी महात्मा; नामरूपात्=नाम-रूपसे; विमुक्तः=रहित होकर; परात् परम्=उत्तम-से-उत्तम; दिव्यम्=दिव्य; पुरुषम्=परम पुरुष परमात्माको; उपैति=प्राप्त हो जाता है ॥८॥

व्याख्या— जिस प्रकार बहती हुई नदियाँ अपना-अपना नाम-रूप छोड़कर समुद्रमें विलीन हो जाती हैं, वैसे ही ज्ञानी महापुरुष नाम-रूपसे रहित होकर परात्पर दिव्य पुरुष परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो जाता है— सर्वतोभावसे उन्हींमें विलीन हो जाता है ॥८॥

स यो ह वै तत्परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति नास्याब्रह्मवित्कुले भवति। तरति शोकं तरति पाप्मानं गुहाग्रन्थिभ्यो विमुक्तोऽमृतो भवति ॥९॥

ह=निश्चय ही; यः वै=जो कोई भी; तत्=उस; परम् ब्रह्म=परमब्रह्म परमात्माको; वेद=जान लेता है; सः=वह महात्मा; ब्रह्म एव=ब्रह्म ही; भवति=हो जाता है; अस्य=इसके; कुले=कुलमें; अब्रह्मवित्=ब्रह्मको न जानेवाला; न भवति=नहीं होता; शोकम् तरति=(वह) शोकसे पार हो जाता है; पाप्मानम्