भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ मुण्डक ३ ]

तरति=पापसमुदायसे तर जाता है; गुहाग्रन्थिभ्यः=हृदयकी गाँठोंसे; विमुक्तः=सर्वथा छूटकर; अमृतः=अमर; भवति=हो जाता है ॥ ९ ॥

व्याख्या —यह बिलकुल सच्ची बात है कि जो कोई भी उस परब्रह्म परमात्माको जान लेता है, वह ब्रह्म ही हो जाता है। उसके कुलमें अर्थात् उसकी संतानोंमें कोई भी मनुष्य ब्रह्मको न जाननेवाला नहीं होता। वह सब प्रकारके शोक और चिन्ताओंसे सर्वथा पार हो जाता है, सम्पूर्ण पापसमुदायसे सर्वथा तर जाता है, हृदयमें स्थित सब प्रकारके संशय, विपर्यय, देहाभिमान, विषयासक्ति आदि ग्रन्थियोंसे सर्वथा छूटकर अमर हो जाता है। जन्म-मृत्युसे रहित हो जाता है ॥ ९ ॥

सम्बन्ध —इस ब्रह्मविद्याके अधिकारीका वर्णन करते हैं—

तदेतद्वाभ्युक्तम्—

क्रियावन्तः श्रोत्रिया ब्रह्मनिष्ठाः स्वयं जुह्वत एकर्षि श्रद्धयन्तः।

तेषामेवैतां ब्रह्मविद्यां वदेत शिरोव्रतं विधिवैद्यैस्तु चीर्णम् ॥ १० ॥

तत् =उस ब्रह्मविद्याके विषयमें; एतत् =यह बात; ऋचा अभ्युक्तम् =ऋचाद्वारा कही गयी है; क्रियावन्तः =जो निष्कामभावसे कर्म करनेवाले; श्रोत्रियाः =वेदके अर्थके ज्ञाता (तथा); ब्रह्मनिष्ठाः =ब्रह्मके उपासक हैं (और); श्रद्धयन्तः =श्रद्धा रखते हुए; स्वयम् =स्वयं; एकर्षिम् =एकर्षि' नामवाले प्रज्वलित अग्निमें; जुह्वते =नियमानुसार हवन करते हैं; तु =तथा; वैः =जिन्होंने; विधिवत् =विधिपूर्वक; शिरोव्रतम् =सर्वश्रेष्ठ व्रतका; चीर्णम् =पालन किया है; तेषाम् एव =उन्हींको; एताम् =यह; ब्रह्मविद्याम् =ब्रह्मविद्या; वदेत =बतलानी चाहिये ॥ १० ॥

व्याख्या —जिसका इस उपनिषदमें वर्णन हुआ है, उस ब्रह्मविद्याके विषयमें यह बात ऋचा द्वारा कही गयी है कि जो अपने-अपने वर्ण, आश्रम और परिस्थितिके अनुसार निष्कामभावसे यथायोग्य कर्म करनेवाले, वेदके यथार्थ अभिप्रायको समझनेवाले, परब्रह्म परमात्माकी उपासना करनेवाले और उनके जिज्ञासु हैं, जो स्वयं 'एकर्षि' नामसे प्रसिद्ध प्रज्वलित अग्निमें शास्त्र-विधिके अनुसार श्रद्धापूर्वक हवन करते हैं तथा जिन्होंने विधिपूर्वक ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन किया है, उन्हींको यह ब्रह्मविद्या बतलानी चाहिये ॥ १० ॥