भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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खण्ड २]

मुण्डकोपनिषद्

२८१

तदेतत् सत्यमृषिरङ्गिराः पुरोवाच नैतद्वचीर्णव्रतोऽधीते। नमः परमऋषिभ्यो नमः परमऋषिभ्यः ॥ ११ ॥

तत्=उसी; एतत्=इस; सत्यम्=सत्यको अर्थात् यथार्थ विद्याको; पुरा=पहले; अङ्गिराः ऋषिः=अङ्गिरा ऋषिने; उवाच=कहा था; अचीर्णव्रतः=जिसने ब्रह्मचर्यव्रतका पालन नहीं किया है; एतत्=(वह) इसे; न=नहीं; अधीते=पढ़ सकता; परमऋषिभ्यः नमः=परम ऋषियोंको नमस्कार है; परमऋषिभ्यः नमः=परम ऋषियोंको नमस्कार है ॥ ११ ॥

व्याख्या—उस ब्रह्मविद्यारूप इस सत्यका पहले महर्षि अङ्गिराने उपर्युक्त प्रकारसे शौनक ऋषिको उपदेश दिया था। जिसने विधिपूर्वक ब्रह्मचर्यव्रतका पालन नहीं किया हो, वह इसे नहीं पढ़ पाता अर्थात् इसका गूढ़ अभिप्राय नहीं समझ सकता। परम ऋषियोंको नमस्कार है, परम ऋषियोंको नमस्कार है, इस प्रकार दो बार ऋषियोंको नमस्कार करके ग्रन्थसमाप्तिकी सूचना दी गयी है ॥ ११ ॥

॥ द्वितीय खण्ड समाप्त ॥ २ ॥

॥ तृतीय मुण्डक समाप्त ॥ ३ ॥

॥ अथर्ववेदीय मुण्डकोपनिषद् समाप्त ॥

शान्तिपाठ

ॐ भद्रं कर्णोभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्जत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाः सस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्ताक्ष्यौ अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥

ॐ शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!!

इसका अर्थ इसी उपनिषद्के प्रारम्भमें दिया जा चुका है।