भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 284, कुल 548 में से

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पृष्ठ 284

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

माण्डूक्योपनिषद्

शान्तिपाठ

ॐ भद्रं कर्णोभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षर्भिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाः सस्तनूभिव्यंशेम देवहितं यदायुः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्ताक्ष्यो अरिष्टुनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥

ॐ शान्तिः!! शान्तिः!! शान्तिः!!!

देवाः=हे देवगण!; [ वयम् ] यजत्राः [ सन्तः ]=हम भगवान्का यजन (आराधन) करते हुए; कर्णोभिः=कानोंसे; भद्रम्=कल्याणमय वचन; शृणुयाम=सुनें; अक्षर्भिः=नैत्रोंसे; भद्रम्=कल्याण (ही); पश्येम=देखें; स्थिरैः=सुदृढ़; अङ्गैः=अङ्गों; तनूभिः=एवं शरीरोंसे; तुष्टुवांसः [ वयम् ]=भगवान्की स्तुति करते हुए हमलोग; यत्=जो; आयुः=आयु; देवहितम्=आराध्यदेव परमात्माके काम आ सके; [ तत् ]=उसका; व्यशेम=उपभोग करें; वृद्धश्रवाः=सब ओर फैले हुए सुयशवाले; इन्द्रः=इन्द्र; नः=हमारे लिये; स्वस्ति दधातु=कल्याणका पोषण करें; विश्ववेदाः=सम्पूर्ण विश्वका ज्ञान रखनेवाले; पूषा=पूषा; नः=हमारे लिये; स्वस्ति [ दधातु ]=कल्याणका पोषण करें; अरिष्टुनेमिः=अरिष्टोंको मिटानेके लिये चक्रसदृश शक्तिशाली; ताक्ष्यो=गरुड़देव; नः=हमारे लिये; स्वस्ति [ दधातु ]=कल्याणका पोषण करें; (तथा) बृहस्पतिः=(बुद्धिके स्वामी) बृहस्पति भी; नः=हमारे लिये; स्वस्ति [ दधातु ]=कल्याणकी पुष्टि करें; ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः=परमात्मन्! हमारे त्रिविध तापकी शान्ति हो।

व्याख्या —गुरुके यहाँ अध्ययन करनेवाले शिष्य अपने गुरु, सहपाठी तथा मानवमात्रका कल्याण-चिन्तन करते हुए देवताओंसे प्रार्थना करते हैं कि

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