ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 279, कुल 548 में से
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मुण्डकोपनिषद्
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निरन्तर उन परमेश्वरकी उपासना करता है, उसका आत्मा परब्रह्म परमात्माके स्वरूपमें प्रविष्ट हो जाता है ॥४॥
सम्बन्ध— उपर्युक्त प्रकारसे परमात्माको प्राप्त हुए महापुरुषोंके महत्त्वका वर्णन करते हैं—
| सम्प्राप्यैनमृषयो | ज्ञानतूसाः |
|---|---|
| कृतात्मानो | वीतरागाः प्रशान्ताः । |
| ते सर्वगं सर्वतः | प्राप्य धीरा |
| युक्तात्मानः | सर्वमेवाविशन्ति ॥ ५ ॥ |
वीतरागाः=सर्वथा आसक्तिरहित; कृतात्मानः=(और) विशुद्ध अन्तःकरणवाले; ऋषयः=ऋषिलोग; एनम्=इस परमात्माको; सम्प्राप्य=पूर्णतया प्राप्त होकर; ज्ञानतूसाः=ज्ञानसे तृप्त (एवं); प्रशान्ताः=परम शान्त (हो जाते हैं); युक्तात्मानः=अपने-आपको परमात्मामें संयुक्त कर देनेवाले; ते=वे; धीराः=ज्ञानीजन; सर्वगम्=सर्वव्यापी परमात्माको; सर्वतः=सब ओरसे; प्राप्य=प्राप्त करके; सर्वम् एव=सर्वरूप परमात्मामें ही; आविशन्ति=प्रविष्ट हो जाते हैं ॥५॥
व्याख्या— वे विशुद्ध अन्तःकरणवाले सर्वथा आसक्तिरहित महर्षिगण उपर्युक्त प्रकारसे इन परब्रह्म परमात्माको भलीभाँति प्राप्त होकर ज्ञानसे तृप्त हो जाते हैं। उन्हें किसी प्रकारके अभावका बोध नहीं होता, वे पूर्णकाम—परम शान्त हो जाते हैं। वे अपने-आपको परमात्मामें लगा देनेवाले ज्ञानीजन सर्वव्यापी परमात्माको सब ओरसे प्राप्त करके सर्वरूप परमात्मामें ही पूर्णतया प्रविष्ट हो जाते हैं ॥५॥
सम्बन्ध— इस प्रकार परमात्माको प्राप्त हुए महापुरुषोंकी महिमाका वर्णन करके अब ब्रह्मलोकमें जानेवाले महापुरुषोंकी मुक्तिका वर्णन करते हैं—
वेदान्तविज्ञानमुनिश्चिन्तार्थाः | ---|--- संन्यासयोगाद् | यतयः शुद्धसत्त्वाः । ते ब्रह्मलोकेषु | परान्तकाले परामृताः | परिमुच्यन्ति सर्वे ॥ ६ ॥